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विश्नोई एटलस
विश्नोई एटलस धरोहर की खोज • विरासत का संरक्षण
✦ श्री गुरु जम्भेश्वर भगवान • प्रामाणिक 120 शब्दवाणी डिजिटल अभिलेखागार (C9.2.1)

शब्दवाणी — 120 Sacred Shabds

सत्य, धर्म, करुणा, जीव-दया एवं पर्यावरण संरक्षण के पावन अमर उपदेश। मूल शब्दवाणी अपरिवर्तनीय सुरक्षित, हिन्दी भावार्थ एवं English translation सहित।

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आज का पावन शबद (Daily Wisdom)

शब्द 71: शब्द 71: धवणा धूजै पाहण पूजै बे फरमाई खुदाई

मूल वाणी:

ओ३म्-धवणा धूजै पाहण पूजै बे फरमाई खुदाई, गुरू के चेले के पाए लागै देखो लोग अन्हयायी। काठी कणजो रूपा रेहण, कापड़ मांह छिपाई। नीचा पड़ पड़ तानैं धोकें, धीरा रे हरि आई। ब्राह्मण नाऊं लादण रूड़ा, बूता नाऊं कूता। वै अपहानै पोह बत...

हिन्दी भावार्थ:

शबद संख्या 71 में गुरु जम्भेश्वर जी जोगियों, सिद्धों और बाह्य भेष धारियों को सच्चा योग समझाते हैं। वे सिखाते हैं कि कान छिदवाना, भभूत मलना या वन-कंदराओं में भटकना योग नहीं है, अपितु मन के विकारों को वश में करना और जीव दय...

प्रदर्शित शबद: 101–120 (कुल 120)
101 Raag Gauri

शब्द 101 — शब्द 101: नितही मावस नित संकरांति

ओ३म्-नितही मावस नित संकरांति, नितही नवग्रह वैसैं पांति। नितही गंग हिलोले जाय, सतगुरू चीन्है सहजै न्ह्वाय। निरमल पाणी निरमल घाट निरमल धोबी मांड्यो पाट, जेयो धोबी जाणे धोय घर में मैला वस्त्र रहै न कोय। एक मन एक चित साबण लावै, पहरंतो गाहक अति सुख पावै। ऊंचै नीचे करै पसारा, नाहीं दूजै का संचारा। तिल में तेल पहुप में बास, पांच तत में लियो प्रकाश। बिजली कै चमकै आवै जाय, सहज शून्य में रहै समाय। नै यो गावै न यो गवावै, सुरगे जाते बार न लावै। सतगुरू ऐसा तत बतावै, जुग जुग जीवै बहुरि न आवैं।
शबद संख्या 101 में गुरु जम्भेश्वर जी धार्मिक पाखंड, बाह्य कर्मकांड और मूक प्राणियों पर होने वाली क्रूरता का कड़ा विरोध करते हैं। वे स्पष्ट उपदेश देते हैं कि परमात्मा के दरबार में दया, सत्य, पवित्र आचरण और ईमानदारी ही सच्ची बंदगी है।
In Shabad #101, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He fearlessly denounces hypocrisy, empty rituals, and cruelty against innocent beings, emphasizing that true divine devotion lies in universal compassion, truthful living, and non-violence.
✦ मुख्य संदेश:

धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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102 Raag Bilawal

शब्द 102 — शब्द 102: विष्णु विष्णु भण अजर जरीजै,

ओ३म्-विष्णु विष्णु भण अजर जरीजै, धर्म हुवै पापां छूटीजै। हरि पर हरि को नाम जपीजै, हरियालो हरि आण हरूं। हरी नारायण देव नरूं। आशा सास निरास भईलो, पाईलो मोक्ष दवार खिंणू।
शबद संख्या 102 में गुरु जम्भेश्वर जी अविनाशी परमात्मा विष्णु के अनन्य सुमिरन का संदेश देते हैं। वे मानव को सचेत करते हैं कि सांसारिक भ्रम और मोह-माया नश्वर हैं; केवल प्रभु का नाम और सदाचार ही भवसागर पार कराने वाले हैं।
In Shabad #102, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He inspires ceaseless remembrance of the Supreme Lord Vishnu, reminding the soul that worldly entanglements are fleeting and only spiritual truth liberates from worldly suffering.
✦ मुख्य संदेश:

धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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103 Raag Dhanasri

शब्द 103 — शब्द 103: देखि अदेख्या

ओ३म्-देखि अदेख्या, सुण्या असुण्या, क्षिमारूप तप कीजै। थोड़े माहि थोड़ेरो दीजै, होते नाहिं न कीजै। कृष्णी मया तिहूं लोका साक्षी, अमृत फूल फलीजै। जोय जोय नांव विष्णु के दीजै, अनन्त गुणा लिख लीजै।
शबद संख्या 103 में गुरु जम्भेश्वर जी अविनाशी परमात्मा विष्णु के अनन्य सुमिरन का संदेश देते हैं। वे मानव को सचेत करते हैं कि सांसारिक भ्रम और मोह-माया नश्वर हैं; केवल प्रभु का नाम और सदाचार ही भवसागर पार कराने वाले हैं।
In Shabad #103, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He inspires ceaseless remembrance of the Supreme Lord Vishnu, reminding the soul that worldly entanglements are fleeting and only spiritual truth liberates from worldly suffering.
✦ मुख्य संदेश:

धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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104 Raag Maru

शब्द 104 — शब्द 104: कंचन दांनू कछु न मानूं,

ओ३म्-कंचन दांनू कछु न मानूं, कापड़ दानू कछु न मांनू। चोपड़ दानू कछु न मानू, पाट पटंबर दांनू कछु न मानू। पंच लाख तुरंगम दानू कछु न मांनू, हस्ती दानू न मांनू। तिरिया दानू कछु न मांनू, मानू एक सुचील सिनांनू।
शबद संख्या 104 में गुरु जम्भेश्वर जी मानव जीवन की नश्वरता और सत्कर्मों की महत्ता का बोध कराते हैं। वे प्राणी को सचेत करते हैं कि व्यर्थ के अहंकार को त्यागकर सत्य, शील, संतोष और परमार्थ के मार्ग पर चलें।
In Shabad #104, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He reflects upon the transient nature of human existence, urging seekers to transcend ego and cultivate humility, ethical discipline, and righteous living.
✦ मुख्य संदेश:

धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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105 Raag Sarang

शब्द 105 — शब्द 105: आप अलेख उपन्ना शंभू

ओ३म्-आप अलेख उपन्ना शंभू, निरह निरंजन धंधू कारूं। आपै आप हुआ अपरंपर, न तद चन्हदा नै तद सूरूं। पवण न पाणी धरती आकाश न थीयों। नातद मास न वर्ष न घड़ी न पहरूं, धूप न छाया ताव न सीयों। न त्रिलोक न तारा मंडल, मेघ न माला वर्षा थीयों। न तद जोग नक्षत्र तिथि न बारसीयो, ना तद चवदश पूनो मावसींयो। न तद समद न सागर न गिरि न पर्वत, ना धौलागिर मेर थींयो। ना तद हाट न बाट न कोट न कसबा, बिणज न बाखर लाभ थीयों। यह छत धार बड़े सुलतानो, रावण राणा ये दिवाणा हिन्हदू मुसलमानु। दोय पंथ नाही जूवा जूवा। नातद कामन करसण, जोगन दर्शन। तीर्थ वासी ये मसवासी, ना तद होता जपिया तपिया। न ख चर हींवर बाज थीयो। नातद शूर न वीर न खड़ग न क्षत्री, रण संग्रांम न जूझ न थीयों। ना तद सिंह न स्यावज मिरग पंखेरूं, हंस न मोरा लेल सूवो। रंग न रसना, कापड़ चोपड़, गोहूं चावल भोग थीयों। माय न बाप न बहण न भाई, ना तद होता पूत धीयों। सास न शब्दूं, जीव न पिंडू, नातद होता पुरूष त्रियों। पाप न पुण्य न सती कुसती, नातद होती मया न दया। आपै आप ऊपनां शम्भू, निरह निरंजन धन्हधू कारूं। आपो आप हुआ अपरंपर, हे राजेन्हद्र लेह विचारूं।
शबद संख्या 105 में गुरु जम्भेश्वर जी सृष्टि के मूल तत्वों—जल, वायु, पृथ्वी, वनस्पति और मूक पशु-पक्षियों के संरक्षण का पावन संदेश देते हैं। प्रकृति परमात्मा का ही स्वरूप है, अतः उसकी रक्षा करना प्रत्येक मनुष्य का सर्वोपरि धर्म है।
In Shabad #105, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He emphasizes the sacred sanctity of nature, water, air, trees, and voiceless creatures, teaching that preserving the environment is living worship of the omnipresent Creator.
✦ मुख्य संदेश:

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106 Raag Kalyan

शब्द 106 — शब्द 106: सुंणरे काजी सुंणरे मुल्ला

ओ३म्-सुंणरे काजी सुंणरे मुल्ला सुणियो लोग लुगाई। नर निरहारी एक लवाई, जिन यो राह फुरमाई। जोर जरब करद जे छाड़ो, तो कलमा नाम खुदाई। जिनकै साच सिदक इमान सलामत, जिण यो भिस्त उपाई।
शबद संख्या 106 में गुरु जम्भेश्वर जी धार्मिक पाखंड, बाह्य कर्मकांड और मूक प्राणियों पर होने वाली क्रूरता का कड़ा विरोध करते हैं। वे स्पष्ट उपदेश देते हैं कि परमात्मा के दरबार में दया, सत्य, पवित्र आचरण और ईमानदारी ही सच्ची बंदगी है।
In Shabad #106, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He fearlessly denounces hypocrisy, empty rituals, and cruelty against innocent beings, emphasizing that true divine devotion lies in universal compassion, truthful living, and non-violence.
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धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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107 Raag Kedara

शब्द 107 — शब्द 107: सहजे शीले सेज बिछायों

ओ३म्-सहजे शीले सेज बिछायों, उनमन रह्या उदांसू। जुगे जुगन्तर भवे भवन्तर, कहो कहाणी कासूं। रवि ऊगा जब उल्लू अन्धा, दुनियां भया उजासूं। सतगुरू मिलियो सतपंथ बतायो भ्रांत चुकाई, सुगरां भयो बिसवासूं। जां जां जांण्यो, तहां प्रवाणो। सहज समाणो, जिहिं के मन की पूगीं आसूं। जहां गुरू न चीन्हों पंथ न पायो, तहां गल पड़ी परासूं।
शबद संख्या 107 में गुरु जम्भेश्वर जी सद्गुरु की अनन्य महिमा और मार्गदर्शन की अनिवार्यता प्रकट करते हैं। गुरु-मुख से प्रकट होने वाला ज्ञान ही अज्ञान के अंधकार को मिटाकर मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।
In Shabad #107, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He glorifies the necessity of the True Master (Satguru), whose enlightened guidance dissolves worldly delusion and leads the aspirant towards liberation.
✦ मुख्य संदेश:

धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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108 Raag Todi

शब्द 108 — शब्द 108: हालीलो भल पालीलो सिध पालीलो

ओ३म्-हालीलो भल पालीलो सिध पालीलो, खेड़त सूना राणो। चन्हद सूर दोय बैल रचीलो, गंग जमन दोय रासी। सत संतोष दोय बीज बीजीलो, खेती खड़ी अकासी। चेतन रावल पहरै बैठे, मृगा खेती चर नहीं जाई। गुरू प्रसादे, केवल ज्ञाने, ब्रह्मज्ञाने, सहजे स्नाने, यह घर ऋध सिध पाई।
शबद संख्या 108 में गुरु जम्भेश्वर जी सद्गुरु की अनन्य महिमा और मार्गदर्शन की अनिवार्यता प्रकट करते हैं। गुरु-मुख से प्रकट होने वाला ज्ञान ही अज्ञान के अंधकार को मिटाकर मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।
In Shabad #108, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He glorifies the necessity of the True Master (Satguru), whose enlightened guidance dissolves worldly delusion and leads the aspirant towards liberation.
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109 Raag Ramkali

शब्द 109 — शब्द 109: देखत भूली को मनमानै

ओ३म्-देखत भूली को मनमानै, सेवै बिलोवै बाझ सनानै। देखत भूली का मन चेवै, भीतर कोरा बाहर भेवै। देखत भूली को मन मानै, हरि पर हर मिलियो शैताने। देखत भूली को मन चेवै, आक बखांणैं थंदे मेवै। भूलालो भल भूलालो, भूला भूल न भूलूं। जिहिं ठूंठड़िये पान न होता, ते यूं चाहत फूलूं।
शबद संख्या 109 में गुरु जम्भेश्वर जी अविनाशी परमात्मा विष्णु के अनन्य सुमिरन का संदेश देते हैं। वे मानव को सचेत करते हैं कि सांसारिक भ्रम और मोह-माया नश्वर हैं; केवल प्रभु का नाम और सदाचार ही भवसागर पार कराने वाले हैं।
In Shabad #109, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He inspires ceaseless remembrance of the Supreme Lord Vishnu, reminding the soul that worldly entanglements are fleeting and only spiritual truth liberates from worldly suffering.
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110 Raag Bhairav

शब्द 110 — शब्द 110: मथुरा नगर की राणी होती,

ओ३म्-मथुरा नगर की राणी होती, होती पाटमदे राणी। तीरथ वासी जाती लूटे, अति लूटे खुरसाणी। मानक मोती हीरा लूट्या, जाय बीलूधा दांणी। कवले चूकी बचने हारी, जिहिं औगुण ढांची ढोवै पांणी। विष्णु कूं दोष किसो रे प्राणी, आपे खता कमाणी।
शबद संख्या 110 में गुरु जम्भेश्वर जी अविनाशी परमात्मा विष्णु के अनन्य सुमिरन का संदेश देते हैं। वे मानव को सचेत करते हैं कि सांसारिक भ्रम और मोह-माया नश्वर हैं; केवल प्रभु का नाम और सदाचार ही भवसागर पार कराने वाले हैं।
In Shabad #110, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He inspires ceaseless remembrance of the Supreme Lord Vishnu, reminding the soul that worldly entanglements are fleeting and only spiritual truth liberates from worldly suffering.
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111 Raag Asavari

शब्द 111 — शब्द 111: खरड़ ओढ़ीजै

ओ३म्-खरड़ ओढ़ीजै, तूंबा जीमीजैं, सुरहै दुहीजै, कृत खेत की सींव में लीजैं, पीजै ऊंडा नीरूं। सुर नर देवा बंदी खाने, तित उतरीया तीरूं। भोलम भालम टोलम टालम यूं जाणो त्यूं आणो। म्हे बाचा दइ प्रहलादा सूं सुचेलो गुरू लाजै, कोड़ तेतींसू बाड़ै दीन्हही तिनकी जात पिछाणो।
शबद संख्या 111 में गुरु जम्भेश्वर जी सद्गुरु की अनन्य महिमा और मार्गदर्शन की अनिवार्यता प्रकट करते हैं। गुरु-मुख से प्रकट होने वाला ज्ञान ही अज्ञान के अंधकार को मिटाकर मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।
In Shabad #111, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He glorifies the necessity of the True Master (Satguru), whose enlightened guidance dissolves worldly delusion and leads the aspirant towards liberation.
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112 Raag Sorath

शब्द 112 — शब्द 112: जांके पंथ का भांजणा

ओ३म्-जांके पंथ का भांजणा, गुरू का नींदणा। स्वामी का दुस्मणा, कुफर ते काफरा। कुमली कुपातूं, कुचिला कुधातू। हड़ हड़ा, भड़ हड़ा, दाणबे दूतबा, दाणबे भूतबा, राकसा बोकसा, जांका जन्हम नहीं पर कर्म चंडालूं। और कूं जिभै कर आप कूं पोखणा, जिहिंकी रूवाली दीजसीं, दौरे घुप अंधारौं। तान बे तानबा, छान बे छानबा, तोड़ बे तोड़बा, कूक बे पुकारबा, जांकी कोई न करबा सारूं।
शबद संख्या 112 में गुरु जम्भेश्वर जी सद्गुरु की अनन्य महिमा और मार्गदर्शन की अनिवार्यता प्रकट करते हैं। गुरु-मुख से प्रकट होने वाला ज्ञान ही अज्ञान के अंधकार को मिटाकर मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।
In Shabad #112, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He glorifies the necessity of the True Master (Satguru), whose enlightened guidance dissolves worldly delusion and leads the aspirant towards liberation.
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113 Raag Gauri

शब्द 113 — शब्द 113: ईमा मोमण चीमा गोयम

ओ३म्-ईमा मोमण चीमा गोयम, महंमद फुरमानी। उरका फुरका निवाज फरीजां, खासा खबर बिनाणी। इला रास्ती ईमा मोमन, मारफत मुल्लाणी।
शबद संख्या 113 में गुरु जम्भेश्वर जी मानव जीवन की नश्वरता और सत्कर्मों की महत्ता का बोध कराते हैं। वे प्राणी को सचेत करते हैं कि व्यर्थ के अहंकार को त्यागकर सत्य, शील, संतोष और परमार्थ के मार्ग पर चलें।
In Shabad #113, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He reflects upon the transient nature of human existence, urging seekers to transcend ego and cultivate humility, ethical discipline, and righteous living.
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114 Raag Bilawal

शब्द 114 — शब्द 114: सुरनर तणो सन्हदेसो आयो

ओ३म्-सुरनर तणो सन्हदेसो आयो, सांभलीयो रे जाटो। चांदणै थकै अंधेरै यूं चालो, भूल गया गुरू बाटो। नीर थकै घट थूल यूं राखो, सबल बिगोवो खाटो। मागर मणिया यूं हाथि बिसाहो, कांय हीरा हाथ उसाटो। सुरनर तणो संदेसो आयो, सांभलियो रे।
शबद संख्या 114 में गुरु जम्भेश्वर जी सद्गुरु की अनन्य महिमा और मार्गदर्शन की अनिवार्यता प्रकट करते हैं। गुरु-मुख से प्रकट होने वाला ज्ञान ही अज्ञान के अंधकार को मिटाकर मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।
In Shabad #114, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He glorifies the necessity of the True Master (Satguru), whose enlightened guidance dissolves worldly delusion and leads the aspirant towards liberation.
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115 Raag Dhanasri

शब्द 115 — शब्द 115: म्हे आप गरीबी तन गूदड़ियों,

ओ३म्-म्हे आप गरीबी तन गूदड़ियों, मेरा कारण किरिया देखो। बिन्दो ब्योहरो ब्योर विचारो, भूलस नाही लेखों। नदिये नीरूं, सागर हीरूं, पवणा रूप फिरै परमेश्वर। बिबै बेला निश्चल थाघ अथाघूं। उमज्ज्या समाघू, ते सरवर कित नीरूं। गहर गंभीरू, खिण एक विश्राम लियों, अब जु मंडल भई अवाजूं। म्हे शून्हय मंडल का राजूं।
शबद संख्या 115 में गुरु जम्भेश्वर जी अविनाशी परमात्मा विष्णु के अनन्य सुमिरन का संदेश देते हैं। वे मानव को सचेत करते हैं कि सांसारिक भ्रम और मोह-माया नश्वर हैं; केवल प्रभु का नाम और सदाचार ही भवसागर पार कराने वाले हैं।
In Shabad #115, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He inspires ceaseless remembrance of the Supreme Lord Vishnu, reminding the soul that worldly entanglements are fleeting and only spiritual truth liberates from worldly suffering.
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116 Raag Maru

शब्द 116 — शब्द 116: आयसां मृगछाला पावोडी कांय फिरावो,

ओ३म्-आयसां मृगछाला पावोडी कांय फिरावो, मतूंत आयसां ऊगंतो भांण थंभाऊं। दोनों परबत मेर उजागर, मतूंत अधबिच आन भिड़ाऊं। तीन भुवन की राही रूक्मण, मतूंत थल सिर आंण बसांऊं। नवसै नदी निवासी नाला, मंतूत तो थल सिर आन बहाऊं। सीत बहोड़ी लंका तोड़ी ऐसो कियो संग्रामो, जां बांणै म्हे रावण मारयो। मतूंत आयसां गढ़ हथनापुर सै आन दिखाऊं। जो तू सोने की मृगी कर चलावै, मतूंत घन पाहण बरसाऊं। मृगछाला पावोड़ी कांय फिरावो, मंतूतो उंगतो भाण थंभाऊं।
शबद संख्या 116 में गुरु जम्भेश्वर जी अविनाशी परमात्मा विष्णु के अनन्य सुमिरन का संदेश देते हैं। वे मानव को सचेत करते हैं कि सांसारिक भ्रम और मोह-माया नश्वर हैं; केवल प्रभु का नाम और सदाचार ही भवसागर पार कराने वाले हैं।
In Shabad #116, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He inspires ceaseless remembrance of the Supreme Lord Vishnu, reminding the soul that worldly entanglements are fleeting and only spiritual truth liberates from worldly suffering.
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117 Raag Sarang

शब्द 117 — शब्द 117: टूका पाया मगर मचाया

ओ३म्-टूका पाया मगर मचाया, यूं हंडियाया कुत्ता। जोग जुगत की सार न जाणी, मूंड मुंडाय बिगूता। चेला गुरू अपरचै खीणा, मरते मोक्ष न पायों।
शबद संख्या 117 में गुरु जम्भेश्वर जी सद्गुरु की अनन्य महिमा और मार्गदर्शन की अनिवार्यता प्रकट करते हैं। गुरु-मुख से प्रकट होने वाला ज्ञान ही अज्ञान के अंधकार को मिटाकर मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।
In Shabad #117, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He glorifies the necessity of the True Master (Satguru), whose enlightened guidance dissolves worldly delusion and leads the aspirant towards liberation.
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118 Raag Kalyan

शब्द 118 — शब्द 118: सुरगा हूंते शम्भू आयो

ओ३म्-सुरगा हूंते शम्भू आयो, कहो कूंणा के काजै। नर निरहारी एकलवाई, परगट जोत विराजै। प्रहलादा सूं वाचा कीवी, आयो बारां काजै। बारा मैं सूं एक घटै तो, सू चेलो गूरू लाजै।
शबद संख्या 118 में गुरु जम्भेश्वर जी मानव जीवन की नश्वरता और सत्कर्मों की महत्ता का बोध कराते हैं। वे प्राणी को सचेत करते हैं कि व्यर्थ के अहंकार को त्यागकर सत्य, शील, संतोष और परमार्थ के मार्ग पर चलें।
In Shabad #118, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He reflects upon the transient nature of human existence, urging seekers to transcend ego and cultivate humility, ethical discipline, and righteous living.
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119 Raag Kedara

शब्द 119 — शब्द 119: विष्णु विष्णु तू भणरे प्राणी,

ओ३म्-विष्णु विष्णु तू भणरे प्राणी, पैंके लाख उपाजूं। रतन काया बैकूंठे बासो, तेरा जरा मरण भय भाजूं।
शबद संख्या 119 में गुरु जम्भेश्वर जी अविनाशी परमात्मा विष्णु के अनन्य सुमिरन का संदेश देते हैं। वे मानव को सचेत करते हैं कि सांसारिक भ्रम और मोह-माया नश्वर हैं; केवल प्रभु का नाम और सदाचार ही भवसागर पार कराने वाले हैं।
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120 Raag Todi

शब्द 120 — शब्द 120: विष्णु विष्णु तू भणरे प्राणीं,

ओ३म्-विष्णु विष्णु तू भणरे प्राणीं, इस जीवन कै हावै। क्षण क्षण आव घटंती जावै, मरण दिनों दिन आवै। पालटीयो गढ़ कांय न चेत्यो, घाती रोल भनावै। गुरू मुख मुरखा चढै न पोहण, मनमुख भार उठावै। यूं यूं लाज दूनी की लाजै, त्यूं त्यूं दाब्यो दावै। भलियो होयसो भली बुध आवै, बुरियो बुरी कमावै।
शबदवाणी के इस अंतिम १२०वें शबद में गुरु जम्भेश्वर भगवान जीवन के अंतिम सत्य और काल की गति का स्मरण कराते हैं। वे कहते हैं: हे प्राणी! क्षण-क्षण तेरी आयु घट रही है और मृत्यु दिन-प्रतिदिन निकट आ रही है। सद्गुरु के वचनों को अपनाकर सद्बुद्धि ग्रहण कर, क्योंकि जो भलाई बोएगा वह भलाई पाएगा और जो बुराई कमाएगा वह दुर्दशा को प्राप्त होगा।
In this climactic 120th Shabad of the sacred corpus, Guru Jambheshwar Ji cautions humanity on the swift passing of earthly life. Moment by moment, youth and breaths diminish while mortality approaches. Awaken to the Guru's guidance, for whoever sows righteousness harvests spiritual nobility, and whoever pursues falsehood reaps ruin.
✦ मुख्य संदेश:

धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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