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✦ श्री गुरु जम्भेश्वर भगवान • प्रामाणिक 120 शब्दवाणी डिजिटल अभिलेखागार (C9.2.1)

शब्दवाणी — 120 Sacred Shabds

सत्य, धर्म, करुणा, जीव-दया एवं पर्यावरण संरक्षण के पावन अमर उपदेश। मूल शब्दवाणी अपरिवर्तनीय सुरक्षित, हिन्दी भावार्थ एवं English translation सहित।

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आज का पावन शबद (Daily Wisdom)

शब्द 71: शब्द 71: धवणा धूजै पाहण पूजै बे फरमाई खुदाई

मूल वाणी:

ओ३म्-धवणा धूजै पाहण पूजै बे फरमाई खुदाई, गुरू के चेले के पाए लागै देखो लोग अन्हयायी। काठी कणजो रूपा रेहण, कापड़ मांह छिपाई। नीचा पड़ पड़ तानैं धोकें, धीरा रे हरि आई। ब्राह्मण नाऊं लादण रूड़ा, बूता नाऊं कूता। वै अपहानै पोह बत...

हिन्दी भावार्थ:

शबद संख्या 71 में गुरु जम्भेश्वर जी जोगियों, सिद्धों और बाह्य भेष धारियों को सच्चा योग समझाते हैं। वे सिखाते हैं कि कान छिदवाना, भभूत मलना या वन-कंदराओं में भटकना योग नहीं है, अपितु मन के विकारों को वश में करना और जीव दय...

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62 Raag Bhairav

शब्द 62 — शब्द 62: नामै कारण किरिया चू यो,

ओ३म्-नामै कारण किरिया चूक्यो, नामै सूरज साम्हो थूक्यो। नामै ऊभै कांसा मांया, नामै छान तिणूका खैं या। नामैं ब्राह्मण निवत बहोड्या, नामैं आवा कोरम्भ चोरया। नामैं बाड़ी का बनफल तोड्या, नामैं जोगी का ख पर फोड्या। नामैं ब्राह्मण का तागा तोड्या, नामैं बैर बिरोध धन लोड्या। नामैं सूवा गाय का बच्छ बिछोड्या, नामैं चरती पिवती गऊ बिडारी। नामैं हरी पराई नारी, नामैं सगा सहोदर मारया। नामैं तिरिया सिर खड़ग उभारया, नामैं फिरतै दातण कीयो, नामैं रण में जाय दौं दियो, नामैं बाट कूट धन लीयो। एक जू ओंगुण रामैं कीयों, अण हुंतो मिरघो मारण गइयो। दूजो औगुण रामै कीयो, एको दोष अदोषा दीयों। बनखंड मैं जद साथर सोइयों, जद को दोष तदो को होइयों।
शबद संख्या 62 में गुरु जम्भेश्वर जी जोगियों, सिद्धों और बाह्य भेष धारियों को सच्चा योग समझाते हैं। वे सिखाते हैं कि कान छिदवाना, भभूत मलना या वन-कंदराओं में भटकना योग नहीं है, अपितु मन के विकारों को वश में करना और जीव दया पालना ही सच्चा योग है।
In Shabad #62, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He addresses ascetics and mendicants, elucidating that genuine Yoga is not found in external robes or ritual austerities, but in internal purity, self-control, and loving kindness towards all creation.
✦ मुख्य संदेश:

धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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66 Raag Bilawal

शब्द 66 — शब्द 66: ऊमाज गुमाज पंज गंज यारी

ओ३म्-ऊमाज गुमाज पंज गंज यारी, रहिया कुपहीया शैतान की यारी। शैतान लो भल शैतान लो, शैतान बहो जुग छायो। शैतान की कुबध्यान खेती, यूं काल मध्ये कुचीलू। बे राही बे किरियावन्हत। कुमति दौरै जायसैं, शैतानी लोड़त रलियों। जां जां शैतानी करै उफारूं, तां तां महंत न फलियों। नील मध्ये कुचील करबा, साध संगिणी थूंलूं। पोहप मध्ये परमला जोती, यूं सुरग मध्ये लीलूं। संसार में उपकार ऐसा, यूं घण बरसंता नीरूं। संसार में उपकार ऐसा, यूं रूही मध्ये खीरूं।
शबद संख्या 66 में गुरु जम्भेश्वर जी मानव जीवन की नश्वरता और सत्कर्मों की महत्ता का बोध कराते हैं। वे प्राणी को सचेत करते हैं कि व्यर्थ के अहंकार को त्यागकर सत्य, शील, संतोष और परमार्थ के मार्ग पर चलें।
In Shabad #66, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He reflects upon the transient nature of human existence, urging seekers to transcend ego and cultivate humility, ethical discipline, and righteous living.
✦ मुख्य संदेश:

धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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68 Raag Maru

शब्द 68 — शब्द 68: वै कंवराई अनन्त बधाई

ओ३म्-वै कंवराई अनन्त बधाई, वै कंवराई सुरग बधाई, यह कंवराई खेह रलाई, दुनीयां रोलै कंवर किसो, कण बिण कूकस रस बिन बाकस बिन किरिया परिवार किसो। अरथूँ गरथूं साहण थाटूं, धूंवै का लहलोर जिसो। सो शारंगधर जपरे प्राणी, जिहिं जपिये हुवै धरम इसो। चलण चलंतै, बास बसंतै, जीव जिवंतै, काया निंवतै, सास फुरंतै किवी न कमाई। तातै जंवर बिन ड़सी रे भाई। सुर नर ब्रह्मा कोउ न गाई, माय न बाप न बहण न भाई। इंत न मिंत न लोक जणो, जंवर तणा जमदूत दहेला। लेखो लेसी एक जणो।
शबद संख्या 68 में गुरु जम्भेश्वर जी सृष्टि के मूल तत्वों—जल, वायु, पृथ्वी, वनस्पति और मूक पशु-पक्षियों के संरक्षण का पावन संदेश देते हैं। प्रकृति परमात्मा का ही स्वरूप है, अतः उसकी रक्षा करना प्रत्येक मनुष्य का सर्वोपरि धर्म है।
In Shabad #68, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He emphasizes the sacred sanctity of nature, water, air, trees, and voiceless creatures, teaching that preserving the environment is living worship of the omnipresent Creator.
✦ मुख्य संदेश:

धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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72 Raag Todi

शब्द 72 — शब्द 72: वेद कुराण कुमाया जालूं

ओ३म्-वेद कुराण कुमाया जालूं, भूला जीव कुजीव कुजाणी। बसंदर नहीं नख हीरूं, धर्म पुरूष सिरजीवै पूरूं। कलि का माया जाल फिटाकर प्राणी, गुरू की कलम कुरांण पिछांणी। दींन गुमान करैलो ठाली, यूं कण घातै घुण हांणी। साच सिदक शैतान चुकावो, यूं तिस चुकावै पांणी। मैं नर पूरा सरविणजो हीरा, लेसी जांकै हृदय लोयण अंधा रहा इवांणी। निरख लहो नर निरहारी, जिन चोखंड भीतर खेल पसारी। जंपो रे जिण जंपे लाभैं, रतन काया ए कहांणी। काही मारूं काहीं तारूं, किरिया बिहूंणा पर हथ सारूं। शील दहूं उबारूं ऊंन्हहै, एकल एह कहांणी। केवल ज्ञानी थल शिर आयो, परगट खेल पसारी। कोड़ तेतीसों पोह रचावण हारी, यूं छक आई सारी।
शबद संख्या 72 में गुरु जम्भेश्वर जी धार्मिक पाखंड, बाह्य कर्मकांड और मूक प्राणियों पर होने वाली क्रूरता का कड़ा विरोध करते हैं। वे स्पष्ट उपदेश देते हैं कि परमात्मा के दरबार में दया, सत्य, पवित्र आचरण और ईमानदारी ही सच्ची बंदगी है।
In Shabad #72, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He fearlessly denounces hypocrisy, empty rituals, and cruelty against innocent beings, emphasizing that true divine devotion lies in universal compassion, truthful living, and non-violence.
✦ मुख्य संदेश:

धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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74 Raag Bhairav

शब्द 74 — शब्द 74: कड़वा मीठा भोजन भख ले,

ओ३म्-कड़वा मीठा भोजन भख ले, भखकर देखत खीरूं। धर आखरड़ी साथर सोवण, ओढण ऊना चीरूं। सहजे सोवण पोह का जागण, जे मन रहिबा थीरूं। सुरग पहेली सांभल जिवड़ा, पोह उतरबा तीरूं।
शबद संख्या 74 में गुरु जम्भेश्वर जी मानव जीवन की नश्वरता और सत्कर्मों की महत्ता का बोध कराते हैं। वे प्राणी को सचेत करते हैं कि व्यर्थ के अहंकार को त्यागकर सत्य, शील, संतोष और परमार्थ के मार्ग पर चलें।
In Shabad #74, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He reflects upon the transient nature of human existence, urging seekers to transcend ego and cultivate humility, ethical discipline, and righteous living.
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धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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78 Raag Bilawal

शब्द 78 — शब्द 78: नवै पोल नवै दरवाजा

ओ३म्-नवै पोल नवै दरवाजा, अहूठ कोड़ रूं राय जड़ी। कांयरे सींचो बनमाली, इंहि बाड़ी तो भेल पड़सी। सुबचन बोल सदा सुहलाली, नाम विष्णु को हरे सुणो। घण तण गड़बड़ कायों वायों, निज मारग तो बिरला कायों। निज पोह पाखो पार असी पर, जाण म गाहि मै गायो गूंणो। श्रीराम में मति थोड़ी, जोय जोय कण विण कूकस कायों लेणो।
शबद संख्या 78 में गुरु जम्भेश्वर जी धार्मिक पाखंड, बाह्य कर्मकांड और मूक प्राणियों पर होने वाली क्रूरता का कड़ा विरोध करते हैं। वे स्पष्ट उपदेश देते हैं कि परमात्मा के दरबार में दया, सत्य, पवित्र आचरण और ईमानदारी ही सच्ची बंदगी है।
In Shabad #78, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He fearlessly denounces hypocrisy, empty rituals, and cruelty against innocent beings, emphasizing that true divine devotion lies in universal compassion, truthful living, and non-violence.
✦ मुख्य संदेश:

धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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80 Raag Maru

शब्द 80 — शब्द 80: जे म्हां सूता रैण बिहावै,

ओ३म्-जे म्हां सूता रैण बिहावै, तो बरतै बिम्बा बारूं। चन्हद भी लाजै सूर भी लाजै, लाजै धर गैणारूं। पवणा पाणी येपण लाजै, लाजै बणी अठारा भारूं। सप्त पताल फुणीदा लाजै, लाजै सागर खारूं। जंबूदीप का लोइया लाजै, लाजै धवली धारूं। सिध अरू साधक मुनिजन लाजै, लाजै सिरजण हारूं। सत्तर लाख असी पर जंपा, भले न आवै तारूं।
शबद संख्या 80 में गुरु जम्भेश्वर जी सृष्टि के मूल तत्वों—जल, वायु, पृथ्वी, वनस्पति और मूक पशु-पक्षियों के संरक्षण का पावन संदेश देते हैं। प्रकृति परमात्मा का ही स्वरूप है, अतः उसकी रक्षा करना प्रत्येक मनुष्य का सर्वोपरि धर्म है।
In Shabad #80, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He emphasizes the sacred sanctity of nature, water, air, trees, and voiceless creatures, teaching that preserving the environment is living worship of the omnipresent Creator.
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धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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84 Raag Todi

शब्द 84 — शब्द 84: मूंड मुंडायो मन न मुंडायो,

ओ३म्-मूंड मुंडायो मन न मुंडायो, मुंह अबखल दिल लोभी। अन्हदर दया नहीं सुरकाने, निंदरा हड़ै कसोभी। गुरू गति छूटी टोट पड़ैला, उनकी आवा एकपख सातो। वै करणी हूंता खूंधा, असी सहस नव लाख भवैला कुंभी दौरे ऊंधा।
शबद संख्या 84 में गुरु जम्भेश्वर जी सद्गुरु की अनन्य महिमा और मार्गदर्शन की अनिवार्यता प्रकट करते हैं। गुरु-मुख से प्रकट होने वाला ज्ञान ही अज्ञान के अंधकार को मिटाकर मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।
In Shabad #84, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He glorifies the necessity of the True Master (Satguru), whose enlightened guidance dissolves worldly delusion and leads the aspirant towards liberation.
✦ मुख्य संदेश:

धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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86 Raag Bhairav

शब्द 86 — शब्द 86: जुग जागो जुग जाग पिरांणी,

ओ३म्-जुग जागो जुग जाग पिरांणी, कांय जागंता सोवो। भलकै बीर बिगोवो होयसी, दुसमन कांय लकोवो। ले कूंची दरबान बुलाओ, दिल ताला दिल खोवो। जंपो रे जिण जं यो जणीयर, जपसी सो जिण हारी। लह-लह दाव पड़ंता खेलो, सुर तेतींसा सारी। पवन बंधान काया गढ काची, नीर छलै यूं पारी। पारी बिनसै नीर ढुलैलो, ओपिंड काम न कारी। काची काया दृढ कर सींचो, यूं माली सींचै बाड़ी। ले काया बासंदर होमो, यूं ईंधन की भारी। शील स्नाने संजमे चालो, पाणी देह पखाली। गुरू के बचने निंव खिंव चालो, हाथ जपो जपमाली। वस्तु पियारी खरचो यूं नाहीं, किहिं गुण राखो टाली। खरचे लाहो राखे टोटो, बिबरस जोय निहाली। घर आगी इत गोवल बासो, कूड़ी आधो चारी। आज मूवा कल दूसर दिन है, जो सरै तो सारी। पीछै कलीयर कागा रोलो, रहसी कूक पुकारी। ताण थकै यूं हारयो नाहीं, मुरखा अवसर जौले हारी।
शबद संख्या 86 में गुरु जम्भेश्वर जी सृष्टि के मूल तत्वों—जल, वायु, पृथ्वी, वनस्पति और मूक पशु-पक्षियों के संरक्षण का पावन संदेश देते हैं। प्रकृति परमात्मा का ही स्वरूप है, अतः उसकी रक्षा करना प्रत्येक मनुष्य का सर्वोपरि धर्म है।
In Shabad #86, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He emphasizes the sacred sanctity of nature, water, air, trees, and voiceless creatures, teaching that preserving the environment is living worship of the omnipresent Creator.
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धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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90 Raag Bilawal

शब्द 90 — शब्द 90: चोईस चेड़ा कालिंग केड़ा

ओ३म्-चोईस चेड़ा कालिंग केड़ा, अधिक कलावंत आयसैं। वै फेर आसन, मुकर होय बैसैंला, नुगरा थान रचायसै। जाणत भूला महा पापी, बहु दुनियां भोलायसै। दिल का कूड़ा कुड़ीयारा, उपंग बात चलाय सै। गुरू गहणा जो लेवै नाहीं, दशबंध घर बोसायसै। आप थापी महापापी, दज्ज्धी परलै जायसै। सतगुरू कै बैडै न चढ़ै, गुरस्वामी नै भाय सै। मंत्र बेलु ऋध सिध कर सैं, दे दे कार चलायसै। काठ का घोड़ा निरजीव ता सरजीव कर सैं, तांनै दाल चरायसैं। अधर आसण मांड बैसैला, मूवा मड़ा हंसाय सैं। जां जां पवन आसण, पाणी आसण, चंद आसण, सूर आसण, गुरू आसण संभराथले। कहै सतगुरू भूल मत जाइयो, पड़ोला अभै दोजखे।
शबद संख्या 90 में गुरु जम्भेश्वर जी सृष्टि के मूल तत्वों—जल, वायु, पृथ्वी, वनस्पति और मूक पशु-पक्षियों के संरक्षण का पावन संदेश देते हैं। प्रकृति परमात्मा का ही स्वरूप है, अतः उसकी रक्षा करना प्रत्येक मनुष्य का सर्वोपरि धर्म है।
In Shabad #90, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He emphasizes the sacred sanctity of nature, water, air, trees, and voiceless creatures, teaching that preserving the environment is living worship of the omnipresent Creator.
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धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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92 Raag Maru

शब्द 92 — शब्द 92: काया कोट पवन कुट वाली,

ओ३म्-काया कोट पवन कुट वाली, कुकर्म कुलफ बणायो। माया जाल भरम का सकल, बहु जग रहीया छायों। पढ़ वेद कुरांण कुमाया जालों, दंत कथा जुग छायो। सिध साधक को एक मतो, जिन जीवत मुक्त दृढ़ायो। जुगां जुगां को जोगी आयो, सतगुरू सिद्ध बतायो। सहज स्नानी केवल ज्ञानी, ब्रह्मज्ञानी सुकृत अहल्यो न जाई। यूं यूं भणतां, यूं यूं सुणंता समझ बिना कुछ सिद्धि न पाई।
शबद संख्या 92 में गुरु जम्भेश्वर जी जोगियों, सिद्धों और बाह्य भेष धारियों को सच्चा योग समझाते हैं। वे सिखाते हैं कि कान छिदवाना, भभूत मलना या वन-कंदराओं में भटकना योग नहीं है, अपितु मन के विकारों को वश में करना और जीव दया पालना ही सच्चा योग है।
In Shabad #92, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He addresses ascetics and mendicants, elucidating that genuine Yoga is not found in external robes or ritual austerities, but in internal purity, self-control, and loving kindness towards all creation.
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धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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96 Raag Todi

शब्द 96 — शब्द 96: सुण गुणवंता

ओ३म्-सुण गुणवंता, सुण बुधवंता, मेरी उत्पत्ति आद लुहारूं। भाठी अंदर लोह तपीलो, तंतक सोना घड़ै कसारूं। मेरी मनसा अहरण, नाद हथोडाे, शशीयर सूर तपीलो। पवन अधारी खालूं। जेथे गुरू का शब्द मानीलो, लंघिबा भव जल पारूं। आसण छोड़ि सुखासण बैठो, जुग-जुग जीवै जंभ लुहारूं।
शबद संख्या 96 में गुरु जम्भेश्वर जी जोगियों, सिद्धों और बाह्य भेष धारियों को सच्चा योग समझाते हैं। वे सिखाते हैं कि कान छिदवाना, भभूत मलना या वन-कंदराओं में भटकना योग नहीं है, अपितु मन के विकारों को वश में करना और जीव दया पालना ही सच्चा योग है।
In Shabad #96, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He addresses ascetics and mendicants, elucidating that genuine Yoga is not found in external robes or ritual austerities, but in internal purity, self-control, and loving kindness towards all creation.
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98 Raag Bhairav

शब्द 98 — शब्द 98: जिहि गुरू कै खिणही ताऊं,

ओ३म्-जिहि गुरू कै खिणही ताऊं, खिणही सीऊ, खिणही पवणा, खिणही पाणी, खिणही मेघ मण्डाणो। कृष्ण करंता बार न होई, थल सिर नीर निवाणो। भूला प्राणी विष्णु जंपो रे, यूं मौत टलै जिरवाणो। भीगा है पण भेद्या नाहीं, पांणी मांहि पखाणो। जीवत मरो रे जीवत मरो, जिन जीवन की बिध जांणी। जे कोई आवै हो हो कर, तो आप जै हुईये पांणी। जाकै बहुती नवणी, बहुती खवणीं बहुती क्रिया समांणी। जांकी तो निज निर्मल काया जोय जोय देखो, ले चढ़ियो अस्मानी। यह मढ देवल मूल न जोयबा, निज कर जपो पिराणी। अनन्त रूप जोवो अभ्यागत, जिहिंका खोज लहो सुर बाणी। सेतम सेतूं, जेरज जेरू, इंडस इंडू, अइयालो उरध जे खैणी।
शबद संख्या 98 में गुरु जम्भेश्वर जी सृष्टि के मूल तत्वों—जल, वायु, पृथ्वी, वनस्पति और मूक पशु-पक्षियों के संरक्षण का पावन संदेश देते हैं। प्रकृति परमात्मा का ही स्वरूप है, अतः उसकी रक्षा करना प्रत्येक मनुष्य का सर्वोपरि धर्म है।
In Shabad #98, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He emphasizes the sacred sanctity of nature, water, air, trees, and voiceless creatures, teaching that preserving the environment is living worship of the omnipresent Creator.
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102 Raag Bilawal

शब्द 102 — शब्द 102: विष्णु विष्णु भण अजर जरीजै,

ओ३म्-विष्णु विष्णु भण अजर जरीजै, धर्म हुवै पापां छूटीजै। हरि पर हरि को नाम जपीजै, हरियालो हरि आण हरूं। हरी नारायण देव नरूं। आशा सास निरास भईलो, पाईलो मोक्ष दवार खिंणू।
शबद संख्या 102 में गुरु जम्भेश्वर जी अविनाशी परमात्मा विष्णु के अनन्य सुमिरन का संदेश देते हैं। वे मानव को सचेत करते हैं कि सांसारिक भ्रम और मोह-माया नश्वर हैं; केवल प्रभु का नाम और सदाचार ही भवसागर पार कराने वाले हैं।
In Shabad #102, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He inspires ceaseless remembrance of the Supreme Lord Vishnu, reminding the soul that worldly entanglements are fleeting and only spiritual truth liberates from worldly suffering.
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104 Raag Maru

शब्द 104 — शब्द 104: कंचन दांनू कछु न मानूं,

ओ३म्-कंचन दांनू कछु न मानूं, कापड़ दानू कछु न मांनू। चोपड़ दानू कछु न मानू, पाट पटंबर दांनू कछु न मानू। पंच लाख तुरंगम दानू कछु न मांनू, हस्ती दानू न मांनू। तिरिया दानू कछु न मांनू, मानू एक सुचील सिनांनू।
शबद संख्या 104 में गुरु जम्भेश्वर जी मानव जीवन की नश्वरता और सत्कर्मों की महत्ता का बोध कराते हैं। वे प्राणी को सचेत करते हैं कि व्यर्थ के अहंकार को त्यागकर सत्य, शील, संतोष और परमार्थ के मार्ग पर चलें।
In Shabad #104, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He reflects upon the transient nature of human existence, urging seekers to transcend ego and cultivate humility, ethical discipline, and righteous living.
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108 Raag Todi

शब्द 108 — शब्द 108: हालीलो भल पालीलो सिध पालीलो

ओ३म्-हालीलो भल पालीलो सिध पालीलो, खेड़त सूना राणो। चन्हद सूर दोय बैल रचीलो, गंग जमन दोय रासी। सत संतोष दोय बीज बीजीलो, खेती खड़ी अकासी। चेतन रावल पहरै बैठे, मृगा खेती चर नहीं जाई। गुरू प्रसादे, केवल ज्ञाने, ब्रह्मज्ञाने, सहजे स्नाने, यह घर ऋध सिध पाई।
शबद संख्या 108 में गुरु जम्भेश्वर जी सद्गुरु की अनन्य महिमा और मार्गदर्शन की अनिवार्यता प्रकट करते हैं। गुरु-मुख से प्रकट होने वाला ज्ञान ही अज्ञान के अंधकार को मिटाकर मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।
In Shabad #108, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He glorifies the necessity of the True Master (Satguru), whose enlightened guidance dissolves worldly delusion and leads the aspirant towards liberation.
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110 Raag Bhairav

शब्द 110 — शब्द 110: मथुरा नगर की राणी होती,

ओ३म्-मथुरा नगर की राणी होती, होती पाटमदे राणी। तीरथ वासी जाती लूटे, अति लूटे खुरसाणी। मानक मोती हीरा लूट्या, जाय बीलूधा दांणी। कवले चूकी बचने हारी, जिहिं औगुण ढांची ढोवै पांणी। विष्णु कूं दोष किसो रे प्राणी, आपे खता कमाणी।
शबद संख्या 110 में गुरु जम्भेश्वर जी अविनाशी परमात्मा विष्णु के अनन्य सुमिरन का संदेश देते हैं। वे मानव को सचेत करते हैं कि सांसारिक भ्रम और मोह-माया नश्वर हैं; केवल प्रभु का नाम और सदाचार ही भवसागर पार कराने वाले हैं।
In Shabad #110, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He inspires ceaseless remembrance of the Supreme Lord Vishnu, reminding the soul that worldly entanglements are fleeting and only spiritual truth liberates from worldly suffering.
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114 Raag Bilawal

शब्द 114 — शब्द 114: सुरनर तणो सन्हदेसो आयो

ओ३म्-सुरनर तणो सन्हदेसो आयो, सांभलीयो रे जाटो। चांदणै थकै अंधेरै यूं चालो, भूल गया गुरू बाटो। नीर थकै घट थूल यूं राखो, सबल बिगोवो खाटो। मागर मणिया यूं हाथि बिसाहो, कांय हीरा हाथ उसाटो। सुरनर तणो संदेसो आयो, सांभलियो रे।
शबद संख्या 114 में गुरु जम्भेश्वर जी सद्गुरु की अनन्य महिमा और मार्गदर्शन की अनिवार्यता प्रकट करते हैं। गुरु-मुख से प्रकट होने वाला ज्ञान ही अज्ञान के अंधकार को मिटाकर मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।
In Shabad #114, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He glorifies the necessity of the True Master (Satguru), whose enlightened guidance dissolves worldly delusion and leads the aspirant towards liberation.
✦ मुख्य संदेश:

धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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116 Raag Maru

शब्द 116 — शब्द 116: आयसां मृगछाला पावोडी कांय फिरावो,

ओ३म्-आयसां मृगछाला पावोडी कांय फिरावो, मतूंत आयसां ऊगंतो भांण थंभाऊं। दोनों परबत मेर उजागर, मतूंत अधबिच आन भिड़ाऊं। तीन भुवन की राही रूक्मण, मतूंत थल सिर आंण बसांऊं। नवसै नदी निवासी नाला, मंतूत तो थल सिर आन बहाऊं। सीत बहोड़ी लंका तोड़ी ऐसो कियो संग्रामो, जां बांणै म्हे रावण मारयो। मतूंत आयसां गढ़ हथनापुर सै आन दिखाऊं। जो तू सोने की मृगी कर चलावै, मतूंत घन पाहण बरसाऊं। मृगछाला पावोड़ी कांय फिरावो, मंतूतो उंगतो भाण थंभाऊं।
शबद संख्या 116 में गुरु जम्भेश्वर जी अविनाशी परमात्मा विष्णु के अनन्य सुमिरन का संदेश देते हैं। वे मानव को सचेत करते हैं कि सांसारिक भ्रम और मोह-माया नश्वर हैं; केवल प्रभु का नाम और सदाचार ही भवसागर पार कराने वाले हैं।
In Shabad #116, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He inspires ceaseless remembrance of the Supreme Lord Vishnu, reminding the soul that worldly entanglements are fleeting and only spiritual truth liberates from worldly suffering.
✦ मुख्य संदेश:

धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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120 Raag Todi

शब्द 120 — शब्द 120: विष्णु विष्णु तू भणरे प्राणीं,

ओ३म्-विष्णु विष्णु तू भणरे प्राणीं, इस जीवन कै हावै। क्षण क्षण आव घटंती जावै, मरण दिनों दिन आवै। पालटीयो गढ़ कांय न चेत्यो, घाती रोल भनावै। गुरू मुख मुरखा चढै न पोहण, मनमुख भार उठावै। यूं यूं लाज दूनी की लाजै, त्यूं त्यूं दाब्यो दावै। भलियो होयसो भली बुध आवै, बुरियो बुरी कमावै।
शबदवाणी के इस अंतिम १२०वें शबद में गुरु जम्भेश्वर भगवान जीवन के अंतिम सत्य और काल की गति का स्मरण कराते हैं। वे कहते हैं: हे प्राणी! क्षण-क्षण तेरी आयु घट रही है और मृत्यु दिन-प्रतिदिन निकट आ रही है। सद्गुरु के वचनों को अपनाकर सद्बुद्धि ग्रहण कर, क्योंकि जो भलाई बोएगा वह भलाई पाएगा और जो बुराई कमाएगा वह दुर्दशा को प्राप्त होगा।
In this climactic 120th Shabad of the sacred corpus, Guru Jambheshwar Ji cautions humanity on the swift passing of earthly life. Moment by moment, youth and breaths diminish while mortality approaches. Awaken to the Guru's guidance, for whoever sows righteousness harvests spiritual nobility, and whoever pursues falsehood reaps ruin.
✦ मुख्य संदेश:

धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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