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विश्नोई एटलस
विश्नोई एटलस धरोहर की खोज • विरासत का संरक्षण
✦ श्री गुरु जम्भेश्वर भगवान • प्रामाणिक 120 शब्दवाणी डिजिटल अभिलेखागार (C9.2.1)

शब्दवाणी — 120 Sacred Shabds

सत्य, धर्म, करुणा, जीव-दया एवं पर्यावरण संरक्षण के पावन अमर उपदेश। मूल शब्दवाणी अपरिवर्तनीय सुरक्षित, हिन्दी भावार्थ एवं English translation सहित।

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आज का पावन शबद (Daily Wisdom)

शब्द 71: शब्द 71: धवणा धूजै पाहण पूजै बे फरमाई खुदाई

मूल वाणी:

ओ३म्-धवणा धूजै पाहण पूजै बे फरमाई खुदाई, गुरू के चेले के पाए लागै देखो लोग अन्हयायी। काठी कणजो रूपा रेहण, कापड़ मांह छिपाई। नीचा पड़ पड़ तानैं धोकें, धीरा रे हरि आई। ब्राह्मण नाऊं लादण रूड़ा, बूता नाऊं कूता। वै अपहानै पोह बत...

हिन्दी भावार्थ:

शबद संख्या 71 में गुरु जम्भेश्वर जी जोगियों, सिद्धों और बाह्य भेष धारियों को सच्चा योग समझाते हैं। वे सिखाते हैं कि कान छिदवाना, भभूत मलना या वन-कंदराओं में भटकना योग नहीं है, अपितु मन के विकारों को वश में करना और जीव दय...

प्रदर्शित शबद: 41–60 (कुल 120)
41 Raag Kedara

शब्द 41 — शब्द 41: सुण राजेंद्र, सुण जोगेंद्र

ओ३म्—सुण राजेंद्र, सुण जोगेंद्र, सुण शेषिंद्र, सुण सोफिंद्र, सुण काफिंद्र, सुण चाचिंद्र, सिद्धक साध कहाणी। झूठी काया उपजत विषसत, जां जां नुगरे थिती न जाणी।
हे साधक! अनेक प्रकार के सिद्धों और साधकों की कथाओं को सुनो। यह शरीर नश्वर है और संसार में जो कुछ उत्पन्न होता है वह परिवर्तनशील है। मनुष्य यदि इस नश्वरता को पहचान नहीं पाता, तो वह बाहरी उपलब्धियों और शरीर को ही स्थायी समझने की भूल करता है।
O seeker, listen to the accounts of various Siddhas and spiritual practitioners. The physical body is impermanent, and everything that arises in the world is subject to change. If a person fails to recognize this impermanence, one may mistakenly regard the body and worldly achievements as permanent.
✦ मुख्य संदेश:

शरीर और संसार नश्वर हैं; उनकी अस्थिरता को पहचानना आध्यात्मिक जागृति का आधार है।

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42 Raag Kedara

शब्द 42 — शब्द 42: आयसा काहे काजे खेह भकरूड़े

ओ३म्—आयसा काहे काजे खेह भकरूड़े, सेवो भूत मसानां। घड़े, ऊंढे बरसत बहु मेहा, तिहिंमा कृष्ण चरित बिन पड़ यो न पड़सी पाणी। योगी जंगम नाथ दिगंबर, सन्यासी ब्राह्मण ब्रह्मचारी। मन हट पढ़िया पंडित, काजी मुल्ला खेले आप दुवारी। निश्चै कायूं वायूं होयसे, जे गुरु बिन खेल पसारी।
केवल बाहरी रूप, तपस्या, वेश या धार्मिक पहचान आध्यात्मिक सत्य की प्राप्ति की गारंटी नहीं है। योगी, जंगम, नाथ, दिगंबर, संन्यासी, ब्राह्मण, ब्रह्मचारी, पंडित, काजी या मुल्ला—इनमें से कोई भी बाहरी पहचान अपने आप में पर्याप्त नहीं। गुरु के सही मार्गदर्शन के बिना मनुष्य धार्मिक कर्मों और बाहरी साधनाओं में उलझा रह सकता है।
External appearance, austerity, religious dress or social identity alone does not guarantee spiritual realization. Whether one is a Yogi, Jangam, Nath, Digambar, ascetic, Brahmin, celibate, scholar, Qazi or Mullah, external identity by itself is insufficient. Without the guidance of the true Guru, a person may remain caught in external practices and religious forms.
✦ मुख्य संदेश:

धार्मिक वेश या पहचान से अधिक महत्वपूर्ण गुरु-मार्गदर्शन और वास्तविक आध्यात्मिक आचरण है।

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43 Raag Kedara

शब्द 43 — शब्द 43: ज्यूं राज गयो राजिंदर झूरे

ओ३म्—ज्यूं राज गयो राजिंदर झूरे, खोज गयो नै खोजी। लाख मूंई गिरहायंत झूरे, अरथ बिछूटा लोकी। मोर झड़े, कृषण भी झूरे, बिंद गए नै जोगी। जोगी, जंगम, जपिया, तपिया, जती तपी तक पीरूं। जिहिं तुल भूला पाहण तोले, तिहिं तुल तोलन हीरूं। जोगी सो तो जुग जुग जोगी, अब भी जोगी सोई। थे कान चिरावो चिरघट पहरो, आयंसा यह पाखंड तो जोग न होई। जटा बघारो जीव सिंघारो, आयंसा इहि पाखंड तो जोग न होई।
योग केवल बाहरी वेशभूषा या शरीर पर किए गए चिह्नों से प्राप्त नहीं होता। कान छिदवाना, विशेष वेश धारण करना, जटाएँ रखना या अन्य बाहरी प्रतीक अपनाना अपने आप में योग नहीं हैं। वास्तविक योग वह है जो मनुष्य के भीतर स्थायी रूप से विकसित हो—जो युगों तक साधक के चरित्र और चेतना में दिखाई दे।
Yoga is not attained merely through external appearance or bodily symbols. Piercing the ears, adopting distinctive clothing, wearing matted hair or displaying other outward signs does not by itself constitute true Yoga. True Yoga is an inner state that becomes established in the seeker's character and consciousness.
✦ मुख्य संदेश:

पाखंड और बाहरी प्रतीकों से योग नहीं होता; वास्तविक योग भीतर की साधना और परिवर्तन है।

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44 Raag Kedara

शब्द 44 — शब्द 44: खरतर झोली खरतर कंथा

ओ३म्—खरतर झोली खरतर कंथा, कांध सहे दुःख भारूं। जोग तणी थे खबर न पाई, कायं तज्या घर बारूं। ले सुई धागा सीवण लागा, करड़ कसिद मेखलियों। जड़ जटा धारी लंहैं न पारी, बाद बिबादी बेकरणों। थे वीर जपो बेताल धियावो, कांय न खोजो ततकणों। आयंसा डंडत डंडू मुंडत मुंडू, मुंडत माया मोह किसों। भरमी बादी बादे भूला, कांय न पाली जीव दयूं।
केवल झोली, कंथा, जटा, दंड या अन्य योग-संबंधी बाहरी प्रतीकों को धारण करने से योग सिद्ध नहीं होता। यदि मनुष्य माया और मोह में ही उलझा है तथा जीवों के प्रति दया नहीं रखता, तो बाहरी साधना का वास्तविक उद्देश्य पूरा नहीं होता।
Simply carrying a begging bag, wearing a spiritual garment, growing matted hair, carrying a staff or adopting other external symbols does not constitute true Yoga. If a person remains trapped in attachment and illusion and does not cultivate compassion toward living beings, the deeper purpose of spiritual practice remains unfulfilled.
✦ मुख्य संदेश:

सच्ची साधना बाहरी चिह्नों से नहीं, माया-मोह से ऊपर उठने और जीव-दया से प्रकट होती है।

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45 Raag Sorath

शब्द 45 — शब्द 45: दोय मन दोय दिल सिंधी न कंथा

ओ३म्—दोय मन दोय दिल सिंधी न कंथा, दोय मन दोय दिल पुली न पंथां। दोय मन दोय दिल कही न कथा, दोय मन दोय दिल सुनीं न कथा। दोय मन दोय दिल पंथ दुहेला, दोय मन दोय दिल गुरु न चेला। दोय मन दोय दिल बंधी न बेला, दोय मन दोय दिल रब दुहेला। दोय मन दोय दिल सूई न धागा, दोय मन दोय दिल दुल बिछड़े न भागा। दोय मन दोय दिल भेद न भेड़ा, दोय मन दोय दिल टेव न टेड़ा। दोय मन दोय दिल केल न केला, दोय मन दोय दिल सुरग न मेला।
दोहरे मन और दोहरे हृदय वाला व्यक्ति स्थिर आध्यात्मिक मार्ग पर नहीं चल सकता। मन में द्वंद्व, कपट और अस्थिरता हो तो गुरु-मार्ग में भी दृढ़ता नहीं रहती। आंतरिक एकाग्रता, सत्यनिष्ठा और स्पष्ट मन आध्यात्मिक जीवन के लिए आवश्यक हैं।
A person with a divided mind and divided heart cannot remain firmly established on the spiritual path. When the mind is filled with conflict, duplicity and instability, steadfastness in the Guru's path is lost. Inner unity, sincerity and clarity are essential for spiritual life.
✦ मुख्य संदेश:

मन और हृदय में द्वंद्व नहीं, बल्कि सत्य, एकाग्रता और निष्कपटता होनी चाहिए।

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46 Raag Sorath

शब्द 46 — शब्द 46: जिहिं जोगी के मनही मुद्रा

ओ३म्—जिहिं जोगी के मनही मुद्रा, तनही कंथा पिंडै अगन थंभायो। जिहिं जोगी की सेवा कीजै, तूठो भवजल पार लंघावे। नाथ कहावे मर मर जावे, से क्यूं नाथ कहावे। नांही मोटी जीवा जूंणी, निरजत सिरजत फिर फिर पूछ्या आवै। हमहीं रावल हमहीं जोगी, हम राजा के रायों। जो ज्यूं आवै सो त्यूं थरपां, साचां सूं सत भायो। पाप न छिपां पुण्य न हारां, करां न करतब लावां बारूं। जीव तड़ै को रिजक न मेटूं, मूवा परहथ सारूं। दोरै भिस्त विचालै ऊभा, मिलिया काम सवारूं।
सच्चे योगी के लिए योग बाहरी मुद्रा या वस्त्र नहीं, बल्कि उसकी आंतरिक अवस्था है। गुरु की सेवा और सही साधना मनुष्य को संसाररूपी भवसागर से पार जाने की दिशा देती है। सत्य का आचरण ऐसा होना चाहिए जिसमें पाप को छिपाने का प्रयास न हो, पुण्य का अहंकार न हो और जीव के जीवन-निर्वाह को नष्ट न किया जाए।
For the true Yogi, Yoga is not merely an external posture or garment but an inner state. Service to the Guru and sincere spiritual practice provide the direction for crossing the ocean of worldly existence. Righteous conduct means neither concealing wrongdoing nor taking pride in virtue, while respecting the sustenance and life of living beings.
✦ मुख्य संदेश:

सच्चा योग भीतर की अवस्था है—सत्य, गुरु-सेवा और जीव के प्रति उत्तरदायित्व उसका आधार हैं।

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47 Raag Sorath

शब्द 47 — शब्द 47: काया कंथा मन जो गूंठो

ओ३म्—काया कंथा मन जो गूंठो, सींगी सांस उसासूं। मन मृग राखलै कर कृषाणी, यूं म्हे भया उदासूं। हमहीं जोगी हमहीं जती, हमहीं सती हमहीं राख बा चींतूं। पंच पटण नव थानक साध ले, आद नाथ के भक्तूं।
साधक को अपने शरीर और मन दोनों पर संयम रखना चाहिए। मन को मृग की तरह चंचल मानकर उसे साधना के द्वारा नियंत्रित करने की बात कही गई है। साधना का लक्ष्य केवल बाहरी योगी बनना नहीं, बल्कि भीतर से संयमित, जागरूक और साधित होना है।
The seeker should cultivate discipline over both body and mind. The mind is compared to a restless deer and must be brought under control through spiritual practice. The purpose of practice is not merely to appear as a Yogi externally, but to become disciplined, aware and spiritually established within.
✦ मुख्य संदेश:

मन को साधना ही वास्तविक साधना है।

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48 Raag Sorath

शब्द 48 — शब्द 48: लक्ष्मण लक्ष्मण न कर आयसां

ओ३म्—लक्ष्मण लक्ष्मण न कर आयसां, म्हारे साधां पड़े विरासूं। लक्ष्मण सो जिन लंका लीवी रावण मारयो, ऐसो किया संग्रामूं। लक्ष्मण तीन भुवन को राजा, तेरे एक न गांवूं। लक्ष्मण कै तो लाख चौरासी जीया जूणी, तेरे एक न जीऊं। लक्ष्मण तो गुणवंती जोगी, तेरे बाद विरासूं। लक्ष्मण का तो लक्षण नाहीं, शीश किसी बिध नाऊं।
यह शब्द लक्ष्मण के नाम और उनके चरित्र से जुड़े रूपक के माध्यम से बाहरी पहचान और वास्तविक गुण के बीच अंतर की ओर संकेत करता है। किसी महान नाम या पहचान को धारण कर लेना पर्याप्त नहीं; उसके अनुरूप गुण, आचरण और साधना भी आवश्यक हैं।
Using Lakshman and his heroic character as imagery, this Shabd points toward the distinction between an external name or identity and the qualities that give that identity meaning. Simply carrying a revered name or identity is not enough; one's qualities, conduct and spiritual discipline must correspond to it.
✦ मुख्य संदेश:

नाम और पहचान से अधिक महत्वपूर्ण उनके अनुरूप गुण और आचरण हैं।

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49 Raag Sorath

शब्द 49 — शब्द 49: अवधू अजरा जार ले, अमरा राख ले

ओ३म्—अवधू अजरा जार ले, अमरा राख ले। राख ले विष्णु की धारणा, पाताल का पाणी आकाश कूं चढ़ायले। भेटलै गुरु का दरशणा।
साधक को नश्वरता से ऊपर उठकर उस आध्यात्मिक सत्य को धारण करने का प्रयास करना चाहिए जो भीतर स्थायी है। गुरु के दर्शन और मार्गदर्शन से साधक को उस आंतरिक आध्यात्मिक अनुभव की दिशा मिलती है।
The seeker should strive to rise beyond impermanence and hold firmly to the enduring spiritual truth within. Through the Guru's presence and guidance, the seeker is directed toward this inner spiritual realization.
✦ मुख्य संदेश:

गुरु के मार्गदर्शन से साधक नश्वरता के पार स्थायी सत्य की खोज करता है।

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50 Raag Sorath

शब्द 50 — शब्द 50: तइया सांसू तइया मासूं

ओ३म्—तइया सांसू तइया मासूं, तइया देह दमाई। उत्तम मध्यम क्यूं जाणीजी?, बिबरस देखो लोई। जाके बाद विराम विरांसो सांसो सरसा भोला चालै, ताकै भीतर छोट लकोई। जाके बाद विराम विरांसो सांसो सरसा भोला भागो, ताकै मूले छोट न होई। दिल दिल आप खुदायबंद जायो, सब दिल जायो सोई। जो जिंदो हज काबे जायो, थल सिर जायो सोई। नाम विष्णु के मुसकल खातै, ते काफर सैतानी। हिंदू होय कर तीरथ न्हावै, पिंड भरावै, तेपण रहया इवाणी। जोगी होय कर मूंड मुंडावै, कान चिरावै, गोरख हटड़ी धोके, तेपण रहया इवाणी। तुरकी होय हज काबो धोके, भूला मुसलमाणी। के के पुरुष अवर जागेला, थल जाग्यो निज बाणी। जिहिं कै नादे वेदे शीले शब्दे, लक्ष्मण अंत न पारूं। अंजन मांहि निरंजन आछै, सो गुरु लक्ष्मण कंवारूं।
मनुष्य चाहे हिंदू हो, मुसलमान हो, योगी हो या किसी अन्य धार्मिक पहचान से जुड़ा हो—केवल तीर्थ-स्नान, हज, पिंडदान, सिर मुंडाना, कान छिदवाना या अन्य बाहरी धार्मिक कर्म ही अंतिम सत्य की प्राप्ति नहीं कराते। परम सत्य प्रत्येक हृदय में विद्यमान है। इसलिए बाहरी धार्मिक पहचान से आगे बढ़कर उस सत्य को अपने भीतर पहचानना आवश्यक है। गुरु इस आंतरिक सत्य की पहचान कराने वाला मार्गदर्शक है।
Whether a person is Hindu, Muslim, Yogi or follows another religious identity, external acts such as pilgrimage, ritual bathing, Hajj, funeral offerings, shaving the head or piercing the ears do not by themselves lead to ultimate realization. The Divine Reality is present within every heart. Therefore, one must move beyond external religious identity and recognize that truth within. The Guru guides the seeker toward this inner realization.
✦ मुख्य संदेश:

परम सत्य भीतर है; बाहरी धार्मिक पहचान और कर्मकांड से ऊपर उठकर उसे पहचानना ही वास्तविक साधना है।

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51 Raag Bhairav

शब्द 51 — शब्द 51: सस पाताले भुयं अंतर अंतर राखिलौ

ओ३म्—सस पाताले भुयं अंतर अंतर राखिलौ, म्हे अटला अटळूं। अल्लाह अलेख अडाल अजूनी शंभू, पवन अधारी पिंडजलूं। काया भीतर माया आछै, माया भीतर दया आछै। दया भीतर छाया जिहिंकै, छाया भीतर बिंब फलूं। पूरक पूर पूर ले पौण, भूख नहीं अन्न जीमत कौण।
परम तत्व की व्यापकता और शरीर के भीतर स्थित सूक्ष्म तत्वों की ओर संकेत मिलता है। संसार में माया है, लेकिन उसी के भीतर दया भी विद्यमान है। दया से करुणा और जीवन का वास्तविक प्रतिबिंब विकसित होता है। मनुष्य को बाहरी संसार के साथ-साथ अपने भीतर के तत्व को भी पहचानना चाहिए।
This Shabd points toward the pervasive nature of the Divine Reality and the subtle principles present within the human being. Though worldly existence contains illusion and attachment, compassion is also present within it. The seeker should therefore look beyond the external world and recognize the deeper reality within.
✦ मुख्य संदेश:

माया के बीच दया और आंतरिक सत्य को पहचानना आवश्यक है।

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52 Raag Bhairav

शब्द 52 — शब्द 52: मोह मंडप थाप थाप ले

ओ३म्—मोह मंडप थाप थाप ले, राख राखले, अधरा धरूं आदेश बेसूं। ते नरैसूं, ते नरां अपरं पारूं। रण मध्यै से नर रहियौं, ते नरा अडरा डरूं। ज्ञान खड्गूं जथा हाथै, कोण होयसी हमारा रिपूं।
मोह का संसार मनुष्य के चारों ओर एक मंडप की तरह खड़ा हो जाता है। साधक को इस मोह से ऊपर उठकर ज्ञान को अपने हाथ में शस्त्र की तरह धारण करना चाहिए। जब ज्ञान दृढ़ होता है, तब अज्ञान और मोह उसके वास्तविक शत्रु के रूप में पहचाने जाते हैं।
Attachment builds a pavilion around the human being, creating an environment of illusion. The seeker must rise above this attachment and hold knowledge like a sword. When knowledge becomes firm, ignorance and attachment are recognized as the true enemies.
✦ मुख्य संदेश:

मोह के विरुद्ध ज्ञान ही वास्तविक शस्त्र है।

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53 Raag Bhairav

शब्द 53 — शब्द 53: गुरु हीरा बिणजै लेहम लेहूं

ओ३म्—गुरु हीरा बिणजै लेहम लेहूं, गुरु नै दोष न देणा। पवणा पाणी जमी मेहूं, भार अठारह पर्वत रेहूं। सूरज जोती परे परे, एती गुरु कै शरणूं। केती पवली अरु जल बिंबा, नवसे नदी निवासी नाला, सायर एती जराणा। कोड़ निनाणवे राजा भोगी, गुरु कै आखर कारण जोगी। माया राणी राज तजीलो, गुरु भेटीलो जोग सझीलो। पिंडा देख न झुरणा, कर कूषाणी बेफायात संठो। जो जो जीव पिंडै निसरणा, आदू पहली घड़ी अढाई। स्वर्गै पहुंचता हिरणी हिरणा, सुरां पुरनां तेतीसां मेलो।
गुरु को हीरे के समान मूल्यवान बताया गया है। गुरु के मार्गदर्शन को दोष देने के बजाय उसके द्वारा बताए हुए मार्ग को समझना चाहिए। संसार, प्रकृति, शरीर और भौतिक सुख सभी परिवर्तनशील हैं। माया और सांसारिक राज-पाट को छोड़कर गुरु से मिलने वाला योग और ज्ञान अधिक महत्वपूर्ण है।
The Guru is portrayed as precious as a diamond. Instead of blaming the Guru's guidance, the seeker should understand and follow the path shown by the Guru. The world, nature, body and material pleasures are all impermanent. Beyond worldly power and attachment lies the deeper Yoga and wisdom received through the Guru.
✦ मुख्य संदेश:

माया और सांसारिक आकर्षण से ऊपर उठकर गुरु के ज्ञान और योग को अपनाना चाहिए।

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54 Raag Bhairav

शब्द 54 — शब्द 54: अरुण विघाणीं रे रवि भाणै

ओ३म्—अरुण विघाणीं रे रवि भाणै देव दिवाणै, विष्णु पुराणों। बिंबा बाणो सूर उगाणो, विष्णु बिंबाणो कृष्ण पुराणों। कांय झंख्यो तै आल पिराणी, सुर नर तणीं सबेरूं। इंद्रो फूटो बेला बरती, ताछे हुई बेर अबेरूं। मेरे परै सो जोयण बिंबा लोयण, पुरुष भलो निज बाणी।
सूर्य, प्रकाश और विष्णु के प्रतीकों के माध्यम से ज्ञान और चेतना की ओर संकेत किया गया है। मनुष्य को केवल बाहरी घटनाओं में उलझने के बजाय अपने भीतर के प्रकाश और सत्य को देखना चाहिए। आंतरिक दृष्टि से सत्य को पहचानना ही वास्तविक जागरण है।
Through imagery of the sun, light and Vishnu, this Shabd points toward knowledge and consciousness. Rather than becoming absorbed only in external events, one should recognize the inner light and truth. True awakening comes through inner vision and realization.
✦ मुख्य संदेश:

बाहरी प्रकाश के साथ भीतर के ज्ञान-प्रकाश को पहचानना आवश्यक है।

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55 Raag Bhairav

शब्द 55 — शब्द 55: घटिये कै खोज फिरंता

ओ३म्—घटिये कै खोज फिरंता, सुण सेवता, खोज हस्ती को पायो। लूंकड़िये को खोज फिरंता, सुण सेवता, खोज सुरह को पायो। मोथड़िये कै गूढ़ खणंता, सुण सेवता, लाधो थान सुथानो। रांधड़िये को घाट घड़ंता, सुण सेवता, कंचन सोनो डांयो। हस्ती चढ़ंता गेंवर गुड़ंता, सुणही सुणहां भुंकत कायो।
मनुष्य जिस वस्तु की खोज करता है, उसी के अनुसार उसका प्रयास और परिणाम होता है। कहीं हाथी की खोज है, कहीं पशु की, कहीं छिपे हुए स्थान की और कहीं सोने की। यह शब्द संकेत देता है कि खोज की दिशा ही प्राप्ति को निर्धारित करती है। साधक यदि सत्य की खोज करे तो उसकी यात्रा भी उसी दिशा में आगे बढ़ेगी।
A person searches according to what one seeks, and the nature of the search determines what is eventually found. The Shabd suggests that the direction of one's search shapes one's realization. If the seeker searches for truth, the spiritual journey moves toward that truth.
✦ मुख्य संदेश:

जिस सत्य की खोज करोगे, उसी दिशा में जीवन की यात्रा आगे बढ़ेगी।

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56 Raag Bhairav

शब्द 56 — शब्द 56: कुपाथ कूं दान जु दीयो

ओ३म्—कुपाथ कूं दान जु दीयो, जाणै ऐण अंधेरी चोर जु लीयो। चोर जु लेकर भाखर चढ़ियो, कह जिवड़ा तैं कैनै दीयों। दान सुपाते बीज सुखेते, अमृत फूलै जी। काया कसौटी मन जो गूंठो, जरणा ढाकण दीजे। थोड़े मांहि थोड़े रो दीजे, होते नाह न कीजे। जोय जोय नाम विष्णु के बीजे, अनंत गुण लिख लीजे।
दान का महत्व केवल दान देने में नहीं बल्कि उचित पात्र और उचित उद्देश्य में है। गलत स्थान पर दिया गया दान अंधकार में खो सकता है, जबकि उचित स्थान पर दिया गया दान बीज की तरह फलता है। मनुष्य को अपने मन और शरीर को कसौटी पर कसना चाहिए तथा जीवन में विष्णु-नाम और सद्गुणों का बीज बोना चाहिए।
The value of charity lies not merely in giving, but in giving to the right recipient and for the right purpose. Charity given without discernment may disappear like something lost in darkness, whereas rightful giving grows like a well-planted seed. The seeker should test and discipline the mind and body and sow the seeds of divine remembrance and virtue.
✦ मुख्य संदेश:

सार्थक दान वही है जो उचित स्थान पर हो और सद्गुणों को जन्म दे।

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57 Raag Bhairav

शब्द 57 — शब्द 57: अति बल दानो सब ज्ञानी

ओ३म्—अति बल दानो सब ज्ञानी, गऊ कोट जे तीरथ दानो, बहुत करै अचारूं। ते पण जोय जोय पार न पायो, भण परापति सारूं। घट ऊंधै बरसत बहु मेहा, नीर थयो पण ढालूं। को होयसी राजा दुर्योधन सो, विष्णु सभा मह लागो। तिणहीं तो जोय जोय पार न पायो, अध विच रहियौं ढालूं। जपिया तपिया पोह बिन खपिया, खप खप गया इवाणी। तेज पार पहुंचता नाहीं, तांकी धोती रही असमानी।
बहुत बड़ा दान, तीर्थ और धार्मिक आचार करने के बाद भी मनुष्य अंतिम सत्य तक नहीं पहुँच सकता यदि उसके भीतर वास्तविक ज्ञान और सही आचरण नहीं है। दुर्योधन और अन्य उदाहरणों के माध्यम से संकेत है कि बाहरी सामर्थ्य, धार्मिक कर्म या प्रतिष्ठा अपने आप में मुक्ति का साधन नहीं।
Even great acts of charity, pilgrimage and religious observance cannot by themselves lead a person to the ultimate truth if true knowledge and righteous conduct are absent. Through examples such as Duryodhana, the Shabd suggests that worldly power, external religious acts and prestige alone cannot bring spiritual liberation.
✦ मुख्य संदेश:

बाहरी कर्मों की विशालता से अधिक महत्वपूर्ण आंतरिक ज्ञान और सही आचरण है।

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58 Raag Bhairav

शब्द 58 — शब्द 58: तउवा माण दुर्योधन माण्या

ओ३म्—तउवा माण दुर्योधन माण्या, अवर भी माणत मांग। तउवा दान जु कृष्णी माया, और भी फूलत दानो। तउवा जाण जु सहस्र झूंझ्या, और भी झूंझत जाणो। तउवा बाणजूं सीता कारण लक्ष्मण खेंच्या, और भी खेंचत बाणो। जती तपी तक पीरं ऋषीश्वर, तोल रहया शैतानो। तिण किण खेंच न सके, शंभू तणी कमाण। तेज पार पहुंचता नाहीं, ते कियो आपो भांगो।
दुर्योधन, दान, युद्ध, रामायण के पात्रों और शिव के धनुष जैसे उदाहरणों द्वारा मानवीय शक्ति और अहंकार की सीमाएँ बताई गई हैं। मनुष्य कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, केवल शक्ति के आधार पर अंतिम सत्य प्राप्त नहीं किया जा सकता। अहंकार और बाहरी सामर्थ्य से ऊपर उठना आवश्यक है।
Through examples involving Duryodhana, charity, battles, the Ramayana and Shiva's bow, the Shabd reflects upon the limits of human power and pride. No matter how powerful a person becomes, ultimate realization cannot be attained through power alone. One must rise beyond ego and external strength.
✦ मुख्य संदेश:

शक्ति और अहंकार की सीमा है; आध्यात्मिक सत्य उससे कहीं आगे है।

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59 Raag Bhairav

शब्द 59 — शब्द 59: पढ़ कागल वेदूं, शास्त्र शब्दूं (काल चक्र)

ओ३म्—पढ़ कागल वेदूं शास्त्र शब्दूं, भूला भूले झंख्या आलूं। अहनिश आव घटंती जावै, तेरा सरो न कारज कालूं। विष्णु विष्णु भण रे प्राणी, तज पाखंड जंजालूं। सतगुरु शब्द सार पिछाणो, तो छूटै जम जालूं।
केवल धार्मिक पुस्तकें और शास्त्र पढ़ते रहने से जीवन का कार्य सिद्ध नहीं होता यदि काल और समय की गति को न समझा जाए। दिन-रात निरंतर आयु घट रही है। पाखंड और सांसारिक प्रपंचों को छोड़कर सच्चे सतगुरु के शब्द को समझना और प्रभु स्मरण करना ही मुक्ति दिलाता है।
Merely reading paper treatises and scripture will not accomplish the soul’s destiny if one ignores the relentless march of time. Life slips away day and night. Renounce pretension and deceit; recognize the true essence of the Guru's sacred word to overcome mortality.
✦ मुख्य संदेश:

समय निरंतर घट रहा है; पाखंड छोड़कर सतगुरु शब्द की शरण में आओ।

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60 Raag Bhairav

शब्द 60 — शब्द 60: हस्ती चढ़ंता गेंवर गुड़ंता

ओ३म्—हस्ती चढ़ंता गेंवर गुड़ंता, राज सभा रस भोगूं। जा दिन जम का दूत आवेगा, ता दिन छूटै लोगूं। सुत बित दारा कोई न संगी, अहनिश भज निरजोगूं। विष्णु नाम सार सुख दाता, मिटै सकल भव रोगूं।
हाथी पर चढ़ना, राज-दरबार का सुख और भौतिक ऐश्वर्य भोगना अंततः यहीं छूट जाता है। मृत्यु के समय कोई पुत्र, धन अथवा परिवार साथ नहीं देता। केवल परमात्मा का पावन नाम ही संसार के समस्त दुखों और भवरोगों को मिटाने वाला सच्चा सहारा है।
Riding royal elephants and enjoying royal courtly pleasures will all be left behind. When the final hour arrives, neither family nor wealth accompanies the departing soul. Only the divine remembrance of the Supreme Lord cures worldly affliction and grants eternal peace.
✦ मुख्य संदेश:

भौतिक ऐश्वर्य यहीं रह जाएगा; केवल प्रभु नाम ही अंतिम साथी है।

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