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विश्नोई एटलस
विश्नोई एटलस धरोहर की खोज • विरासत का संरक्षण
✦ शब्दवाणी संग्रह 🏛️ C9.2.1 Authority Corpus Shabad #33 • राग: Raag Gauri

शब्द 33 — शब्द 33: कवण न हुआ कवण न होयसी

श्री गुरु जम्भेश्वर भगवान मुखारविंद से उच्चरित पावन वाणी • 120 अमृत शबद

ॐ

✦ मूल शब्दवाणी (अपरिवर्तनीय मूल पाठ • Sacred & Untouched)

ओ३म्—कवण न हुआ कवण न होयसी, किण न सहयो दुख भारूं। कवण न गइया कवण न जासी, कवण रहया संसारूं। अनेक अनेक चलंता दीठा, कलि का माणस कौन विचारूं। जो चित होता सो चित नाहीं, भल खोटा संसारूं। किसकी माई किसका भाई, किसका पख परवारूं। भूली दुनिया मर मर जावै, न चीन्हों करतारूं। विष्णु विष्णु तू भण रे प्राणी, बल बल बारम्बारूं। कसणी कसबा भूल न बहबा, भाग परापति सारूं। गीता नाद कविता नाऊं, रंग फटारस टारूं। फोकट प्राणी भरमे भूला, भल जे यों चीन्हों करतारूं। जामण मरण बिगोवो चूकै, रतन काया ले पार पहुंचै, तो आवागवण निवारूं।

हिन्दी भावार्थ

भावार्थ — समझने हेतु व्याख्या
संसार में जो कुछ दिखाई देता है वह परिवर्तनशील है। कितने ही लोग आए और चले गए। आज जो संबंध हमारे अपने लगते हैं—माता, पिता, भाई, परिवार—वे भी स्थायी नहीं हैं। मनुष्य संसार की इस अस्थिरता में उलझकर अपने वास्तविक कर्ता को भूल जाता है। इसलिए जीवन की नश्वरता को समझकर परम सत्य को पहचानना चाहिए।

English Translation

Interpretive Rendering & Meaning
Everything visible in the world is subject to change. Countless people have come and gone. Even relationships that appear permanent—mother, father, brother and family—are not everlasting. People become absorbed in this impermanent world and forget the ultimate Creator. Recognizing the transient nature of life, one should seek the fundamental truth.
✦ मुख्य संदेश (Key Message Takeaway)

स्रोत व संपादकीय विवरण (Source & Editorial Information)

✓ C9.2.1 Provenance Verified
प्रामाणिक स्रोत (Source):
संस्करण / पृष्ठ (Edition/Page):
समीक्षक (Reviewed By):
प्रकाशन स्थिति (Status):
महत्वपूर्ण सूचना व अस्वीकरण (Heritage Disclaimer)

मूल शब्दवाणी को यथासंभव मूल स्रोत के अनुसार संरक्षित किया गया है। हिन्दी भावार्थ और English Translation पाठकों की समझ के लिए प्रस्तुत व्याख्यात्मक सामग्री हैं और मूल शब्दवाणी का स्थान नहीं लेते।

The original Shabd Vani is preserved according to the referenced source as closely as possible. The Hindi meaning and English translation are provided as interpretive aids for readers and do not replace the original text.

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