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विश्नोई एटलस धरोहर की खोज • विरासत का संरक्षण
✦ श्री गुरु जम्भेश्वर भगवान • प्रामाणिक 120 शब्दवाणी डिजिटल अभिलेखागार (C9.2.1)

शब्दवाणी — 120 Sacred Shabds

सत्य, धर्म, करुणा, जीव-दया एवं पर्यावरण संरक्षण के पावन अमर उपदेश। मूल शब्दवाणी अपरिवर्तनीय सुरक्षित, हिन्दी भावार्थ एवं English translation सहित।

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आज का पावन शबद (Daily Wisdom)

शब्द 71: शब्द 71: धवणा धूजै पाहण पूजै बे फरमाई खुदाई

मूल वाणी:

ओ३म्-धवणा धूजै पाहण पूजै बे फरमाई खुदाई, गुरू के चेले के पाए लागै देखो लोग अन्हयायी। काठी कणजो रूपा रेहण, कापड़ मांह छिपाई। नीचा पड़ पड़ तानैं धोकें, धीरा रे हरि आई। ब्राह्मण नाऊं लादण रूड़ा, बूता नाऊं कूता। वै अपहानै पोह बत...

हिन्दी भावार्थ:

शबद संख्या 71 में गुरु जम्भेश्वर जी जोगियों, सिद्धों और बाह्य भेष धारियों को सच्चा योग समझाते हैं। वे सिखाते हैं कि कान छिदवाना, भभूत मलना या वन-कंदराओं में भटकना योग नहीं है, अपितु मन के विकारों को वश में करना और जीव दय...

प्रदर्शित शबद: 1–20 (कुल 21) सारे फ़िल्टर साफ़ करें (Reset)
01 Raag Bhairav

शब्द 1 — शब्द 1: गुरू चीन्हों गुरू चीन्ह पुरोहित

ओ३म्—गुरू चीन्हों गुरू चीन्ह पुरोहित, गुरू मुख धर्म बखाणी। जो गुरू होयबा सहजे शीले शब्दे नादे वेदे तिहिं गुरू का आंलिकार पिछाणी। छव दरशण जिहिं कै रूपण, थापण, संसार बरतण, निज कर थरप्या, सो गुरू प्रत्यक्ष जाणी। जिहिं कै खर तर गोठ निरोत्तर वाचा, रहिया रूद्र समाधी। गुरू आप संतोखी, अवरां पोषी, तत महारस बाणी। के के अलिया बासण, होत हुताशण, तामैं क्षीर दुहीजूं। रसूवन गोरस, घीय न लीजूं, तहां दूध न पाणी। गुरू ध्याइये रे ज्ञानी, तोड़त मोहा, अति खुरसाणी छीजत लोहा। पाणी छल तेरी खाल पखाला, सतगुरू तोड़े मन का साला। सतगुरू है तो सहज पिछाणी, कृष्ण चरित बिन काचे करवै रहयो न रहसी पाणी।
सच्चे गुरु को पहचानना चाहिए। गुरु वह है जिसके माध्यम से धर्म का वास्तविक ज्ञान प्रकट होता है। सच्चा गुरु सहजता, शील, शब्द, नाद और ज्ञान से पहचाना जाता है। वह संसार के वास्तविक स्वरूप को समझता है और आत्मज्ञान में स्थित रहता है। गुरु संतोषी होता है और दूसरों का पोषण करता है। गुरु की वाणी गहरे आध्यात्मिक ज्ञान से युक्त होती है। ज्ञानी व्यक्ति को गुरु का ध्यान करना चाहिए, क्योंकि सच्चे गुरु का ज्ञान मोह को तोड़ता है और मन के अज्ञान को दूर करता है।
Recognize the true Guru—the Guru who reveals the path of Dharma. A true Guru is recognized through simplicity, discipline, sacred knowledge, inner sound and wisdom. Such a Guru understands the nature of existence and remains established in spiritual realization. The Guru is content and nourishes others through profound wisdom. A seeker should contemplate upon the true Guru, because true spiritual guidance breaks attachment and removes the impurities of the mind.
✦ मुख्य संदेश:

सच्चे गुरु की पहचान बाहरी आडंबर से नहीं, बल्कि ज्ञान, शील, सहजता और धर्म से होती है।

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64 Raag Sorath

शब्द 64 — शब्द 64: मैं कर भूला मांड पिराणी,

ओ३म्-मैं कर भूला मांड पिराणी, काचै कन्ध अगाजूं। काचा कंध गले गल जायसैं, बीखर जैला राजों। गड़ बड़ गाजा कांय बिबाजा, कण बिण कूकस कांय लेणा। कांय बोलो मुख ताजों, भरमी बादी अति अहंकारी। लावत यारी, पशुवां पड़ै भिरांति। जीव बिणासै लाहै कारणै, लोभ सवारथ खायबा खाज अखाजो। जो अति काले ले जम काले तेपण खीणा, जिहिं का लंका गढ़ था राजों। बिन हस्ति पाखर बिन गज गुड़ियों, बिन ढोंला डूमां लाकड़ियो। जाकै परसण बाजा बाजै, सो अपरंपर कांय न जंपो, हिन्हदू मुसलमानों। डर डर जीव कै काजै, रावा रंका राजा रांवां, रावत राजा, खाना खोजां, मीरां मुलका, घंघ फकीरां, घंघा गुरवां, सुरनर देवां, तिमर जू लंगा, आयसां जोयसा, साह पुरोहितां, मिश्रही ब्यासा रूंखां बिरखां, आव घंटती। अतरा माहे कूंण विशेषो, मरणत एको माघों। पशु मुकेरू लहैन फेरूं, कहे ज मेरूं सब जग केरूं, साचै सै हर करै घणेरूं। रिण छाणै यूं बीखर जैला, तातैं मेरूं न तेरूं। विसर गया ते माघूं, रक्तूं नातूं सेतूं धातूं कुमलावै यूं शागू। जीवर पिंड बिछोवा होयसी, ता दिन दाम दुगाणी। आडन पैंको रती बिसोवो सीझै नाही, ओपिंड काम न काजूं। आवत काया ले आयो थो, जातैं सूको जागो। आवत खिण एक लाई थी पर जातैं खिणी न लागो। भाग परापति कर्मा रेखां, दरगै जबला जबला माघौं। बिरखे पान झड़े झड़ जायला, तेपण तेई न लांगू। सेतू दगधूं कवलज कलीयों, कुमलावै यूं शागूं। ऋतुबशंती आई और भलेरा शागूं। भूला तेण गयारे प्राणी, तिहि का खोज न माघूं। विष्णु विष्णु भण लेई न साई, सुर नर ब्रह्मा को न गाई। तातैं जंवर बिन डसीरे भाई, बास बसंतै किवी न कमाई। जंवर तणा जमदूत दहैला, तातैं तेरी कहा न बसाई।
शबद संख्या 64 में गुरु जम्भेश्वर जी सृष्टि के मूल तत्वों—जल, वायु, पृथ्वी, वनस्पति और मूक पशु-पक्षियों के संरक्षण का पावन संदेश देते हैं। प्रकृति परमात्मा का ही स्वरूप है, अतः उसकी रक्षा करना प्रत्येक मनुष्य का सर्वोपरि धर्म है।
In Shabad #64, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He emphasizes the sacred sanctity of nature, water, air, trees, and voiceless creatures, teaching that preserving the environment is living worship of the omnipresent Creator.
✦ मुख्य संदेश:

धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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66 Raag Bilawal

शब्द 66 — शब्द 66: ऊमाज गुमाज पंज गंज यारी

ओ३म्-ऊमाज गुमाज पंज गंज यारी, रहिया कुपहीया शैतान की यारी। शैतान लो भल शैतान लो, शैतान बहो जुग छायो। शैतान की कुबध्यान खेती, यूं काल मध्ये कुचीलू। बे राही बे किरियावन्हत। कुमति दौरै जायसैं, शैतानी लोड़त रलियों। जां जां शैतानी करै उफारूं, तां तां महंत न फलियों। नील मध्ये कुचील करबा, साध संगिणी थूंलूं। पोहप मध्ये परमला जोती, यूं सुरग मध्ये लीलूं। संसार में उपकार ऐसा, यूं घण बरसंता नीरूं। संसार में उपकार ऐसा, यूं रूही मध्ये खीरूं।
शबद संख्या 66 में गुरु जम्भेश्वर जी मानव जीवन की नश्वरता और सत्कर्मों की महत्ता का बोध कराते हैं। वे प्राणी को सचेत करते हैं कि व्यर्थ के अहंकार को त्यागकर सत्य, शील, संतोष और परमार्थ के मार्ग पर चलें।
In Shabad #66, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He reflects upon the transient nature of human existence, urging seekers to transcend ego and cultivate humility, ethical discipline, and righteous living.
✦ मुख्य संदेश:

धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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70 Raag Kalyan

शब्द 70 — शब्द 70: हक हलालूं

ओ३म्-हक हलालूं, हक साच कृष्णों, सुकृत अहल्यो न जाई। भल बाहीलो भल बीजीलो, पवणा बाड़ बलाई। जींव कै काजै खड़ो ज खेती, तामें ले रखवालो रे भाई। दैतानी शैतानी फिरैला, तेरी मत मोरा चर जाई। उन मुन मनवा जीव जतन कर, मन राखी लो ठांई। जीव कै काजै खड़ो ज खेती, वाय दवाय न जाई। न तहां हिरणी न तहां हिरणा न चीन्हों हरि आई, न तहां मोरा न तहां मोरी न ऊंदर चर जाई। कोई गुरू कर ज्ञानी तोड़त मोहा तेरो मन रखवालो रे भाई, जो आराध्यो राव युधिष्ठर सो आराध्यो रे भाई।
शबद संख्या 70 में गुरु जम्भेश्वर जी धार्मिक पाखंड, बाह्य कर्मकांड और मूक प्राणियों पर होने वाली क्रूरता का कड़ा विरोध करते हैं। वे स्पष्ट उपदेश देते हैं कि परमात्मा के दरबार में दया, सत्य, पवित्र आचरण और ईमानदारी ही सच्ची बंदगी है।
In Shabad #70, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He fearlessly denounces hypocrisy, empty rituals, and cruelty against innocent beings, emphasizing that true divine devotion lies in universal compassion, truthful living, and non-violence.
✦ मुख्य संदेश:

धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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72 Raag Todi

शब्द 72 — शब्द 72: वेद कुराण कुमाया जालूं

ओ३म्-वेद कुराण कुमाया जालूं, भूला जीव कुजीव कुजाणी। बसंदर नहीं नख हीरूं, धर्म पुरूष सिरजीवै पूरूं। कलि का माया जाल फिटाकर प्राणी, गुरू की कलम कुरांण पिछांणी। दींन गुमान करैलो ठाली, यूं कण घातै घुण हांणी। साच सिदक शैतान चुकावो, यूं तिस चुकावै पांणी। मैं नर पूरा सरविणजो हीरा, लेसी जांकै हृदय लोयण अंधा रहा इवांणी। निरख लहो नर निरहारी, जिन चोखंड भीतर खेल पसारी। जंपो रे जिण जंपे लाभैं, रतन काया ए कहांणी। काही मारूं काहीं तारूं, किरिया बिहूंणा पर हथ सारूं। शील दहूं उबारूं ऊंन्हहै, एकल एह कहांणी। केवल ज्ञानी थल शिर आयो, परगट खेल पसारी। कोड़ तेतीसों पोह रचावण हारी, यूं छक आई सारी।
शबद संख्या 72 में गुरु जम्भेश्वर जी धार्मिक पाखंड, बाह्य कर्मकांड और मूक प्राणियों पर होने वाली क्रूरता का कड़ा विरोध करते हैं। वे स्पष्ट उपदेश देते हैं कि परमात्मा के दरबार में दया, सत्य, पवित्र आचरण और ईमानदारी ही सच्ची बंदगी है।
In Shabad #72, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He fearlessly denounces hypocrisy, empty rituals, and cruelty against innocent beings, emphasizing that true divine devotion lies in universal compassion, truthful living, and non-violence.
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धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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76 Raag Sorath

शब्द 76 — शब्द 76: तन मन धोइये संजम हुइये,

ओ३म्-तन मन धोइये संजम हुइये, हरष न खोइये। यूं यूं दुनिया करै खुवारी, त्यूं त्यूं किरिया पूरी। मुग्धां सेती यूं टल चालो, यूं खड़कै पास धनुरी।
शबद संख्या 76 में गुरु जम्भेश्वर जी मानव जीवन की नश्वरता और सत्कर्मों की महत्ता का बोध कराते हैं। वे प्राणी को सचेत करते हैं कि व्यर्थ के अहंकार को त्यागकर सत्य, शील, संतोष और परमार्थ के मार्ग पर चलें।
In Shabad #76, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He reflects upon the transient nature of human existence, urging seekers to transcend ego and cultivate humility, ethical discipline, and righteous living.
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धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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78 Raag Bilawal

शब्द 78 — शब्द 78: नवै पोल नवै दरवाजा

ओ३म्-नवै पोल नवै दरवाजा, अहूठ कोड़ रूं राय जड़ी। कांयरे सींचो बनमाली, इंहि बाड़ी तो भेल पड़सी। सुबचन बोल सदा सुहलाली, नाम विष्णु को हरे सुणो। घण तण गड़बड़ कायों वायों, निज मारग तो बिरला कायों। निज पोह पाखो पार असी पर, जाण म गाहि मै गायो गूंणो। श्रीराम में मति थोड़ी, जोय जोय कण विण कूकस कायों लेणो।
शबद संख्या 78 में गुरु जम्भेश्वर जी धार्मिक पाखंड, बाह्य कर्मकांड और मूक प्राणियों पर होने वाली क्रूरता का कड़ा विरोध करते हैं। वे स्पष्ट उपदेश देते हैं कि परमात्मा के दरबार में दया, सत्य, पवित्र आचरण और ईमानदारी ही सच्ची बंदगी है।
In Shabad #78, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He fearlessly denounces hypocrisy, empty rituals, and cruelty against innocent beings, emphasizing that true divine devotion lies in universal compassion, truthful living, and non-violence.
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धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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82 Raag Kalyan

शब्द 82 — शब्द 82: अलख-अलख तू अलख न लखणा,

ओ३म्-अलख-अलख तू अलख न लखणा, तेरा अनन्त इलोलूं। कौण सी तेरी करणी पूजै, कौण सैं तिहिं रूप संतूलूं।
शबद संख्या 82 में गुरु जम्भेश्वर जी मानव जीवन की नश्वरता और सत्कर्मों की महत्ता का बोध कराते हैं। वे प्राणी को सचेत करते हैं कि व्यर्थ के अहंकार को त्यागकर सत्य, शील, संतोष और परमार्थ के मार्ग पर चलें।
In Shabad #82, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He reflects upon the transient nature of human existence, urging seekers to transcend ego and cultivate humility, ethical discipline, and righteous living.
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धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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84 Raag Todi

शब्द 84 — शब्द 84: मूंड मुंडायो मन न मुंडायो,

ओ३म्-मूंड मुंडायो मन न मुंडायो, मुंह अबखल दिल लोभी। अन्हदर दया नहीं सुरकाने, निंदरा हड़ै कसोभी। गुरू गति छूटी टोट पड़ैला, उनकी आवा एकपख सातो। वै करणी हूंता खूंधा, असी सहस नव लाख भवैला कुंभी दौरे ऊंधा।
शबद संख्या 84 में गुरु जम्भेश्वर जी सद्गुरु की अनन्य महिमा और मार्गदर्शन की अनिवार्यता प्रकट करते हैं। गुरु-मुख से प्रकट होने वाला ज्ञान ही अज्ञान के अंधकार को मिटाकर मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।
In Shabad #84, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He glorifies the necessity of the True Master (Satguru), whose enlightened guidance dissolves worldly delusion and leads the aspirant towards liberation.
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88 Raag Sorath

शब्द 88 — शब्द 88: गोरख लो

ओ३म्-गोरख लो, गोपाल लो, लाल गवाल लो, लाल लीलंग देवों। नवखंड पृथिवी प्रगटियो, कोई बिरला जाणत म्हारी आद मूल का भेवों।
शबद संख्या 88 में गुरु जम्भेश्वर जी जोगियों, सिद्धों और बाह्य भेष धारियों को सच्चा योग समझाते हैं। वे सिखाते हैं कि कान छिदवाना, भभूत मलना या वन-कंदराओं में भटकना योग नहीं है, अपितु मन के विकारों को वश में करना और जीव दया पालना ही सच्चा योग है।
In Shabad #88, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He addresses ascetics and mendicants, elucidating that genuine Yoga is not found in external robes or ritual austerities, but in internal purity, self-control, and loving kindness towards all creation.
✦ मुख्य संदेश:

धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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90 Raag Bilawal

शब्द 90 — शब्द 90: चोईस चेड़ा कालिंग केड़ा

ओ३म्-चोईस चेड़ा कालिंग केड़ा, अधिक कलावंत आयसैं। वै फेर आसन, मुकर होय बैसैंला, नुगरा थान रचायसै। जाणत भूला महा पापी, बहु दुनियां भोलायसै। दिल का कूड़ा कुड़ीयारा, उपंग बात चलाय सै। गुरू गहणा जो लेवै नाहीं, दशबंध घर बोसायसै। आप थापी महापापी, दज्ज्धी परलै जायसै। सतगुरू कै बैडै न चढ़ै, गुरस्वामी नै भाय सै। मंत्र बेलु ऋध सिध कर सैं, दे दे कार चलायसै। काठ का घोड़ा निरजीव ता सरजीव कर सैं, तांनै दाल चरायसैं। अधर आसण मांड बैसैला, मूवा मड़ा हंसाय सैं। जां जां पवन आसण, पाणी आसण, चंद आसण, सूर आसण, गुरू आसण संभराथले। कहै सतगुरू भूल मत जाइयो, पड़ोला अभै दोजखे।
शबद संख्या 90 में गुरु जम्भेश्वर जी सृष्टि के मूल तत्वों—जल, वायु, पृथ्वी, वनस्पति और मूक पशु-पक्षियों के संरक्षण का पावन संदेश देते हैं। प्रकृति परमात्मा का ही स्वरूप है, अतः उसकी रक्षा करना प्रत्येक मनुष्य का सर्वोपरि धर्म है।
In Shabad #90, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He emphasizes the sacred sanctity of nature, water, air, trees, and voiceless creatures, teaching that preserving the environment is living worship of the omnipresent Creator.
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94 Raag Kalyan

शब्द 94 — शब्द 94: सहस्त्र नाम सांई भल शिंभु,

ओ३म्-सहस्त्र नाम सांई भल शिंभु, म्हे उपना आद मुरारी। जद मैं रहयो निरालंभ हो कर, उतपति धंधू कारी। ना मेरै मायन ना मेरै बापन, मैं अपनी काया आप संवारी। जुग छतीसों शून्हयहि बरत्या सतजुग माहीं सिरजी सारी। ब्रह्मा इन्हद्र सकल जग थरप्या, दीन्हही करामात केती वारी। चन्हद सूर दोय साक्षी थरप्या, पवन पवनेश्वर पवन अधारी। तदम्हे रूप कीयो मैनावतीयो, सत्यव्रत को ज्ञान उचारी। तदम्हे रूप र यो कामठीयो, तेतीसो की कोड़ हंकारी। जब मैं रूप धरयो बाराहि, पृथिवी दाढ़ चढ़ाई सारी। नरसिंह रूप धर हिरण्यकश्यप मारयो, प्रहलादो रहियो शरण हमारी। बावन होय बलिराज चितायो, तीन पैंड कीवीं धरसारी। परशुराम होय क्षत्रियपन साध्यो, गर्भ न छूट्यो नारी। च्ची राम शिर मुकुट बंधायो, सीता के अहंकारी। कन्हड़ होय कर बंसी बजाई गऊ चराई, धरती छेदी, काली ना यो, असुर मार किया क्षयकारी। बुद्ध रूप गयासुर मारयो, काफर मार किया बेगारी। पंथ चलायो राह दिखायो, नौवर विजय हुई हमारी। शेष जंभराय आप अपरंपर, अबल दिन से कहियो। जांभा गोरख गुरू अपारा। काजी मुल्ला पढ़िया पंडित, निंदा करै गवारा। दोजख छोड़ भिस्त जे चाहो, तो कहिया करो हमारा। इन्हद्रपुरी बैकुण्ठे बासो, तो पावो मोक्षहि द्वारा।
शबद संख्या 94 में गुरु जम्भेश्वर जी धार्मिक पाखंड, बाह्य कर्मकांड और मूक प्राणियों पर होने वाली क्रूरता का कड़ा विरोध करते हैं। वे स्पष्ट उपदेश देते हैं कि परमात्मा के दरबार में दया, सत्य, पवित्र आचरण और ईमानदारी ही सच्ची बंदगी है।
In Shabad #94, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He fearlessly denounces hypocrisy, empty rituals, and cruelty against innocent beings, emphasizing that true divine devotion lies in universal compassion, truthful living, and non-violence.
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96 Raag Todi

शब्द 96 — शब्द 96: सुण गुणवंता

ओ३म्-सुण गुणवंता, सुण बुधवंता, मेरी उत्पत्ति आद लुहारूं। भाठी अंदर लोह तपीलो, तंतक सोना घड़ै कसारूं। मेरी मनसा अहरण, नाद हथोडाे, शशीयर सूर तपीलो। पवन अधारी खालूं। जेथे गुरू का शब्द मानीलो, लंघिबा भव जल पारूं। आसण छोड़ि सुखासण बैठो, जुग-जुग जीवै जंभ लुहारूं।
शबद संख्या 96 में गुरु जम्भेश्वर जी जोगियों, सिद्धों और बाह्य भेष धारियों को सच्चा योग समझाते हैं। वे सिखाते हैं कि कान छिदवाना, भभूत मलना या वन-कंदराओं में भटकना योग नहीं है, अपितु मन के विकारों को वश में करना और जीव दया पालना ही सच्चा योग है।
In Shabad #96, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He addresses ascetics and mendicants, elucidating that genuine Yoga is not found in external robes or ritual austerities, but in internal purity, self-control, and loving kindness towards all creation.
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100 Raag Sorath

शब्द 100 — शब्द 100: अर्थूं गर्थूं साहण थाटूं

ओ३म्-अर्थूं गर्थूं साहण थाटूं, कूड़ा दीठो ना ठाटों। कूड़ी माया जाल न भूली रे राजेन्हद्र, अलगी रही ओजूं की बाटों। नवलख दंताला बार करीलो, बार करे कर बंद करीलो। बंद करे कर दान करीलो, दान करे कर मन फूलीलो। तंत मंत बीर बेताल करीलो, खायबा खाज अखाजू। निरह निरंजन नर निरहारी, तऊ न मिलबा झंझा भाग अभागूं।
शबद संख्या 100 में गुरु जम्भेश्वर जी मानव जीवन की नश्वरता और सत्कर्मों की महत्ता का बोध कराते हैं। वे प्राणी को सचेत करते हैं कि व्यर्थ के अहंकार को त्यागकर सत्य, शील, संतोष और परमार्थ के मार्ग पर चलें।
In Shabad #100, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He reflects upon the transient nature of human existence, urging seekers to transcend ego and cultivate humility, ethical discipline, and righteous living.
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102 Raag Bilawal

शब्द 102 — शब्द 102: विष्णु विष्णु भण अजर जरीजै,

ओ३म्-विष्णु विष्णु भण अजर जरीजै, धर्म हुवै पापां छूटीजै। हरि पर हरि को नाम जपीजै, हरियालो हरि आण हरूं। हरी नारायण देव नरूं। आशा सास निरास भईलो, पाईलो मोक्ष दवार खिंणू।
शबद संख्या 102 में गुरु जम्भेश्वर जी अविनाशी परमात्मा विष्णु के अनन्य सुमिरन का संदेश देते हैं। वे मानव को सचेत करते हैं कि सांसारिक भ्रम और मोह-माया नश्वर हैं; केवल प्रभु का नाम और सदाचार ही भवसागर पार कराने वाले हैं।
In Shabad #102, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He inspires ceaseless remembrance of the Supreme Lord Vishnu, reminding the soul that worldly entanglements are fleeting and only spiritual truth liberates from worldly suffering.
✦ मुख्य संदेश:

धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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106 Raag Kalyan

शब्द 106 — शब्द 106: सुंणरे काजी सुंणरे मुल्ला

ओ३म्-सुंणरे काजी सुंणरे मुल्ला सुणियो लोग लुगाई। नर निरहारी एक लवाई, जिन यो राह फुरमाई। जोर जरब करद जे छाड़ो, तो कलमा नाम खुदाई। जिनकै साच सिदक इमान सलामत, जिण यो भिस्त उपाई।
शबद संख्या 106 में गुरु जम्भेश्वर जी धार्मिक पाखंड, बाह्य कर्मकांड और मूक प्राणियों पर होने वाली क्रूरता का कड़ा विरोध करते हैं। वे स्पष्ट उपदेश देते हैं कि परमात्मा के दरबार में दया, सत्य, पवित्र आचरण और ईमानदारी ही सच्ची बंदगी है।
In Shabad #106, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He fearlessly denounces hypocrisy, empty rituals, and cruelty against innocent beings, emphasizing that true divine devotion lies in universal compassion, truthful living, and non-violence.
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108 Raag Todi

शब्द 108 — शब्द 108: हालीलो भल पालीलो सिध पालीलो

ओ३म्-हालीलो भल पालीलो सिध पालीलो, खेड़त सूना राणो। चन्हद सूर दोय बैल रचीलो, गंग जमन दोय रासी। सत संतोष दोय बीज बीजीलो, खेती खड़ी अकासी। चेतन रावल पहरै बैठे, मृगा खेती चर नहीं जाई। गुरू प्रसादे, केवल ज्ञाने, ब्रह्मज्ञाने, सहजे स्नाने, यह घर ऋध सिध पाई।
शबद संख्या 108 में गुरु जम्भेश्वर जी सद्गुरु की अनन्य महिमा और मार्गदर्शन की अनिवार्यता प्रकट करते हैं। गुरु-मुख से प्रकट होने वाला ज्ञान ही अज्ञान के अंधकार को मिटाकर मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।
In Shabad #108, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He glorifies the necessity of the True Master (Satguru), whose enlightened guidance dissolves worldly delusion and leads the aspirant towards liberation.
✦ मुख्य संदेश:

धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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112 Raag Sorath

शब्द 112 — शब्द 112: जांके पंथ का भांजणा

ओ३म्-जांके पंथ का भांजणा, गुरू का नींदणा। स्वामी का दुस्मणा, कुफर ते काफरा। कुमली कुपातूं, कुचिला कुधातू। हड़ हड़ा, भड़ हड़ा, दाणबे दूतबा, दाणबे भूतबा, राकसा बोकसा, जांका जन्हम नहीं पर कर्म चंडालूं। और कूं जिभै कर आप कूं पोखणा, जिहिंकी रूवाली दीजसीं, दौरे घुप अंधारौं। तान बे तानबा, छान बे छानबा, तोड़ बे तोड़बा, कूक बे पुकारबा, जांकी कोई न करबा सारूं।
शबद संख्या 112 में गुरु जम्भेश्वर जी सद्गुरु की अनन्य महिमा और मार्गदर्शन की अनिवार्यता प्रकट करते हैं। गुरु-मुख से प्रकट होने वाला ज्ञान ही अज्ञान के अंधकार को मिटाकर मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।
In Shabad #112, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He glorifies the necessity of the True Master (Satguru), whose enlightened guidance dissolves worldly delusion and leads the aspirant towards liberation.
✦ मुख्य संदेश:

धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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114 Raag Bilawal

शब्द 114 — शब्द 114: सुरनर तणो सन्हदेसो आयो

ओ३म्-सुरनर तणो सन्हदेसो आयो, सांभलीयो रे जाटो। चांदणै थकै अंधेरै यूं चालो, भूल गया गुरू बाटो। नीर थकै घट थूल यूं राखो, सबल बिगोवो खाटो। मागर मणिया यूं हाथि बिसाहो, कांय हीरा हाथ उसाटो। सुरनर तणो संदेसो आयो, सांभलियो रे।
शबद संख्या 114 में गुरु जम्भेश्वर जी सद्गुरु की अनन्य महिमा और मार्गदर्शन की अनिवार्यता प्रकट करते हैं। गुरु-मुख से प्रकट होने वाला ज्ञान ही अज्ञान के अंधकार को मिटाकर मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।
In Shabad #114, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He glorifies the necessity of the True Master (Satguru), whose enlightened guidance dissolves worldly delusion and leads the aspirant towards liberation.
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धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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118 Raag Kalyan

शब्द 118 — शब्द 118: सुरगा हूंते शम्भू आयो

ओ३म्-सुरगा हूंते शम्भू आयो, कहो कूंणा के काजै। नर निरहारी एकलवाई, परगट जोत विराजै। प्रहलादा सूं वाचा कीवी, आयो बारां काजै। बारा मैं सूं एक घटै तो, सू चेलो गूरू लाजै।
शबद संख्या 118 में गुरु जम्भेश्वर जी मानव जीवन की नश्वरता और सत्कर्मों की महत्ता का बोध कराते हैं। वे प्राणी को सचेत करते हैं कि व्यर्थ के अहंकार को त्यागकर सत्य, शील, संतोष और परमार्थ के मार्ग पर चलें।
In Shabad #118, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He reflects upon the transient nature of human existence, urging seekers to transcend ego and cultivate humility, ethical discipline, and righteous living.
✦ मुख्य संदेश:

धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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