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विश्नोई एटलस
विश्नोई एटलस धरोहर की खोज • विरासत का संरक्षण
✦ श्री गुरु जम्भेश्वर भगवान • प्रामाणिक 120 शब्दवाणी डिजिटल अभिलेखागार (C9.2.1)

शब्दवाणी — 120 Sacred Shabds

सत्य, धर्म, करुणा, जीव-दया एवं पर्यावरण संरक्षण के पावन अमर उपदेश। मूल शब्दवाणी अपरिवर्तनीय सुरक्षित, हिन्दी भावार्थ एवं English translation सहित।

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आज का पावन शबद (Daily Wisdom)

शब्द 71: शब्द 71: धवणा धूजै पाहण पूजै बे फरमाई खुदाई

मूल वाणी:

ओ३म्-धवणा धूजै पाहण पूजै बे फरमाई खुदाई, गुरू के चेले के पाए लागै देखो लोग अन्हयायी। काठी कणजो रूपा रेहण, कापड़ मांह छिपाई। नीचा पड़ पड़ तानैं धोकें, धीरा रे हरि आई। ब्राह्मण नाऊं लादण रूड़ा, बूता नाऊं कूता। वै अपहानै पोह बत...

हिन्दी भावार्थ:

शबद संख्या 71 में गुरु जम्भेश्वर जी जोगियों, सिद्धों और बाह्य भेष धारियों को सच्चा योग समझाते हैं। वे सिखाते हैं कि कान छिदवाना, भभूत मलना या वन-कंदराओं में भटकना योग नहीं है, अपितु मन के विकारों को वश में करना और जीव दय...

प्रदर्शित शबद: 61–80 (कुल 120)
61 Raag Ramkali

शब्द 61 — शब्द 61: कैतैं कारण किरिया चू यो,

ओ३म्-कैतैं कारण किरिया चूक्यो, कैतैं सूरज सामो थूक्यो। कैतैं उभै कांसा मांया, कैतैं छान तिणूका खैंचा। कैतैं ब्राह्मण निवत बहोड्या, कैतैं आवा कोरंभ चोर्या। कैतैं बाड़ी का बन फल तोड़या, कैतैं जोगी का खप्पर फोड्या। कैतैं ब्राह्मण का तागा तोड़्या, कैतैं बैर बिरोध धन लोड़या। कैतैं सूवा गाय का बच्छा बिछोड़्या, कैतैं चरती पिवती गऊ बिडारी। कैतैं हरी पराई नारी, कैतैं सगा सहोदर मारया। कैतैं तिरिया शिर खड़ग उभारया, कैतैं फिरतैं दातण कीयो। कैतैं रण मैं जाय दों दीयो, कैतैं वाट कूट धन लीयो। किसे सरापे लक्ष्मण हुइयों।
शबद संख्या 61 में गुरु जम्भेश्वर जी जोगियों, सिद्धों और बाह्य भेष धारियों को सच्चा योग समझाते हैं। वे सिखाते हैं कि कान छिदवाना, भभूत मलना या वन-कंदराओं में भटकना योग नहीं है, अपितु मन के विकारों को वश में करना और जीव दया पालना ही सच्चा योग है।
In Shabad #61, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He addresses ascetics and mendicants, elucidating that genuine Yoga is not found in external robes or ritual austerities, but in internal purity, self-control, and loving kindness towards all creation.
✦ मुख्य संदेश:

धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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62 Raag Bhairav

शब्द 62 — शब्द 62: नामै कारण किरिया चू यो,

ओ३म्-नामै कारण किरिया चूक्यो, नामै सूरज साम्हो थूक्यो। नामै ऊभै कांसा मांया, नामै छान तिणूका खैं या। नामैं ब्राह्मण निवत बहोड्या, नामैं आवा कोरम्भ चोरया। नामैं बाड़ी का बनफल तोड्या, नामैं जोगी का ख पर फोड्या। नामैं ब्राह्मण का तागा तोड्या, नामैं बैर बिरोध धन लोड्या। नामैं सूवा गाय का बच्छ बिछोड्या, नामैं चरती पिवती गऊ बिडारी। नामैं हरी पराई नारी, नामैं सगा सहोदर मारया। नामैं तिरिया सिर खड़ग उभारया, नामैं फिरतै दातण कीयो, नामैं रण में जाय दौं दियो, नामैं बाट कूट धन लीयो। एक जू ओंगुण रामैं कीयों, अण हुंतो मिरघो मारण गइयो। दूजो औगुण रामै कीयो, एको दोष अदोषा दीयों। बनखंड मैं जद साथर सोइयों, जद को दोष तदो को होइयों।
शबद संख्या 62 में गुरु जम्भेश्वर जी जोगियों, सिद्धों और बाह्य भेष धारियों को सच्चा योग समझाते हैं। वे सिखाते हैं कि कान छिदवाना, भभूत मलना या वन-कंदराओं में भटकना योग नहीं है, अपितु मन के विकारों को वश में करना और जीव दया पालना ही सच्चा योग है।
In Shabad #62, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He addresses ascetics and mendicants, elucidating that genuine Yoga is not found in external robes or ritual austerities, but in internal purity, self-control, and loving kindness towards all creation.
✦ मुख्य संदेश:

धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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63 Raag Asavari

शब्द 63 — शब्द 63: आतर पातर राही रूक्मण

ओ३म्-आतर पातर राही रूक्मण मेल्हा मंदिर भोयो, गढ़ सोवन तेपण मेल्हा रहा छड़ा सी जोयों। रात पडंता पाला भी जाग्या, दिवस तपंता सूरू। ऊन्हा ठाढा पवना भी जाग्या, घन बरसंता नीरूं। दुनीतणा औचाट भी जाग्या, के के नुगरा देता गाल गहीरूं। जिहिं तन ऊना ओढण ओंढां, तिहिं ओढंता चीरूं। जां हाथे जप माली जपां, तहां जपंता हीरूं। बारा काजै पड्यो बिछोहो, संभल संभल झूरूं। राघो सीता हनुवंत पाखों, कौन बंधावत धीरूं। मागर मणिया कांच कथीरूं, हीरस हीरा हीरूं। विखा पटंतर पड़ता आया, पूरस पूरा पूरूं। जे रिण राहे सूर गहीजै, तो सूरज सूरा सूरूं। दुखिया है जे सुखिया होयसैं, करसै राज गहीरूं। माह अंगीठी बिरखा ओल्हो, जेठ न ठंडा नीरूं। पलंग न पोढण, सेज न सोवण कंठ रूलंता हीरूं। इतना मोह न मानै शिंभु, तहीं तहीं सुसीरू। घोड़ा चौली बाल गुदाई, श्री राम का भाई। गुरू की बाचा बहियों, राघों सीता हनुवंत पाखो। दुख सुख कांसू कहियों।
शबद संख्या 63 में गुरु जम्भेश्वर जी सृष्टि के मूल तत्वों—जल, वायु, पृथ्वी, वनस्पति और मूक पशु-पक्षियों के संरक्षण का पावन संदेश देते हैं। प्रकृति परमात्मा का ही स्वरूप है, अतः उसकी रक्षा करना प्रत्येक मनुष्य का सर्वोपरि धर्म है।
In Shabad #63, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He emphasizes the sacred sanctity of nature, water, air, trees, and voiceless creatures, teaching that preserving the environment is living worship of the omnipresent Creator.
✦ मुख्य संदेश:

धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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64 Raag Sorath

शब्द 64 — शब्द 64: मैं कर भूला मांड पिराणी,

ओ३म्-मैं कर भूला मांड पिराणी, काचै कन्ध अगाजूं। काचा कंध गले गल जायसैं, बीखर जैला राजों। गड़ बड़ गाजा कांय बिबाजा, कण बिण कूकस कांय लेणा। कांय बोलो मुख ताजों, भरमी बादी अति अहंकारी। लावत यारी, पशुवां पड़ै भिरांति। जीव बिणासै लाहै कारणै, लोभ सवारथ खायबा खाज अखाजो। जो अति काले ले जम काले तेपण खीणा, जिहिं का लंका गढ़ था राजों। बिन हस्ति पाखर बिन गज गुड़ियों, बिन ढोंला डूमां लाकड़ियो। जाकै परसण बाजा बाजै, सो अपरंपर कांय न जंपो, हिन्हदू मुसलमानों। डर डर जीव कै काजै, रावा रंका राजा रांवां, रावत राजा, खाना खोजां, मीरां मुलका, घंघ फकीरां, घंघा गुरवां, सुरनर देवां, तिमर जू लंगा, आयसां जोयसा, साह पुरोहितां, मिश्रही ब्यासा रूंखां बिरखां, आव घंटती। अतरा माहे कूंण विशेषो, मरणत एको माघों। पशु मुकेरू लहैन फेरूं, कहे ज मेरूं सब जग केरूं, साचै सै हर करै घणेरूं। रिण छाणै यूं बीखर जैला, तातैं मेरूं न तेरूं। विसर गया ते माघूं, रक्तूं नातूं सेतूं धातूं कुमलावै यूं शागू। जीवर पिंड बिछोवा होयसी, ता दिन दाम दुगाणी। आडन पैंको रती बिसोवो सीझै नाही, ओपिंड काम न काजूं। आवत काया ले आयो थो, जातैं सूको जागो। आवत खिण एक लाई थी पर जातैं खिणी न लागो। भाग परापति कर्मा रेखां, दरगै जबला जबला माघौं। बिरखे पान झड़े झड़ जायला, तेपण तेई न लांगू। सेतू दगधूं कवलज कलीयों, कुमलावै यूं शागूं। ऋतुबशंती आई और भलेरा शागूं। भूला तेण गयारे प्राणी, तिहि का खोज न माघूं। विष्णु विष्णु भण लेई न साई, सुर नर ब्रह्मा को न गाई। तातैं जंवर बिन डसीरे भाई, बास बसंतै किवी न कमाई। जंवर तणा जमदूत दहैला, तातैं तेरी कहा न बसाई।
शबद संख्या 64 में गुरु जम्भेश्वर जी सृष्टि के मूल तत्वों—जल, वायु, पृथ्वी, वनस्पति और मूक पशु-पक्षियों के संरक्षण का पावन संदेश देते हैं। प्रकृति परमात्मा का ही स्वरूप है, अतः उसकी रक्षा करना प्रत्येक मनुष्य का सर्वोपरि धर्म है।
In Shabad #64, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He emphasizes the sacred sanctity of nature, water, air, trees, and voiceless creatures, teaching that preserving the environment is living worship of the omnipresent Creator.
✦ मुख्य संदेश:

धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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65 Raag Gauri

शब्द 65 — शब्द 65: तउवा जाग जु गोरख जाज्ज्या,

ओ३म्-तउवा जाग जु गोरख जाग्या, निरह निरंजन निरह निरालंब। जुग छतीसों एकै आसन बैठा बरत्या, अवर भी अबधू जागत जांगू। तउवा त्याग जू ब्रह्मा त्यागा, अवर भी त्यागत त्यागूं। तउवा भाग जो इश्वर मस्तक, अवर भी मस्तक भागूं। तउवा सीर जो ईश्वर गौरी, अवर भी कहियत सीरूं। तउवा बीर जो राम लक्ष्मण, अवर भी कहियत बीरों। तउवा पाग जो दश शिर बांधी, अवर भी बांधत पागो। तउवा लाज जो सीता लाजी, अवर भी लाजत लाजूं। तउवा बाजा राम बजाया, अवर बजावत बाजूं। तउवा पाज जो सीता कारण लक्ष्मण बांधी, अवर भी बांधत पाजूं। तउवा काज जो हनुमत सारा, अवर भी सारत काजूं। तउवा खागज जो कुम्भकरण महरावण खाज्या, अवर भी खावत खागूं। तउवा राज दुर्योधन माण्या, अवर भी माणत राजूं। तउवा राग ज कन्हड़ बांणी, अवर भी कहिये रागूं। तउवा माघ तुरंगम तेजी, टटू तणा भी माघूं। तउवा बागज हंसा टोली, बुगला टोली भी बागूं। तउवा नाग उद्यावल कहिये, गरूड़ सीया भी नागूं। तउवा शागज नागरबेली, कूकर बगरा भी शांगू। जां जां शैतानी करै उफारूं, तां तां महंतज फलियों। जुरा जम राक्षस जुरा जुरिन्द्र, कंश केशी चंडरूं। मधु कीचक हिरणाक्ष हिरणाकुस, चक्र धर बलदेऊं। पावत वासुदेवो मंडलीक कांय न जोयबा, इहिं धर ऊपर रती न रहीबा रांजू।
शबद संख्या 65 में गुरु जम्भेश्वर जी जोगियों, सिद्धों और बाह्य भेष धारियों को सच्चा योग समझाते हैं। वे सिखाते हैं कि कान छिदवाना, भभूत मलना या वन-कंदराओं में भटकना योग नहीं है, अपितु मन के विकारों को वश में करना और जीव दया पालना ही सच्चा योग है।
In Shabad #65, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He addresses ascetics and mendicants, elucidating that genuine Yoga is not found in external robes or ritual austerities, but in internal purity, self-control, and loving kindness towards all creation.
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66 Raag Bilawal

शब्द 66 — शब्द 66: ऊमाज गुमाज पंज गंज यारी

ओ३म्-ऊमाज गुमाज पंज गंज यारी, रहिया कुपहीया शैतान की यारी। शैतान लो भल शैतान लो, शैतान बहो जुग छायो। शैतान की कुबध्यान खेती, यूं काल मध्ये कुचीलू। बे राही बे किरियावन्हत। कुमति दौरै जायसैं, शैतानी लोड़त रलियों। जां जां शैतानी करै उफारूं, तां तां महंत न फलियों। नील मध्ये कुचील करबा, साध संगिणी थूंलूं। पोहप मध्ये परमला जोती, यूं सुरग मध्ये लीलूं। संसार में उपकार ऐसा, यूं घण बरसंता नीरूं। संसार में उपकार ऐसा, यूं रूही मध्ये खीरूं।
शबद संख्या 66 में गुरु जम्भेश्वर जी मानव जीवन की नश्वरता और सत्कर्मों की महत्ता का बोध कराते हैं। वे प्राणी को सचेत करते हैं कि व्यर्थ के अहंकार को त्यागकर सत्य, शील, संतोष और परमार्थ के मार्ग पर चलें।
In Shabad #66, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He reflects upon the transient nature of human existence, urging seekers to transcend ego and cultivate humility, ethical discipline, and righteous living.
✦ मुख्य संदेश:

धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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67 Raag Kalyan

शब्द 67 — शब्द 67 (शुक्ल हंस): श्री गढ़ आल मोत पुर

ओ३म्-श्री गढ़ आल मोत पुर पाटण भुंय नागोरी, म्हे ऊंडे नीरे अवतार लीयो। अठगी ठंगण अदगी दागण, अगजा गंजण, ऊंनथ नाथन, अनू नवावन, काहि को म्हे खैंकाल कीयों। काहीं सुरग मुरादे देसां, काहीं दौरै दीयूं। होम करीलो दिन ठावीलो, सैंस रचीलो छापर नीबी दूण पूरूं, गांव सुंदरीयो छीलै बलदीयो। छंदे मन्हदे बाल दीयो। अजम्है होता नागो बाड़े, रैण थंभै गढ़ गागरणो। कुं कुं कंचन सोरठ मरहठ, तिलंग दीप गढ गागरणो। गढ़ दिल्ली कंचन अर दूणायर, फिर फिर दुनिया परखै लीयों। थटै भवणिया अरू गुजरात। आछो जाई सवा लाख मालवै परवत मांडू मांही ज्ञान कथूं। खुरासाण गढ लंका भीतर। गूगल खेऊं पैरठयों। ईडर कोट उजैणी नगरी, काहिंदा सिंध पुरी विश्राम लीयों। कायं रे सायरा गाजै बाजै, घुरै घुरहरै करै इवांणी आप बलूं। किहिं गुण सायरा मीठा होता, किकिहिं अवगुण हुओ खार खंरूं। जद बासग नेतो मेर मथाणी, समंद बिरोल्यो ढोयऊरू। रैणायर डोहण पांणी पोहण, असुरां बेधी करण छलूं। दहशिर नै जद वाचा दीन्हहीं, तद म्हे मेल्ही अनंत छलूं। दहशिर का दश मस्तक छेद्या, ताणु बाणु लड़ू कुलूं। सोखा बाणु एक बखाणू, जाका बहु परवाणूं। निश्चय राखी तास बलूं, राय विष्णु से बाद न कीजैं। कांय बधारो दैत्य कुलूं। म्हेपण म्हेई, थेपण थेई, सा पुरूषा की लच्छ कुलूं। गाजै गुड़कै से यूं वीहै, जेझल जाकी सैहस फणूं। मेरे माय न बाप न बहण न भाई, साख न सैंण न लोक जणो। बैकुण्ठे विश्वास बिलम्बण, पार गिराये मात खिणू। विष्णुं विष्णुं तू भण रे प्राणी, विष्णु भणन्हता अनन्त गुणूं। सहसे नावें, सहंसे ठावें, सहसे गावै, गाजे बाजे, हीरे नीरे, गगन गहीरे, चवदा भवणे, तिहूं तृलोके जम्बू दीपे, सप्त पताले, अई अमाणो तत समाणो। गुरू फुरमाणो, बहू परवाणो। अइयां, उइयां निरजत सिरजत, नान्हीं मोटी जीया जूंणी एती सास फुरतै सारूं। कृष्णी माया घन बरंषता, म्हे अगिणि गिणूं फूहांरूं। कुण जाणै म्हे देव कुदेवों, कुण जाणै म्हे अलख अभेवों। कुण जाणै म्हे सुर नर देवों, कुण जाणै म्हारा पहला भेवूं। कुण जाणै म्हे ज्ञानी के ध्यानी, कुण जाणै म्हे केवल ज्ञानी। कुण जाणै म्हे ब्रह्मज्ञानी। कुण जाणै म्हे ब्रह्मचारी। कुण जाणै म्हे अल्प अहारी, कुण जाणै म्हे पुरूष कै नारी। कुण जाणै म्हे बाद बिबादी, कुण जाणै म्हे लुब्ध सवादी। कुण जाणै म्हे जोगी के भोगी, कुण जाणै म्हे आप संयोगी। कुण जाणै म्हे भावत भोगी। कुण जाणै म्है लील पती, कुण जाणै म्है सूम क दाता, कुण जाणै म्है सती कुसती, आप ही सूमर आप ही दाता, आप कुसती आपें सती। नव दाणूँ निरवंश गुमाया, कैरव किया फिती फिती। राम रूप कर राक्षस हड़िया, बाण कै आगै वनचर जुड़िया। तद म्हें राखी कमल पती, दया रूप म्हे आप बखांणा संहार रूप म्हे आप हती। सोलै संहस नवरंग गोपी, भोलम भालम, टोलम टालम, छोलम छालम, सहजै राखीलो म्हे कन्हड़ बालो आप जती। छोलबीया म्हे तपी तपेश्वर, छोलब कीया फती फती। राखण मतां तो पड़दै राखां, यूं दाहै पान वणासपती।
शबद संख्या 67 में गुरु जम्भेश्वर जी जोगियों, सिद्धों और बाह्य भेष धारियों को सच्चा योग समझाते हैं। वे सिखाते हैं कि कान छिदवाना, भभूत मलना या वन-कंदराओं में भटकना योग नहीं है, अपितु मन के विकारों को वश में करना और जीव दया पालना ही सच्चा योग है।
In Shabad #67, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He addresses ascetics and mendicants, elucidating that genuine Yoga is not found in external robes or ritual austerities, but in internal purity, self-control, and loving kindness towards all creation.
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धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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68 Raag Maru

शब्द 68 — शब्द 68: वै कंवराई अनन्त बधाई

ओ३म्-वै कंवराई अनन्त बधाई, वै कंवराई सुरग बधाई, यह कंवराई खेह रलाई, दुनीयां रोलै कंवर किसो, कण बिण कूकस रस बिन बाकस बिन किरिया परिवार किसो। अरथूँ गरथूं साहण थाटूं, धूंवै का लहलोर जिसो। सो शारंगधर जपरे प्राणी, जिहिं जपिये हुवै धरम इसो। चलण चलंतै, बास बसंतै, जीव जिवंतै, काया निंवतै, सास फुरंतै किवी न कमाई। तातै जंवर बिन ड़सी रे भाई। सुर नर ब्रह्मा कोउ न गाई, माय न बाप न बहण न भाई। इंत न मिंत न लोक जणो, जंवर तणा जमदूत दहेला। लेखो लेसी एक जणो।
शबद संख्या 68 में गुरु जम्भेश्वर जी सृष्टि के मूल तत्वों—जल, वायु, पृथ्वी, वनस्पति और मूक पशु-पक्षियों के संरक्षण का पावन संदेश देते हैं। प्रकृति परमात्मा का ही स्वरूप है, अतः उसकी रक्षा करना प्रत्येक मनुष्य का सर्वोपरि धर्म है।
In Shabad #68, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He emphasizes the sacred sanctity of nature, water, air, trees, and voiceless creatures, teaching that preserving the environment is living worship of the omnipresent Creator.
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धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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69 Raag Sarang

शब्द 69 — शब्द 69: जबरारे तैं जग डांडीलो

ओ३म्-जबरारे तैं जग डांडीलो, देह न जीती जांणो। माया जाले ले जम काले, लेणा कोण समाणो। काचै पिंडै किसी बड़ाई, भोलै भूल अयांणो। म्हां देखंता देव दाणु, सुर नर खीणा, बीच गया बेराणो। कुभंकरण महरावण होता, अबली जोध अयाणो। कोट लंका गढ बिषमा होता, कांयदा बस गया रावण राणो। नौ ग्रह रावण पाए बन्हध्या, तिस बीह सुर नर शंक भयाणो। ले जम कालें अति बुधवंतो, सीता काज लुंभाणो। भरमी बादी अति अंहकारी, करता गरब गुमानो। तेऊ तो जम काले खीणा, थिर न लाधौ थाणो। काचै पिंड अकाज अफारूं, किसो पिराणी माणो। साबण लाख मजीठ बिगूता, थोथा बाजर घाणो। दुनियां राचै गाजै बाजै, तामें कणू न दाणू। दूनियां के रंग सब कोई राचै, दीन रचै सो जाणो। लोही मांस बिकारो होयसी, मुर्ख फिरै अयाणो। मागर मणियां काच कथीरन राचो, कूड़ा दुनी डफाणो। चलन चलन्हतै, जीव जीवन्हतै, काया निवन्हती सास फुरंतै। कांयरे प्राणी विष्णु न जं यो, कीयो कन्हधै को तांणो। तिहिं ऊपर आवैला जंवर तणा दल, तास किसो सहनाणौ। ताकै शीष न ओढण पाय न पहरण, नैवा झूल झयाणो। धणक न बाण न टोप न अंगा, टाटर चुगल चयाणो। साल सुचंगी घृत सुबासो, पीवण न ठंडा पांणी। सेज न सोवण पंलग न पोढण, छात न मैड़ी माणो। न वां दइया न वां मइयां, नागड़ दूत भयाणो। काचा तोड़ नीकूचा भाखे, अघट घटैं मल माणो। धरती अरू असमान अगोचर, जा तैं जीव न देही जाणो। आवत जावत दीसै नाहीं, साचर जाय अयाणो। जंवर तंणा जमदूत दहैला, मल बेसैला मांणों। तातै कलीयर कागा रोलो, सूना रहयो अयाणो। आयसां जोयसां भणता गुणतां, वार महूर्ता पोथा थोथा। पुस्तक पढिया वेद पुराणों, भूत परेती कांय जपीजै यह पाखण्ड परमाणों। कान्हह दिशावर जेकर चालो, रतन काया ले पार पहूंचो, रहसी आवा जाणो। तांह परेरै पार गिरायें ततकै निश्चल थाणो। सो अपरंपर कांय न जंपो, ततखिण लहो इमाणो। भल मूल सींचो रे प्राणी, यूं तरवर मेलत डालूं। जइया मूल न सी यो, तो जामण मरण बिगोवो। अहनिश करणी थिर न रहिबा, न बं यो जम कालूं। कोई कोई भल मूल सींचीलो, भल तंत बूझीलो। जा जीवन की विध जाणी, जीव तड़ा कछु लाहो होसी मूवा न आवत हांणी।
शबद संख्या 69 में गुरु जम्भेश्वर जी धार्मिक पाखंड, बाह्य कर्मकांड और मूक प्राणियों पर होने वाली क्रूरता का कड़ा विरोध करते हैं। वे स्पष्ट उपदेश देते हैं कि परमात्मा के दरबार में दया, सत्य, पवित्र आचरण और ईमानदारी ही सच्ची बंदगी है।
In Shabad #69, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He fearlessly denounces hypocrisy, empty rituals, and cruelty against innocent beings, emphasizing that true divine devotion lies in universal compassion, truthful living, and non-violence.
✦ मुख्य संदेश:

धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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70 Raag Kalyan

शब्द 70 — शब्द 70: हक हलालूं

ओ३म्-हक हलालूं, हक साच कृष्णों, सुकृत अहल्यो न जाई। भल बाहीलो भल बीजीलो, पवणा बाड़ बलाई। जींव कै काजै खड़ो ज खेती, तामें ले रखवालो रे भाई। दैतानी शैतानी फिरैला, तेरी मत मोरा चर जाई। उन मुन मनवा जीव जतन कर, मन राखी लो ठांई। जीव कै काजै खड़ो ज खेती, वाय दवाय न जाई। न तहां हिरणी न तहां हिरणा न चीन्हों हरि आई, न तहां मोरा न तहां मोरी न ऊंदर चर जाई। कोई गुरू कर ज्ञानी तोड़त मोहा तेरो मन रखवालो रे भाई, जो आराध्यो राव युधिष्ठर सो आराध्यो रे भाई।
शबद संख्या 70 में गुरु जम्भेश्वर जी धार्मिक पाखंड, बाह्य कर्मकांड और मूक प्राणियों पर होने वाली क्रूरता का कड़ा विरोध करते हैं। वे स्पष्ट उपदेश देते हैं कि परमात्मा के दरबार में दया, सत्य, पवित्र आचरण और ईमानदारी ही सच्ची बंदगी है।
In Shabad #70, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He fearlessly denounces hypocrisy, empty rituals, and cruelty against innocent beings, emphasizing that true divine devotion lies in universal compassion, truthful living, and non-violence.
✦ मुख्य संदेश:

धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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71 Raag Kedara

शब्द 71 — शब्द 71: धवणा धूजै पाहण पूजै बे फरमाई खुदाई

ओ३म्-धवणा धूजै पाहण पूजै बे फरमाई खुदाई, गुरू के चेले के पाए लागै देखो लोग अन्हयायी। काठी कणजो रूपा रेहण, कापड़ मांह छिपाई। नीचा पड़ पड़ तानैं धोकें, धीरा रे हरि आई। ब्राह्मण नाऊं लादण रूड़ा, बूता नाऊं कूता। वै अपहानै पोह बतावैं, बैर जगावैं सूता। भूत परेती जाखा खांणी, यह पाखण्ड परवाणो। बल बल कूकस कांय दलीजै, जामे कणूं न दाणू। तेल लीयो खल चोपै जोगी, खलपण सूंघी बिकाणो। कालर बीज न बीज पिराणी, थल सिर न कर निवाणो। नीर गए छीलर कांय सोधो, रीता रह्या इवाणो। भवंता ते फिरंता, फिरंता ते भवंता, मड़े मसाणे। तड़े तड़ंगे, पड़े पखांणे, वहां तो सिद्धि न काई। निज पोह खोज पिराणी, जे नर दावो छोड्यो मेर चुकाई, राह तेतीसों की जाणी।
शबद संख्या 71 में गुरु जम्भेश्वर जी जोगियों, सिद्धों और बाह्य भेष धारियों को सच्चा योग समझाते हैं। वे सिखाते हैं कि कान छिदवाना, भभूत मलना या वन-कंदराओं में भटकना योग नहीं है, अपितु मन के विकारों को वश में करना और जीव दया पालना ही सच्चा योग है।
In Shabad #71, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He addresses ascetics and mendicants, elucidating that genuine Yoga is not found in external robes or ritual austerities, but in internal purity, self-control, and loving kindness towards all creation.
✦ मुख्य संदेश:

धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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72 Raag Todi

शब्द 72 — शब्द 72: वेद कुराण कुमाया जालूं

ओ३म्-वेद कुराण कुमाया जालूं, भूला जीव कुजीव कुजाणी। बसंदर नहीं नख हीरूं, धर्म पुरूष सिरजीवै पूरूं। कलि का माया जाल फिटाकर प्राणी, गुरू की कलम कुरांण पिछांणी। दींन गुमान करैलो ठाली, यूं कण घातै घुण हांणी। साच सिदक शैतान चुकावो, यूं तिस चुकावै पांणी। मैं नर पूरा सरविणजो हीरा, लेसी जांकै हृदय लोयण अंधा रहा इवांणी। निरख लहो नर निरहारी, जिन चोखंड भीतर खेल पसारी। जंपो रे जिण जंपे लाभैं, रतन काया ए कहांणी। काही मारूं काहीं तारूं, किरिया बिहूंणा पर हथ सारूं। शील दहूं उबारूं ऊंन्हहै, एकल एह कहांणी। केवल ज्ञानी थल शिर आयो, परगट खेल पसारी। कोड़ तेतीसों पोह रचावण हारी, यूं छक आई सारी।
शबद संख्या 72 में गुरु जम्भेश्वर जी धार्मिक पाखंड, बाह्य कर्मकांड और मूक प्राणियों पर होने वाली क्रूरता का कड़ा विरोध करते हैं। वे स्पष्ट उपदेश देते हैं कि परमात्मा के दरबार में दया, सत्य, पवित्र आचरण और ईमानदारी ही सच्ची बंदगी है।
In Shabad #72, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He fearlessly denounces hypocrisy, empty rituals, and cruelty against innocent beings, emphasizing that true divine devotion lies in universal compassion, truthful living, and non-violence.
✦ मुख्य संदेश:

धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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73 Raag Ramkali

शब्द 73 — शब्द 73: हरी कंकेहड़ी मंडप मैड़ी जहां

ओ३म्-हरी कंकेहड़ी मंडप मैड़ी जहां हमारा बासा। चार चक नव दीप थरहरै, जो आपो परकासूं। गुणिंया म्हारा सुगणा चेला, म्हे सुगणा का दासूं। सुगणा होय सैं सुरगे जायसैं, नुगरा रहा निरासूं। जा का थान सुहाया घर बैकुण्ठे, जाय संदेसो लायो। अमिया ठमियां इमृत भोजन, मनसा पलंग सेज निहाल बिछायों। जागो जोवो जोत न खोवो, छल जासी संसारूं। भणी न भणबा सुणी न सुणबा, कही न कहबा, खडी न खड़बा, रे भल कृषाणी। ताकै करण न घातो हेलो, कलीकाल जुग बरते जैंलो, तातै नही सुरां सो मेलों।
शबद संख्या 73 में गुरु जम्भेश्वर जी मानव जीवन की नश्वरता और सत्कर्मों की महत्ता का बोध कराते हैं। वे प्राणी को सचेत करते हैं कि व्यर्थ के अहंकार को त्यागकर सत्य, शील, संतोष और परमार्थ के मार्ग पर चलें।
In Shabad #73, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He reflects upon the transient nature of human existence, urging seekers to transcend ego and cultivate humility, ethical discipline, and righteous living.
✦ मुख्य संदेश:

धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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74 Raag Bhairav

शब्द 74 — शब्द 74: कड़वा मीठा भोजन भख ले,

ओ३म्-कड़वा मीठा भोजन भख ले, भखकर देखत खीरूं। धर आखरड़ी साथर सोवण, ओढण ऊना चीरूं। सहजे सोवण पोह का जागण, जे मन रहिबा थीरूं। सुरग पहेली सांभल जिवड़ा, पोह उतरबा तीरूं।
शबद संख्या 74 में गुरु जम्भेश्वर जी मानव जीवन की नश्वरता और सत्कर्मों की महत्ता का बोध कराते हैं। वे प्राणी को सचेत करते हैं कि व्यर्थ के अहंकार को त्यागकर सत्य, शील, संतोष और परमार्थ के मार्ग पर चलें।
In Shabad #74, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He reflects upon the transient nature of human existence, urging seekers to transcend ego and cultivate humility, ethical discipline, and righteous living.
✦ मुख्य संदेश:

धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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75 Raag Asavari

शब्द 75 — शब्द 75: जोगी रे तू जुगत पिछांणी,

ओ३म्-जोगी रे तू जुगत पिछांणी, काजी रे तू कलम गऊ बिणासो कांहे तानी, राम रजा यूं दीन्हही दानी। कान्हह चराई रनबे वांनी, निरगुन रूप हमें पतियानी। थल शिर रह्या अगोचर बानी, ध्याय रे मुंडिया पर दानी। फीटा रे अण होता तानी, अलख लेखो लेसी जानी।
शबद संख्या 75 में गुरु जम्भेश्वर जी धार्मिक पाखंड, बाह्य कर्मकांड और मूक प्राणियों पर होने वाली क्रूरता का कड़ा विरोध करते हैं। वे स्पष्ट उपदेश देते हैं कि परमात्मा के दरबार में दया, सत्य, पवित्र आचरण और ईमानदारी ही सच्ची बंदगी है।
In Shabad #75, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He fearlessly denounces hypocrisy, empty rituals, and cruelty against innocent beings, emphasizing that true divine devotion lies in universal compassion, truthful living, and non-violence.
✦ मुख्य संदेश:

धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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76 Raag Sorath

शब्द 76 — शब्द 76: तन मन धोइये संजम हुइये,

ओ३म्-तन मन धोइये संजम हुइये, हरष न खोइये। यूं यूं दुनिया करै खुवारी, त्यूं त्यूं किरिया पूरी। मुग्धां सेती यूं टल चालो, यूं खड़कै पास धनुरी।
शबद संख्या 76 में गुरु जम्भेश्वर जी मानव जीवन की नश्वरता और सत्कर्मों की महत्ता का बोध कराते हैं। वे प्राणी को सचेत करते हैं कि व्यर्थ के अहंकार को त्यागकर सत्य, शील, संतोष और परमार्थ के मार्ग पर चलें।
In Shabad #76, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He reflects upon the transient nature of human existence, urging seekers to transcend ego and cultivate humility, ethical discipline, and righteous living.
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धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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77 Raag Gauri

शब्द 77 — शब्द 77: भूला लो भल भूला लो,

ओ३म्-भूला लो भल भूला लो, भूला भूल न भूलूं। जिहिं ठूंठडीये पान न होता, ते यूं चाहत फूलूं। को को कपूर घूंटीलो, बिन घूंटी नहीं जाणी। सतगुरू होयबा सहजे चीन्हबा, जाचंध आल बखांणी। ओछी किरिया आवै फिरियां, भ्रांती सुरग न जाई। अन्हत निरंजन लेखो लेसी, पर चीन्हों नहीं लोकाई। कण बिन कूकस रस बिन बाकस, बिन किरिया परिवारूं। हरि बिंन देहरै जांण न पावै, अम्बाराय दवारूं।
शबद संख्या 77 में गुरु जम्भेश्वर जी अविनाशी परमात्मा विष्णु के अनन्य सुमिरन का संदेश देते हैं। वे मानव को सचेत करते हैं कि सांसारिक भ्रम और मोह-माया नश्वर हैं; केवल प्रभु का नाम और सदाचार ही भवसागर पार कराने वाले हैं।
In Shabad #77, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He inspires ceaseless remembrance of the Supreme Lord Vishnu, reminding the soul that worldly entanglements are fleeting and only spiritual truth liberates from worldly suffering.
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धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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78 Raag Bilawal

शब्द 78 — शब्द 78: नवै पोल नवै दरवाजा

ओ३म्-नवै पोल नवै दरवाजा, अहूठ कोड़ रूं राय जड़ी। कांयरे सींचो बनमाली, इंहि बाड़ी तो भेल पड़सी। सुबचन बोल सदा सुहलाली, नाम विष्णु को हरे सुणो। घण तण गड़बड़ कायों वायों, निज मारग तो बिरला कायों। निज पोह पाखो पार असी पर, जाण म गाहि मै गायो गूंणो। श्रीराम में मति थोड़ी, जोय जोय कण विण कूकस कायों लेणो।
शबद संख्या 78 में गुरु जम्भेश्वर जी धार्मिक पाखंड, बाह्य कर्मकांड और मूक प्राणियों पर होने वाली क्रूरता का कड़ा विरोध करते हैं। वे स्पष्ट उपदेश देते हैं कि परमात्मा के दरबार में दया, सत्य, पवित्र आचरण और ईमानदारी ही सच्ची बंदगी है।
In Shabad #78, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He fearlessly denounces hypocrisy, empty rituals, and cruelty against innocent beings, emphasizing that true divine devotion lies in universal compassion, truthful living, and non-violence.
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धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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79 Raag Dhanasri

शब्द 79 — शब्द 79: बारा पोल नवै दरसाजी

ओ३म्-बारा पोल नवै दरसाजी, राय अथरगढ थीरूं। इस गढ कोई थिर न रहिबा, निश्चै चाल गया गुरू पीरूं।
शबद संख्या 79 में गुरु जम्भेश्वर जी सद्गुरु की अनन्य महिमा और मार्गदर्शन की अनिवार्यता प्रकट करते हैं। गुरु-मुख से प्रकट होने वाला ज्ञान ही अज्ञान के अंधकार को मिटाकर मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।
In Shabad #79, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He glorifies the necessity of the True Master (Satguru), whose enlightened guidance dissolves worldly delusion and leads the aspirant towards liberation.
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80 Raag Maru

शब्द 80 — शब्द 80: जे म्हां सूता रैण बिहावै,

ओ३म्-जे म्हां सूता रैण बिहावै, तो बरतै बिम्बा बारूं। चन्हद भी लाजै सूर भी लाजै, लाजै धर गैणारूं। पवणा पाणी येपण लाजै, लाजै बणी अठारा भारूं। सप्त पताल फुणीदा लाजै, लाजै सागर खारूं। जंबूदीप का लोइया लाजै, लाजै धवली धारूं। सिध अरू साधक मुनिजन लाजै, लाजै सिरजण हारूं। सत्तर लाख असी पर जंपा, भले न आवै तारूं।
शबद संख्या 80 में गुरु जम्भेश्वर जी सृष्टि के मूल तत्वों—जल, वायु, पृथ्वी, वनस्पति और मूक पशु-पक्षियों के संरक्षण का पावन संदेश देते हैं। प्रकृति परमात्मा का ही स्वरूप है, अतः उसकी रक्षा करना प्रत्येक मनुष्य का सर्वोपरि धर्म है।
In Shabad #80, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He emphasizes the sacred sanctity of nature, water, air, trees, and voiceless creatures, teaching that preserving the environment is living worship of the omnipresent Creator.
✦ मुख्य संदेश:

धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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