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विश्नोई एटलस
विश्नोई एटलस धरोहर की खोज • विरासत का संरक्षण
✦ श्री गुरु जम्भेश्वर भगवान • प्रामाणिक 120 शब्दवाणी डिजिटल अभिलेखागार (C9.2.1)

शब्दवाणी — 120 Sacred Shabds

सत्य, धर्म, करुणा, जीव-दया एवं पर्यावरण संरक्षण के पावन अमर उपदेश। मूल शब्दवाणी अपरिवर्तनीय सुरक्षित, हिन्दी भावार्थ एवं English translation सहित।

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आज का पावन शबद (Daily Wisdom)

शब्द 71: शब्द 71: धवणा धूजै पाहण पूजै बे फरमाई खुदाई

मूल वाणी:

ओ३म्-धवणा धूजै पाहण पूजै बे फरमाई खुदाई, गुरू के चेले के पाए लागै देखो लोग अन्हयायी। काठी कणजो रूपा रेहण, कापड़ मांह छिपाई। नीचा पड़ पड़ तानैं धोकें, धीरा रे हरि आई। ब्राह्मण नाऊं लादण रूड़ा, बूता नाऊं कूता। वै अपहानै पोह बत...

हिन्दी भावार्थ:

शबद संख्या 71 में गुरु जम्भेश्वर जी जोगियों, सिद्धों और बाह्य भेष धारियों को सच्चा योग समझाते हैं। वे सिखाते हैं कि कान छिदवाना, भभूत मलना या वन-कंदराओं में भटकना योग नहीं है, अपितु मन के विकारों को वश में करना और जीव दय...

प्रदर्शित शबद: 21–40 (कुल 120)
21 Raag Asa

शब्द 21 — शब्द 21: जिहिं कै सार असारूं

ओ३म्—जिहिं कै सार असारूं, पार अपारूं। थाध अथाधूं, उमग्या समांधूं, ते सरवर कित नीरूं। बाजालो भल बाजालो, बाजा दोय गहींरूं। एकण बाजै नीर बरसै, दूजे मही बिरोलत खीरूं। जिहिं कै सार असारूं, पार अपारूं, थाध अथाधूं, उमग्या समांधूं, गहर गंभीरूं। गगन पयालै, बाजत नादूं, धरतल पयालै, नहिं लखायो। दुनियां राति बाद विवादूं, बाद विवादे दाणूं खीणां। ज्यूं पूछे खीणां भंवरी भंवरा, भावै जाण म जाण पिराणी। जोलै का रिप जवरा। भेर बाजातो एक जोजनौं अथवा दोय जोजनौं। मेघ बाजातो पांच जोजनौं अथवा दस जोजनौं। सोई उत्तम लेरे प्राणी, जुगां जुगांणी सत करि जाणौं। गुरु का शब्द ज्यूं बोलो झीणी बाणी। जिहिं का दूरां हूंते दूर सूणीजै, सो शब्द गुणा करूं, गुणा सारूं बले अपारूं।
यह शब्द उस व्यापक और गहरे सत्य की ओर संकेत करता है जिसकी सीमा को मापना कठिन है। संसार में अनेक प्रकार की ध्वनियाँ और घटनाएँ हैं, लेकिन गुरु का शब्द अत्यंत सूक्ष्म और गहन है। साधक को संसार के विवादों और क्षणभंगुर बातों में उलझने के बजाय गुरु-वाणी को ध्यानपूर्वक सुनना और उसके गहरे अर्थ को समझना चाहिए।
This Shabd points toward a profound reality whose depth and extent are difficult to measure. The world contains many sounds and distractions, but the Guru's word is subtle and deeply meaningful. The seeker should not become lost in worldly disputes and temporary concerns. Instead, one should listen carefully to the Guru's word and contemplate its deeper meaning.
✦ मुख्य संदेश:

संसार के शोर से ऊपर उठकर गुरु की सूक्ष्म वाणी को सुनना और समझना चाहिए।

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22 Raag Dhanasari

शब्द 22 — शब्द 22: लो लो रे राजिंदर रायों

ओ३म्—लो लो रे राजिंदर रायों, बाजै बाव सुवायों, आभै अमी झुरायों। कालर करसण कीयां, नेपे कछु न कायों। अइया उत्तम खेती, को को इमृत रायों। को को दाख दिखायों, को को ईख उपायों। को को नींब निबोली, को को ढाक ढकोली। को को तूषण तूंषण बेलीं, को को आक अकायों, को को कछु कमायों। ताकां मूल कुमूलूं, डाल कुडालूं, ताकां पात कुपातूं, ताकां फल बीज कुबीजूं, तो नीर दोष किसायों। क्यों क्यों भूपभागे ऊंगा, क्यों क्यों कर्म विहूंगा। को को चिड़ी चमड़ी, को को उल्लू आयों। ताकै ज्ञान न जोती, मोक्ष न मुक्ति। याके कर्म इसायों, तो नीरे दोष किसायों।
यहाँ खेती और पेड़-पौधों के उदाहरण द्वारा कर्म और उसके परिणाम का संबंध समझाया गया है। जिस प्रकार अलग-अलग बीज, जड़, शाखा, पत्ते और फल अपनी प्रकृति के अनुसार परिणाम देते हैं, उसी प्रकार मनुष्य के कर्म भी परिणाम उत्पन्न करते हैं। यदि कर्म ही गलत हैं तो केवल बाहरी परिस्थितियों को दोष देना उचित नहीं है। ज्ञान के अभाव में मनुष्य अपने कर्मों के परिणाम को समझ नहीं पाता।
Using the imagery of agriculture and plants, this Shabd reflects upon the relationship between actions and their consequences. Just as different roots, branches, leaves, seeds and fruits produce results according to their nature, human actions also produce corresponding consequences. When one's actions are wrong, merely blaming external circumstances is not sufficient. Without wisdom, a person may fail to understand the consequences of their own actions.
✦ मुख्य संदेश:

जैसा कर्म और जैसा बीज, वैसा ही उसका परिणाम।

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23 Raag Dhanasari

शब्द 23 — शब्द 23: साहिल्या हुआ मरण भय भागा

ओ३म्—साहिल्या हुआ मरण भय भागा, गाफिल मरणो धणा डरे। सतगुरु मिलियो सत पंथ बतायो, भ्रांत चुकाई, मरणे बहु उपकार करे। रतन काया सोभंति लाभै, पार गिराये जीव तिरै। पार गिराये सनेही करणी, जंपो विष्णु न दोष दिल करणी। जंपो विष्णु न निंदा करणी, मांडो कांध विष्णु कै सरणी। अंतरा बोल करो जे साचा, तो पार गिराय गुरु की वाचा। रवणां ठवणां चवरा भवनां, तांहि परे रे रतन काया छैं, लाभै किसे विचारे। जे नविये नवणीं, खविये खवणी, जरिये जरनी, करिये करणीं, तो सीख हुआ घर जाइये। रतन काया सांचे की ढाली, गुरु प्रसादे केवल ज्ञाने, धर्म आचारे, शीले संजमे, सतगुरु तूठे पाइये।
सच्चे गुरु की प्राप्ति मनुष्य को सही मार्ग दिखाती है और मृत्यु के भय तथा भ्रम को दूर करती है। मानव शरीर अत्यंत मूल्यवान है; इसका उपयोग सत्य, धर्म और आत्मज्ञान की प्राप्ति के लिए होना चाहिए। गुरु की वाणी को सत्य रूप में स्वीकार करके धर्माचरण, शील, संयम और ज्ञान का जीवन अपनाना चाहिए। यही मानव जीवन की वास्तविक सार्थकता है।
Finding the true Guru provides the seeker with the right path and helps overcome fear of death and confusion. Human life is precious and should be used for the pursuit of truth, Dharma and spiritual wisdom. By following the Guru's truthful guidance and cultivating righteous conduct, discipline, character and knowledge, one can make meaningful use of human life.
✦ मुख्य संदेश:

सतगुरु सही मार्ग दिखाकर भ्रम दूर करता है; मानव जीवन को धर्म, ज्ञान, शील और संयम में लगाना चाहिए।

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24 Raag Dhanasari

शब्द 24 — शब्द 24: आसण बैसण कूड़ कपटण

ओ३म्—आसण बैसण कूड़ कपटण, कोई कोई चीन्हत वोजू बाटे। वोजू बाटे जे नर भया, काचीं काया छोड़ कैलाशे गया।
मनुष्य अनेक प्रकार के आसन, बैठने की विधि और बाहरी साधना कर सकता है, लेकिन यदि उसके भीतर कपट और असत्य है तो केवल बाहरी साधना पर्याप्त नहीं। जो वास्तविक मार्ग को पहचानता है, वह नश्वर शरीर से परे आत्मिक सत्य की ओर बढ़ता है।
A person may practice various postures, disciplines and outward forms of spiritual practice, but if deceit remains within, external practice alone is insufficient. One who recognizes the true path moves beyond attachment to the perishable body toward spiritual truth.
✦ मुख्य संदेश:

बाहरी साधना से अधिक आवश्यक आंतरिक सत्य और निष्कपटता है।

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25 Raag Bilawal

शब्द 25 — शब्द 25: राज न भूलीलो, राजेंद्र

ओ३म्—राज न भूलीलो, राजेंद्र, दुनी न बंधै मेरूं। पवणा झोले बीखर जैला, धुंवर तणाजे लोरूं। बोलस आभै तणा लहलोरें, आड़ा डंबर केती बार बिलंबणा। यो संसार अनेहूं। भूला प्राणी विष्णु न जंप्यो, मरण विसारो कैहूं। जहां देखता देव तणां, सुर नर खीणा, जंबू द्वीप रुणां न रहिया। नदिये नीर न छीलर पाणी, धुंवर तणा जे मेहूं। हंस उड़ाणो, पंथ बिलंब्यो, आसा सांस निरास भईलो, ताथे होयसी रंड निरंडी देहूं। पवणा झोले, बीखर जैला, गैंण बिलंबी खेहूं।
संसार की सत्ता, संपत्ति और भौतिक उपलब्धियाँ स्थायी नहीं हैं। हवा के झोंके और धुएँ की तरह संसार की स्थिति बदलती रहती है। मनुष्य यदि परम सत्य को भूलकर संसार में ही उलझा रहता है तो मृत्यु के समय सब कुछ पीछे छूट जाता है। इसलिए जीवन रहते हुए सत्य की खोज करनी चाहिए।
Worldly power, possessions and material achievements are impermanent. Like wind and smoke, worldly circumstances continually change. If a person forgets the Divine Reality and becomes completely absorbed in worldly concerns, everything is eventually left behind at death. Therefore, the seeker should pursue truth while alive.
✦ मुख्य संदेश:

संसार की संपत्ति और सत्ता क्षणभंगुर हैं; सत्य की खोज ही स्थायी आध्यात्मिक दिशा है।

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26 Raag Bilawal

शब्द 26 — शब्द 26: घण तण जीम्या, को गुण नाहीं

ओ३म्—घण तण जीम्या, को गुण नाहीं, मल भरिया भंडारूं। आगे पीछे माटी झूले, भूला बहेंज भारूं। घणा दिना का बड़ा न कहिबा, बड़ा न लंघिबा पारूं। उत्तम कुली का उत्तम न होयबा, कारण किरिया सारूं। गोरख दीठां सिद्ध न होयबा, पोह उतरबा पारूं। कलजुग बरतै चेतो लोई, चेतो चेतण हारूं। सतगुरु मिलियो सत पंथ बतायो, भ्रांत चुकाई बिदगा रातें उदगा गारूं।
केवल अच्छे कुल में जन्म लेना या बाहरी प्रतिष्ठा प्राप्त करना मनुष्य को श्रेष्ठ नहीं बनाता। वास्तविक श्रेष्ठता उसके कर्म, आचरण और चेतना से निर्धारित होती है। कलियुग जैसे कठिन समय में मनुष्य को जागरूक रहना चाहिए। सतगुरु का मार्ग भ्रम को दूर करके सही पथ दिखाता है।
Being born into a respected family or possessing social status does not by itself make a person spiritually noble. True nobility is determined by conduct, actions and awareness. In difficult times, a person should remain spiritually alert. The true Guru removes confusion and shows the righteous path.
✦ मुख्य संदेश:

कुल, प्रतिष्ठा और बाहरी पहचान नहीं—कर्म, चेतना और आचरण मनुष्य को श्रेष्ठ बनाते हैं।

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27 Raag Bilawal

शब्द 27 — शब्द 27: पढ़ कागल वेदूं, शास्त्र शब्दूं

ओ३म्—पढ़ कागल वेदूं, शास्त्र शब्दूं, पढ़ सुन रहिया, कछु न लहिया। नुगरा उमंग्या, काठ पखाणो, कागल पोथा ना कछु थोथा, ना कछु गाया गीऊं। किण दिशा आवै, किण दिशा जावै, माई लखे न पीऊं। इण्डे मध्ये पिंड उपना, पिंडा मध्ये बिंब उपना, किण दिस पैठा जीऊं। इण्डा मध्ये जीव उपना। सुपणे काजी, सुपणे मुल्लां, पीर ऋषेश्वर रेमस वासी, तीरथ वासी किण घट पैठा जीऊं। कंसा शब्दे कंस लुकाई, बाहर गई न रीऊं। क्षिण आवै, क्षिण बाहर जावै, रूत कर बरसत सीऊं। सोवन लंक मंदोदरी काजे, जोय-जोय भेद विभीषण दीयो।
केवल वेद, शास्त्र और पुस्तकों को पढ़ते रहना पर्याप्त नहीं है यदि उनके ज्ञान का वास्तविक अनुभव नहीं हुआ। शरीर और जीवन के भीतर स्थित चेतना के मूल को पहचानना आवश्यक है। यह शब्द बाहरी ज्ञान और आंतरिक अनुभूति के अंतर पर विचार करता है। ज्ञान तभी सार्थक है जब वह जीवन के वास्तविक रहस्य को समझने में सहायता करे।
Merely reading the Vedas, scriptures and books is not sufficient if their deeper truth is not experienced. One must seek to understand the source of consciousness within the body and life. This Shabd reflects upon the difference between external learning and inner realization. Knowledge becomes meaningful when it helps the seeker understand the deeper mystery of existence.
✦ मुख्य संदेश:

पुस्तक पढ़ना ज्ञान की शुरुआत है; वास्तविक ज्ञान आत्म-अनुभूति से पूर्ण होता है।

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28 Raag Bilawal

शब्द 28 — शब्द 28: मछली मच्छ फिरै जल भीतर

ओ३म्—मछली मच्छ फिरै जल भीतर, तिहिं का माथ न जोयबा। परम तत है ऐसा, आंछै उरवार न ताछै पारूं। ओवड़ छेवड़ कोई न थीयों, तिहिं का अंत लहीबा कैसा। ऐसा लो भल ऐसा लो, भल कहो न कहा गहींरूं। परम तत कै रूप न रेखा, लीक न लेहूं, खोज न खेहूं, वर्ण बिबरजत, भावै खोजो बावन वीरूं। मीन का पंथ मीन ही जाणैं, नीर सरंगम रहियूं। सिद्ध का पंथ कोई साधु जाणत, बीजा बरतन बहियूं।
मछली जिस प्रकार जल में रहती है लेकिन जल की व्यापकता का पूरा अनुभव शब्दों में नहीं कर सकती, उसी प्रकार परम तत्व हमारे अस्तित्व में उपस्थित होकर भी सामान्य बुद्धि से पूरी तरह सीमित नहीं किया जा सकता। परम सत्य का कोई निश्चित रूप, रेखा या सीमा नहीं है। अलग-अलग साधक अपनी साधना के अनुसार उसके अनुभव तक पहुँचते हैं।
Just as a fish lives within water yet cannot fully comprehend the vastness of the water through ordinary understanding, the ultimate Reality is present within existence but cannot be completely confined by ordinary intellect. The Supreme Reality has no fixed form, boundary or outline. Different seekers approach its realization through their own spiritual discipline.
✦ मुख्य संदेश:

परम तत्व असीम है; उसे केवल बाहरी रूप या सीमाओं से नहीं समझा जा सकता।

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29 Raag Bilawal

शब्द 29 — शब्द 29: इलोल सागर (गुरु कै शब्द असंख्य प्रबोधी)

ओ३म्—गुरु कै शब्द असंख्य प्रबोधी, खारसमंद परीलो। खारसमंद परै परै, चोखड़ खारूं, पहला अंत न पारूं। अनंत करोड़ गुरु की दावण बिलंबी, करणी सांच तरीलो। सांझे जमों सबेरे थापण, गुरु की नाथ डरिलो। भगवीं टोपी थल शिर आयो, हेत मिलाण करी लो। अंबाराय बधाई बाजै, हृदय हरि सिंवरिलो। कृष्ण माया चोखड़ कृषाणी, जंबू दीप चरिलो। जंबूद्वीप ऐसो चर आयो, इसकंदर चेतायो। मान्यो शील हकीकत जाग्यो, हक की रोजी धायो। ऊंनथ नाथ कुफह का पोहमा आग्या, पोहका धुर पहुंचायो। मोरै धरती ध्यान बनस्पति वासो, ओजूं मंडल छायो। गीदड़ मेर पगां पै पर्वत, मनसा छोड़ तुलायो। एजुग चार छत्तीसां और छत्तीसां। आसरा बहै अंधारी, म्हे तो खड़ा बिहायो। तेतीसां की बरग बहां म्हे, बारां काजे आयो। बारां थाप घणा न ठाहर, मतांतो डीले डीले कोड़ रचायो। म्हे ऊंचे मंडल का रायो। समंद बिरोल्यो बासंग नेतो, मेर मथांगी थायो। संसा अर्जुन मारयो कारज सारयो, जद म्हे रहस दामामा बायो। फेरी सीत लई जद लंका, तद म्हे ऊंचे थायो। दस सिर का दस मस्तक छेदा, बाण भला निरतायो। होजी नाहीं, लह लह खेलत जायों। कंसा सुरसूं जुवै रमियां, सहजै नंद हरायों। कूंत कुंवारी कर्ण समानो, तिहिंका पोह पोह पड़दा छायों। पाहे लाख मजीठी पाखो, बन फल राता पींजू, पाणी के रंग धायों। तेपण चाखण चाख्या, भाखण भाख्या। जोय जोय लियो फल, फल केर रसायों। थे जोग न जोग्या भोग न भोग्या, न चीन्हों सुर रायों। कप बिन कूकस कांय पीसो, निश्चै सरी न काहों। म्हे अबधू निर पख जोगी, सहज नगर का रायों। जो ज्यूं आवै सो त्यूं थरपां, साचा सूं सत भायों। मोरै मनहीं मुद्रा, तनहीं कंथा, जोग मार्ग सहडायों। सात सायर म्हे कुरलै कीयौं, ना म्हे पीया न रह्या तिसायों। डाकण शाकण निंद्रा खुध्या, ये म्हारे तांबे कूप छिपायों। म्हारे मनहीं मुद्रा तनहीं कंथा, जोग मार्ग सह लीयो। डाकण शाकण निंद्रा खुध्या, ऐ मोरे मूल न थीयों।
यह विस्तृत शब्द गुरु-वाणी की विशालता और साधना के गहरे मार्ग को रूपकों तथा विभिन्न कथात्मक संकेतों के माध्यम से प्रस्तुत करता है। गुरु का शब्द अनंत है और उसकी गहराई को पूरी तरह पार करना कठिन है। इसमें साधक की आंतरिक यात्रा, संसार के मोह से ऊपर उठना, योग के बाहरी प्रतीकों के बजाय भीतर की साधना, मन की मुद्रा और सहज योग जैसे भाव दिखाई देते हैं।
This extended Shabd presents the vastness of the Guru's word and the depth of the spiritual path through rich imagery and narrative references. The Guru's word is described as immense and difficult to fully comprehend. The Shabd reflects upon the seeker's inner journey, rising above worldly attachment, and the distinction between external symbols of yoga and genuine inner practice. Inner discipline and the state of the mind become central to the spiritual path.
✦ मुख्य संदेश:

गुरु-वाणी की गहराई अनंत है; वास्तविक योग बाहरी प्रतीकों से अधिक आंतरिक साधना और सहज अवस्था में है।

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30 Raag Bilawal

शब्द 30 — शब्द 30: कूं ची वाला शब्द (आयो हुंकारो जीवड़ो बुलायो)

ओ३म्—आयो हुंकारो जीवड़ो बुलायो, कह जीवड़ा कै करण कमायो। थरहर कंपै जीवड़ो डोलै, उत माई पीव न कोई बोलै। सुकृत साथ सगाई चालै, स्वामी! पवणा पाणी नवण करतों, चंदे सूरे शीश निवंतो, विष्णु सुरां पोह पूछ लहंतो। इहिं खोटे जन मंतर स्वामी, अहनिश तेरो नाम जपतों। निगम कमाई मांगी मांग, सुरपति साथ सुरा सू रंग। सुरपति साथ सुरां सूं मेलो, निज पोह खोज ध्याइये। भोम भली कृष्ण भी भला, बूढ़ो है जहां बाहिये। करषण करो सनेही खेती, तिसिया साख निपायिये। लुणचुण लीयो मुरा तब कीयो, कण काजे खड़ गाहिये। कणतुस झेड़ो होय नवैड़ो, गुरुमुख पवण उड़ाइये। पवणा डोले तुस डुलेलो, कपले अर्थ लगाइये। यूं क्यों भलो जे आप न जरीये, औरां अजुर जराइये। यूं क्यों भलो जे आप न फरिये, औरां अजुर फराइये।
मनुष्य को अपने जीवन और कर्मों का विचार करना चाहिए। जीवन में किए गए अच्छे और बुरे कर्म साथ चलते हैं। केवल बाहरी पूजा या मंत्र-जप पर्याप्त नहीं; व्यक्ति को अपने कर्म, खेती, श्रम, व्यवहार और दूसरों के प्रति अपने आचरण को भी शुद्ध करना चाहिए। अपने लिए जो उचित नहीं है, वह दूसरों के लिए भी नहीं करना चाहिए। यही आत्म-जांच और नैतिक जीवन का आधार है।
A person should reflect upon life and one's own actions. The consequences of good and bad actions accompany the individual. External worship or repetition of sacred words alone is not enough; one's work, conduct, relationships and treatment of others must also be righteous. What one would not wish for oneself should not be imposed upon others. Such self-reflection and ethical conduct form an important foundation of spiritual life.
✦ मुख्य संदेश:

अपने कर्मों को शुद्ध करो और दूसरों के साथ वही व्यवहार करो जो अपने लिए उचित समझते हो।

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31 Raag Gauri

शब्द 31 — शब्द 31: भल मूल सींचो रे प्राणी

ओ३म्—भल मूल सींचो रे प्राणी, ज्यूं का भल बुद्धि पावै। जामण मरण भव काल जु चूके, तो आवागवण न आवै। भल मूल सींचो रे प्राणी, ज्यूं तरवर मेलत डालूं। हरि परि हरि की आण न मानी, झंखा झूल्या आलूं। देवा सेवा टेव न जाणी, न बंध्या जम कालूं। भूले प्राणी विष्णु न जंप्यो, मूल न खोज्यो, फिर-फिर जोया डालूं। बिन ऐणायार हीरे नीरे, नग न सीपे तके न खोला नालूं। चलन चलते, बास बसंते, जीव जिवंते, सांस फुरंते, काया निवंती, कांय रे प्राणी विष्णु न धाती भालूं। घड़ी घटंतर पहर पटंतर, रात दिनंतर, मास पखंतर, क्षिण ओल्हरबा कालूं। मीठा झूठा मोह बिंबण, मकर समाया जालूं। कबहूं को बाइंदो बाजत लोई, पगड़िया मस्तक तालूं। जीवां जूणी पड़ै परासा, ज्यूं झींवर मच्छा जालूं। पहले जिवड़ो चेध्यो नाहीं, अब ऊंडी पड़ी पहारूं। जीव र पिंड बिछोड़ो होयसी, ता दिन थाक रहै सिर मारूं।
जैसे वृक्ष को स्वस्थ रखने के लिए उसकी जड़ों को सींचना आवश्यक है, वैसे ही मनुष्य को अपने जीवन के मूल—सत्य, सद्बुद्धि और धर्म—को मजबूत करना चाहिए। जीवन निरंतर बीत रहा है। जन्म, मृत्यु, दिन-रात और समय का चक्र चलता रहता है। संसार का मोह मनुष्य को अपने जाल में बाँधता है, लेकिन मृत्यु के समय शरीर और जीव का संबंध समाप्त हो जाता है। इसलिए जीवन रहते हुए मूल सत्य को पहचानना और सही मार्ग अपनाना आवश्यक है।
Just as a tree must be nourished at its roots, a person must strengthen the roots of life—truth, wisdom and righteous conduct. Life continually passes through birth, death, day and night. Worldly attachment can trap a person like a net, but at death the connection between the embodied being and the body comes to an end. Therefore, one should recognize the fundamental truth and follow the righteous path while there is still time.
✦ मुख्य संदेश:

मूल को सींचो—समय रहते सत्य, सद्बुद्धि और धर्म को जीवन में स्थापित करो।

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32 Raag Gauri

शब्द 32 — शब्द 32: कोड़ गऊ जे तीरथ दानौं

ओ३म्—कोड़ गऊ जे तीरथ दानौं, पंच लाख तुरंगम दानौं। कण कंचन पाट पटंबर दानौं, गज गेंवर हस्ती अति बल दानौं। करण दधीचि सिवर बल राजा, श्री राम ज्यूं बहुत करे आचारूं। जां जां बाद विवादि अति अहंकारी लबद सबादी, कृष्ण चरित बिन नाहिं उतरिबा पारूं।
मनुष्य बहुत बड़े-बड़े दान कर सकता है—गाय, घोड़े, सोना, वस्त्र, हाथी आदि। धार्मिक और सामाजिक रूप से बड़े कर्म भी किए जा सकते हैं। लेकिन यदि उनमें अहंकार, विवाद और आत्म-प्रदर्शन जुड़ा हुआ है, तो केवल बाहरी कर्म मनुष्य को वास्तविक आध्यात्मिक पार नहीं पहुँचा सकते। सच्चे चरित्र और सही आचरण के बिना साधना अधूरी है।
A person may perform great acts of charity—giving cows, horses, gold, clothing and elephants—and may perform many celebrated religious deeds. Yet if such actions are accompanied by ego, argument and self-display, external acts alone cannot lead one across the spiritual path. Without righteous character and conduct, spiritual practice remains incomplete.
✦ मुख्य संदेश:

दान और धार्मिक कर्म तभी सार्थक हैं जब उनके साथ अहंकार-रहित चरित्र और सच्चा आचरण हो।

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33 Raag Gauri

शब्द 33 — शब्द 33: कवण न हुआ कवण न होयसी

ओ३म्—कवण न हुआ कवण न होयसी, किण न सहयो दुख भारूं। कवण न गइया कवण न जासी, कवण रहया संसारूं। अनेक अनेक चलंता दीठा, कलि का माणस कौन विचारूं। जो चित होता सो चित नाहीं, भल खोटा संसारूं। किसकी माई किसका भाई, किसका पख परवारूं। भूली दुनिया मर मर जावै, न चीन्हों करतारूं। विष्णु विष्णु तू भण रे प्राणी, बल बल बारम्बारूं। कसणी कसबा भूल न बहबा, भाग परापति सारूं। गीता नाद कविता नाऊं, रंग फटारस टारूं। फोकट प्राणी भरमे भूला, भल जे यों चीन्हों करतारूं। जामण मरण बिगोवो चूकै, रतन काया ले पार पहुंचै, तो आवागवण निवारूं।
संसार में जो कुछ दिखाई देता है वह परिवर्तनशील है। कितने ही लोग आए और चले गए। आज जो संबंध हमारे अपने लगते हैं—माता, पिता, भाई, परिवार—वे भी स्थायी नहीं हैं। मनुष्य संसार की इस अस्थिरता में उलझकर अपने वास्तविक कर्ता को भूल जाता है। इसलिए जीवन की नश्वरता को समझकर परम सत्य को पहचानना चाहिए।
Everything visible in the world is subject to change. Countless people have come and gone. Even relationships that appear permanent—mother, father, brother and family—are not everlasting. People become absorbed in this impermanent world and forget the ultimate Creator. Recognizing the transient nature of life, one should seek the fundamental truth.
✦ मुख्य संदेश:

संसार और उसके संबंध परिवर्तनशील हैं; कर्ता और मूल सत्य की पहचान ही वास्तविक जागृति है।

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34 Raag Gauri

शब्द 34 — शब्द 34: फुंरंग फुंहारे कृष्णी माया

ओ३म्—फुंरंग फुंहारे कृष्णी माया, घण बरसंतां सरवर नीरे। तिरी तिरन्तै तीर, जे तिस मरै तो मरियूं। अण्णों धणों दूध दहींयूं, घीऊं मेऊं टेऊं जे लाभंता, भूख मरै तो जीवन ही बिन सरियूं। खेत मुक्त ले कृष्णौं अर्थीं, जे कंध हरे तो हरियूं। विष्णु जंपता जीव जु थाकै, तो जीवड़ियां बिन सरियूं। हरि हरि करतां हरकत आवै, तो न पछतावो करियूं। भीखी लो भीखियारी लो जे आदि परम तत लाधो। जाके बाद विराम विरांसो सांसो, ताने कौन कहिस साल्हिया साधो।
यह संसार परिवर्तनशील है और जीवन की आवश्यकताएँ भी निरंतर बदलती रहती हैं। भोजन, खेत, जीवन और शरीर—सब प्रकृति के चक्र का हिस्सा हैं। मनुष्य को अपने जीवन का उद्देश्य पहचानना चाहिए। परम तत्व की खोज करने वाला साधक संसार की क्षणभंगुरता को समझता है और जीवन के अंतिम पड़ाव से पहले सत्य को प्राप्त करने का प्रयास करता है।
The world is constantly changing, and the conditions that sustain life are also part of nature's continuing cycle. Food, fields, life and the body all participate in this impermanent process. A person should recognize the purpose of life. The seeker who searches for the ultimate Reality understands worldly impermanence and seeks truth before life's final stage arrives.
✦ मुख्य संदेश:

संसार परिवर्तनशील है; जीवन रहते परम तत्व की खोज करनी चाहिए।

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35 Raag Gauri

शब्द 35 — शब्द 35: बल बल भणत व्यासूं

ओ३म्—बल बल भणत व्यासूं। नाना अगम न आसूं। नाना उदक उदासूं। बल बल भई निरासूं। गल में पड़ी परासूं। जां जां गुरु न चीन्हों। तइया सींच्या न मूलूं, कोई कोई बोलत थूलूं।
जब मनुष्य गुरु को नहीं पहचानता और जीवन के मूल को नहीं सींचता, तब उसकी साधना बाहरी और सतही रह जाती है। वह अनेक प्रकार के प्रयास करता है, लेकिन भीतर से निराश और अस्थिर बना रहता है। गुरु और मूल सत्य की पहचान ही साधना को गहराई प्रदान करती है।
When a person does not recognize the true Guru and fails to nourish the root of spiritual life, practice remains external and superficial. The seeker may make many efforts yet remain inwardly disappointed. Recognition of the Guru and the fundamental truth gives spiritual practice its depth.
✦ मुख्य संदेश:

गुरु की पहचान और जीवन के मूल का पोषण साधना की वास्तविक नींव है।

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36 Raag Gauri

शब्द 36 — शब्द 36: काजी कथै कुराणूं

ओ३म्—काजी कथै कुराणूं, न चीन्हों फरमाणूं। काफर थूल भयाणूं, जइया गुरु न चीन्हों। तइया सींच्या न मूलूं, कोई कोई बोलत थूलूं।
केवल धार्मिक ग्रंथ का पाठ करना पर्याप्त नहीं है यदि उसके वास्तविक आदेश और नैतिक अर्थ को पहचाना नहीं गया। धर्म का बाहरी ज्ञान तभी सार्थक है जब वह मनुष्य के आचरण और जीवन को बदलता है।
Merely reciting a religious scripture is not sufficient if its true guidance and ethical meaning are not understood. External religious knowledge becomes meaningful only when it transforms a person's conduct and way of life.
✦ मुख्य संदेश:

धार्मिक ग्रंथ का पाठ ही पर्याप्त नहीं; उसके सत्य संदेश को पहचानकर आचरण में उतारना आवश्यक है।

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37 Raag Gauri

शब्द 37 — शब्द 37: लोहा लंग लुहारूं

ओ३म्—लोहा लंग लुहारूं, ठाठां घड़ै ठठारूं, उत्तम कर्म कुंहारूं। जइया गुरु न चीन्हों। तइया सींच्या न मूलूं, कोई कोई बोलत थूलूं।
लोहे को लोहार, धातु को कुशल कारीगर और मिट्टी को कुम्हार उचित रूप देता है। उसी प्रकार मनुष्य के जीवन को सही दिशा देने के लिए गुरु का मार्गदर्शन आवश्यक है। यदि गुरु को नहीं पहचाना गया और जीवन के मूल को नहीं सींचा गया, तो बाहरी प्रयास अधूरे रह जाते हैं।
A blacksmith shapes iron, and a skilled craftsman gives form to metal or clay. Similarly, the human life needs the guidance of a true Guru to acquire the right direction and form. Without recognizing the Guru and nourishing the root of life, external efforts remain incomplete.
✦ मुख्य संदेश:

सही गुरु जीवन को सही दिशा और स्वरूप देने वाला मार्गदर्शक है।

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38 Raag Gauri

शब्द 38 — शब्द 38: रेरे पिंड स पिंडूं

ओ३म्—रेरे पिंड स पिंडूं, निरधन जीव क्यूं खंडूं। ताछै खंड बिछंडूं, घड़ीयै सै धमंडूं। अइया पंथ कुपंथूं, जइया गुरु न चीन्हों तइया सींच्या न मूलूं। कोई कोई बोलत थूलूं।
शरीर नश्वर है और जीवन निरंतर परिवर्तन तथा विघटन की ओर बढ़ता है। यदि मनुष्य सही पंथ और कुपंथ के अंतर को नहीं पहचानता, तो वह जीवन के वास्तविक उद्देश्य से दूर हो सकता है। सच्चे गुरु की पहचान और मूल सत्य की खोज सही मार्ग को पहचानने में सहायता करती है।
The body is impermanent, and life continually moves toward change and dissolution. If a person cannot distinguish the righteous path from the wrong path, one may become separated from the true purpose of life. Recognizing the true Guru and seeking the fundamental truth helps the seeker recognize the right path.
✦ मुख्य संदेश:

सही पंथ की पहचान के लिए गुरु और मूल सत्य की पहचान आवश्यक है।

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39 Raag Gauri

शब्द 39 — शब्द 39: उत्तम संग सुसंगूं

ओ३म्—उत्तम संग सुसंगूं, उत्तम रंग सुरंगूं। उत्तम लंग सुलंगूं, उत्तम ढंग सुढंगूं। उत्तम जंग सुजंगूं, तातैं सहज सुलीलूं। सहज सुपंथ, मरतक मोक्ष दुवारूं।
अच्छी संगति मनुष्य के जीवन पर गहरा प्रभाव डालती है। उत्तम संगति से विचार, व्यवहार और जीवन-पद्धति भी उत्तम होती है। सत्संग मनुष्य को सहज और सही मार्ग की ओर ले जाता है तथा आध्यात्मिक मुक्ति के द्वार को खोलने वाला सहायक बनता है।
Good company has a profound influence on a person's life. Noble association improves one's thoughts, conduct and way of living. Satsang guides the seeker toward a natural and righteous path and becomes a support on the journey toward spiritual liberation.
✦ मुख्य संदेश:

उत्तम संगति → उत्तम विचार → उत्तम आचरण → सहज सही मार्ग।

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40 Raag Gauri

शब्द 40 — शब्द 40: सस पाताले तिहूं त्रिलोके

ओ३म्—सस पाताले तिहूं त्रिलोके, चवदा भवने गगन गहीरे। बाहर भीतर सर्व निरंतर, जहां चीन्हों तहां सोई। सतगुरु मिलियां सतपंथ बतायो, भ्रांत चुकाई अवर न बुझबा कोई।
परम तत्व की उपस्थिति को केवल किसी एक स्थान या दिशा तक सीमित नहीं किया जा सकता। वह बाहर और भीतर, समस्त अस्तित्व में निरंतर विद्यमान है। सतगुरु मिलने पर साधक को सत्य का मार्ग मिलता है और उसके भ्रम दूर होते हैं। तब वह बाहरी भटकाव के बजाय उस सत्य को पहचानने लगता है जो सर्वत्र विद्यमान है।
The ultimate Reality cannot be confined to a particular place or direction. It is continuously present throughout existence, within and beyond the visible world. When the seeker finds the true Guru, the path of truth becomes clear and confusion is removed. The seeker then begins to recognize the Reality that is present everywhere.
✦ मुख्य संदेश:

परम सत्य सर्वत्र है; सतगुरु भ्रम दूर कर सत्य के मार्ग की पहचान कराता है।

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