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✦ श्री गुरु जम्भेश्वर भगवान • प्रामाणिक 120 शब्दवाणी डिजिटल अभिलेखागार (C9.2.1)

शब्दवाणी — 120 Sacred Shabds

सत्य, धर्म, करुणा, जीव-दया एवं पर्यावरण संरक्षण के पावन अमर उपदेश। मूल शब्दवाणी अपरिवर्तनीय सुरक्षित, हिन्दी भावार्थ एवं English translation सहित।

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आज का पावन शबद (Daily Wisdom)

शब्द 71: शब्द 71: धवणा धूजै पाहण पूजै बे फरमाई खुदाई

मूल वाणी:

ओ३म्-धवणा धूजै पाहण पूजै बे फरमाई खुदाई, गुरू के चेले के पाए लागै देखो लोग अन्हयायी। काठी कणजो रूपा रेहण, कापड़ मांह छिपाई। नीचा पड़ पड़ तानैं धोकें, धीरा रे हरि आई। ब्राह्मण नाऊं लादण रूड़ा, बूता नाऊं कूता। वै अपहानै पोह बत...

हिन्दी भावार्थ:

शबद संख्या 71 में गुरु जम्भेश्वर जी जोगियों, सिद्धों और बाह्य भेष धारियों को सच्चा योग समझाते हैं। वे सिखाते हैं कि कान छिदवाना, भभूत मलना या वन-कंदराओं में भटकना योग नहीं है, अपितु मन के विकारों को वश में करना और जीव दय...

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63 Raag Asavari

शब्द 63 — शब्द 63: आतर पातर राही रूक्मण

ओ३म्-आतर पातर राही रूक्मण मेल्हा मंदिर भोयो, गढ़ सोवन तेपण मेल्हा रहा छड़ा सी जोयों। रात पडंता पाला भी जाग्या, दिवस तपंता सूरू। ऊन्हा ठाढा पवना भी जाग्या, घन बरसंता नीरूं। दुनीतणा औचाट भी जाग्या, के के नुगरा देता गाल गहीरूं। जिहिं तन ऊना ओढण ओंढां, तिहिं ओढंता चीरूं। जां हाथे जप माली जपां, तहां जपंता हीरूं। बारा काजै पड्यो बिछोहो, संभल संभल झूरूं। राघो सीता हनुवंत पाखों, कौन बंधावत धीरूं। मागर मणिया कांच कथीरूं, हीरस हीरा हीरूं। विखा पटंतर पड़ता आया, पूरस पूरा पूरूं। जे रिण राहे सूर गहीजै, तो सूरज सूरा सूरूं। दुखिया है जे सुखिया होयसैं, करसै राज गहीरूं। माह अंगीठी बिरखा ओल्हो, जेठ न ठंडा नीरूं। पलंग न पोढण, सेज न सोवण कंठ रूलंता हीरूं। इतना मोह न मानै शिंभु, तहीं तहीं सुसीरू। घोड़ा चौली बाल गुदाई, श्री राम का भाई। गुरू की बाचा बहियों, राघों सीता हनुवंत पाखो। दुख सुख कांसू कहियों।
शबद संख्या 63 में गुरु जम्भेश्वर जी सृष्टि के मूल तत्वों—जल, वायु, पृथ्वी, वनस्पति और मूक पशु-पक्षियों के संरक्षण का पावन संदेश देते हैं। प्रकृति परमात्मा का ही स्वरूप है, अतः उसकी रक्षा करना प्रत्येक मनुष्य का सर्वोपरि धर्म है।
In Shabad #63, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He emphasizes the sacred sanctity of nature, water, air, trees, and voiceless creatures, teaching that preserving the environment is living worship of the omnipresent Creator.
✦ मुख्य संदेश:

धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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65 Raag Gauri

शब्द 65 — शब्द 65: तउवा जाग जु गोरख जाज्ज्या,

ओ३म्-तउवा जाग जु गोरख जाग्या, निरह निरंजन निरह निरालंब। जुग छतीसों एकै आसन बैठा बरत्या, अवर भी अबधू जागत जांगू। तउवा त्याग जू ब्रह्मा त्यागा, अवर भी त्यागत त्यागूं। तउवा भाग जो इश्वर मस्तक, अवर भी मस्तक भागूं। तउवा सीर जो ईश्वर गौरी, अवर भी कहियत सीरूं। तउवा बीर जो राम लक्ष्मण, अवर भी कहियत बीरों। तउवा पाग जो दश शिर बांधी, अवर भी बांधत पागो। तउवा लाज जो सीता लाजी, अवर भी लाजत लाजूं। तउवा बाजा राम बजाया, अवर बजावत बाजूं। तउवा पाज जो सीता कारण लक्ष्मण बांधी, अवर भी बांधत पाजूं। तउवा काज जो हनुमत सारा, अवर भी सारत काजूं। तउवा खागज जो कुम्भकरण महरावण खाज्या, अवर भी खावत खागूं। तउवा राज दुर्योधन माण्या, अवर भी माणत राजूं। तउवा राग ज कन्हड़ बांणी, अवर भी कहिये रागूं। तउवा माघ तुरंगम तेजी, टटू तणा भी माघूं। तउवा बागज हंसा टोली, बुगला टोली भी बागूं। तउवा नाग उद्यावल कहिये, गरूड़ सीया भी नागूं। तउवा शागज नागरबेली, कूकर बगरा भी शांगू। जां जां शैतानी करै उफारूं, तां तां महंतज फलियों। जुरा जम राक्षस जुरा जुरिन्द्र, कंश केशी चंडरूं। मधु कीचक हिरणाक्ष हिरणाकुस, चक्र धर बलदेऊं। पावत वासुदेवो मंडलीक कांय न जोयबा, इहिं धर ऊपर रती न रहीबा रांजू।
शबद संख्या 65 में गुरु जम्भेश्वर जी जोगियों, सिद्धों और बाह्य भेष धारियों को सच्चा योग समझाते हैं। वे सिखाते हैं कि कान छिदवाना, भभूत मलना या वन-कंदराओं में भटकना योग नहीं है, अपितु मन के विकारों को वश में करना और जीव दया पालना ही सच्चा योग है।
In Shabad #65, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He addresses ascetics and mendicants, elucidating that genuine Yoga is not found in external robes or ritual austerities, but in internal purity, self-control, and loving kindness towards all creation.
✦ मुख्य संदेश:

धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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69 Raag Sarang

शब्द 69 — शब्द 69: जबरारे तैं जग डांडीलो

ओ३म्-जबरारे तैं जग डांडीलो, देह न जीती जांणो। माया जाले ले जम काले, लेणा कोण समाणो। काचै पिंडै किसी बड़ाई, भोलै भूल अयांणो। म्हां देखंता देव दाणु, सुर नर खीणा, बीच गया बेराणो। कुभंकरण महरावण होता, अबली जोध अयाणो। कोट लंका गढ बिषमा होता, कांयदा बस गया रावण राणो। नौ ग्रह रावण पाए बन्हध्या, तिस बीह सुर नर शंक भयाणो। ले जम कालें अति बुधवंतो, सीता काज लुंभाणो। भरमी बादी अति अंहकारी, करता गरब गुमानो। तेऊ तो जम काले खीणा, थिर न लाधौ थाणो। काचै पिंड अकाज अफारूं, किसो पिराणी माणो। साबण लाख मजीठ बिगूता, थोथा बाजर घाणो। दुनियां राचै गाजै बाजै, तामें कणू न दाणू। दूनियां के रंग सब कोई राचै, दीन रचै सो जाणो। लोही मांस बिकारो होयसी, मुर्ख फिरै अयाणो। मागर मणियां काच कथीरन राचो, कूड़ा दुनी डफाणो। चलन चलन्हतै, जीव जीवन्हतै, काया निवन्हती सास फुरंतै। कांयरे प्राणी विष्णु न जं यो, कीयो कन्हधै को तांणो। तिहिं ऊपर आवैला जंवर तणा दल, तास किसो सहनाणौ। ताकै शीष न ओढण पाय न पहरण, नैवा झूल झयाणो। धणक न बाण न टोप न अंगा, टाटर चुगल चयाणो। साल सुचंगी घृत सुबासो, पीवण न ठंडा पांणी। सेज न सोवण पंलग न पोढण, छात न मैड़ी माणो। न वां दइया न वां मइयां, नागड़ दूत भयाणो। काचा तोड़ नीकूचा भाखे, अघट घटैं मल माणो। धरती अरू असमान अगोचर, जा तैं जीव न देही जाणो। आवत जावत दीसै नाहीं, साचर जाय अयाणो। जंवर तंणा जमदूत दहैला, मल बेसैला मांणों। तातै कलीयर कागा रोलो, सूना रहयो अयाणो। आयसां जोयसां भणता गुणतां, वार महूर्ता पोथा थोथा। पुस्तक पढिया वेद पुराणों, भूत परेती कांय जपीजै यह पाखण्ड परमाणों। कान्हह दिशावर जेकर चालो, रतन काया ले पार पहूंचो, रहसी आवा जाणो। तांह परेरै पार गिरायें ततकै निश्चल थाणो। सो अपरंपर कांय न जंपो, ततखिण लहो इमाणो। भल मूल सींचो रे प्राणी, यूं तरवर मेलत डालूं। जइया मूल न सी यो, तो जामण मरण बिगोवो। अहनिश करणी थिर न रहिबा, न बं यो जम कालूं। कोई कोई भल मूल सींचीलो, भल तंत बूझीलो। जा जीवन की विध जाणी, जीव तड़ा कछु लाहो होसी मूवा न आवत हांणी।
शबद संख्या 69 में गुरु जम्भेश्वर जी धार्मिक पाखंड, बाह्य कर्मकांड और मूक प्राणियों पर होने वाली क्रूरता का कड़ा विरोध करते हैं। वे स्पष्ट उपदेश देते हैं कि परमात्मा के दरबार में दया, सत्य, पवित्र आचरण और ईमानदारी ही सच्ची बंदगी है।
In Shabad #69, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He fearlessly denounces hypocrisy, empty rituals, and cruelty against innocent beings, emphasizing that true divine devotion lies in universal compassion, truthful living, and non-violence.
✦ मुख्य संदेश:

धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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71 Raag Kedara

शब्द 71 — शब्द 71: धवणा धूजै पाहण पूजै बे फरमाई खुदाई

ओ३म्-धवणा धूजै पाहण पूजै बे फरमाई खुदाई, गुरू के चेले के पाए लागै देखो लोग अन्हयायी। काठी कणजो रूपा रेहण, कापड़ मांह छिपाई। नीचा पड़ पड़ तानैं धोकें, धीरा रे हरि आई। ब्राह्मण नाऊं लादण रूड़ा, बूता नाऊं कूता। वै अपहानै पोह बतावैं, बैर जगावैं सूता। भूत परेती जाखा खांणी, यह पाखण्ड परवाणो। बल बल कूकस कांय दलीजै, जामे कणूं न दाणू। तेल लीयो खल चोपै जोगी, खलपण सूंघी बिकाणो। कालर बीज न बीज पिराणी, थल सिर न कर निवाणो। नीर गए छीलर कांय सोधो, रीता रह्या इवाणो। भवंता ते फिरंता, फिरंता ते भवंता, मड़े मसाणे। तड़े तड़ंगे, पड़े पखांणे, वहां तो सिद्धि न काई। निज पोह खोज पिराणी, जे नर दावो छोड्यो मेर चुकाई, राह तेतीसों की जाणी।
शबद संख्या 71 में गुरु जम्भेश्वर जी जोगियों, सिद्धों और बाह्य भेष धारियों को सच्चा योग समझाते हैं। वे सिखाते हैं कि कान छिदवाना, भभूत मलना या वन-कंदराओं में भटकना योग नहीं है, अपितु मन के विकारों को वश में करना और जीव दया पालना ही सच्चा योग है।
In Shabad #71, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He addresses ascetics and mendicants, elucidating that genuine Yoga is not found in external robes or ritual austerities, but in internal purity, self-control, and loving kindness towards all creation.
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धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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75 Raag Asavari

शब्द 75 — शब्द 75: जोगी रे तू जुगत पिछांणी,

ओ३म्-जोगी रे तू जुगत पिछांणी, काजी रे तू कलम गऊ बिणासो कांहे तानी, राम रजा यूं दीन्हही दानी। कान्हह चराई रनबे वांनी, निरगुन रूप हमें पतियानी। थल शिर रह्या अगोचर बानी, ध्याय रे मुंडिया पर दानी। फीटा रे अण होता तानी, अलख लेखो लेसी जानी।
शबद संख्या 75 में गुरु जम्भेश्वर जी धार्मिक पाखंड, बाह्य कर्मकांड और मूक प्राणियों पर होने वाली क्रूरता का कड़ा विरोध करते हैं। वे स्पष्ट उपदेश देते हैं कि परमात्मा के दरबार में दया, सत्य, पवित्र आचरण और ईमानदारी ही सच्ची बंदगी है।
In Shabad #75, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He fearlessly denounces hypocrisy, empty rituals, and cruelty against innocent beings, emphasizing that true divine devotion lies in universal compassion, truthful living, and non-violence.
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77 Raag Gauri

शब्द 77 — शब्द 77: भूला लो भल भूला लो,

ओ३म्-भूला लो भल भूला लो, भूला भूल न भूलूं। जिहिं ठूंठडीये पान न होता, ते यूं चाहत फूलूं। को को कपूर घूंटीलो, बिन घूंटी नहीं जाणी। सतगुरू होयबा सहजे चीन्हबा, जाचंध आल बखांणी। ओछी किरिया आवै फिरियां, भ्रांती सुरग न जाई। अन्हत निरंजन लेखो लेसी, पर चीन्हों नहीं लोकाई। कण बिन कूकस रस बिन बाकस, बिन किरिया परिवारूं। हरि बिंन देहरै जांण न पावै, अम्बाराय दवारूं।
शबद संख्या 77 में गुरु जम्भेश्वर जी अविनाशी परमात्मा विष्णु के अनन्य सुमिरन का संदेश देते हैं। वे मानव को सचेत करते हैं कि सांसारिक भ्रम और मोह-माया नश्वर हैं; केवल प्रभु का नाम और सदाचार ही भवसागर पार कराने वाले हैं।
In Shabad #77, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He inspires ceaseless remembrance of the Supreme Lord Vishnu, reminding the soul that worldly entanglements are fleeting and only spiritual truth liberates from worldly suffering.
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81 Raag Sarang

शब्द 81 — शब्द 81: भल पांखडी पाखंड मंडा

ओ३म्-भल पांखडी पाखंड मंडा, पहला पाप परा छत खंडा। जा पाखंडी कै नादे वेदे शीले शब्दे बाजत पौण, ता पाखंडी नै चीन्हत कौण। जाकी सहजै चूकै आवागौण।
शबद संख्या 81 में गुरु जम्भेश्वर जी मानव जीवन की नश्वरता और सत्कर्मों की महत्ता का बोध कराते हैं। वे प्राणी को सचेत करते हैं कि व्यर्थ के अहंकार को त्यागकर सत्य, शील, संतोष और परमार्थ के मार्ग पर चलें।
In Shabad #81, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He reflects upon the transient nature of human existence, urging seekers to transcend ego and cultivate humility, ethical discipline, and righteous living.
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83 Raag Kedara

शब्द 83 — शब्द 83: जो नर घोड़ै चढै पाग न बांधै

ओ३म्-जो नर घोड़ै चढै पाग न बांधै, ताकी करणी कौण बिचारूं। शुचियारा होयसी आय मिलसी, करड़ा दोजग खारूं। जीव तड़े को रिजक न मेटूं, मूवां परहथ सारूं। हाथ न धोवै पग न पखालै, नाहरसिंघ नर काजूं। जुग अनंत अनंत बरत्या, म्हे शून्हय मंडल का राजूं।
शबद संख्या 83 में गुरु जम्भेश्वर जी सृष्टि के मूल तत्वों—जल, वायु, पृथ्वी, वनस्पति और मूक पशु-पक्षियों के संरक्षण का पावन संदेश देते हैं। प्रकृति परमात्मा का ही स्वरूप है, अतः उसकी रक्षा करना प्रत्येक मनुष्य का सर्वोपरि धर्म है।
In Shabad #83, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He emphasizes the sacred sanctity of nature, water, air, trees, and voiceless creatures, teaching that preserving the environment is living worship of the omnipresent Creator.
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87 Raag Asavari

शब्द 87 — शब्द 87: जिंह का उमज्ज्या समाघूं

ओ३म्-जिंह का उमग्या समाघूं, तिहिं पंथ के बिरला लागूं। बीजा चाकर बीरूं, रण शंख धीरूं। कबही झूझत रायूँ, पासै भाजत भायों। तातैं नुगरा झूझ न कीयों।
शबद संख्या 87 में गुरु जम्भेश्वर जी मानव जीवन की नश्वरता और सत्कर्मों की महत्ता का बोध कराते हैं। वे प्राणी को सचेत करते हैं कि व्यर्थ के अहंकार को त्यागकर सत्य, शील, संतोष और परमार्थ के मार्ग पर चलें।
In Shabad #87, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He reflects upon the transient nature of human existence, urging seekers to transcend ego and cultivate humility, ethical discipline, and righteous living.
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89 Raag Gauri

शब्द 89 — शब्द 89: उरधक चन्हदा

ओ३म्-उरधक चन्हदा, निरधक सूरूं, नव लख तारा नेड़ा न दूरूं। नव लख चन्हदा नव लख सूरूं, नव लख धंधू कारूं। तांह परेरै तेपण होता, तिंहका करूं बिचारूं।
शबद संख्या 89 में गुरु जम्भेश्वर जी धार्मिक पाखंड, बाह्य कर्मकांड और मूक प्राणियों पर होने वाली क्रूरता का कड़ा विरोध करते हैं। वे स्पष्ट उपदेश देते हैं कि परमात्मा के दरबार में दया, सत्य, पवित्र आचरण और ईमानदारी ही सच्ची बंदगी है।
In Shabad #89, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He fearlessly denounces hypocrisy, empty rituals, and cruelty against innocent beings, emphasizing that true divine devotion lies in universal compassion, truthful living, and non-violence.
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93 Raag Sarang

शब्द 93 — शब्द 93: आद शब्द अनाहद बांणी

ओ३म्-आद शब्द अनाहद बांणी, चवदै भवण रहया पाणी। जिहिं पाणी से इंड ऊपना, उपन्ना ब्रह्मा इन्हद्र मुरारी।
शबद संख्या 93 में गुरु जम्भेश्वर जी सृष्टि के मूल तत्वों—जल, वायु, पृथ्वी, वनस्पति और मूक पशु-पक्षियों के संरक्षण का पावन संदेश देते हैं। प्रकृति परमात्मा का ही स्वरूप है, अतः उसकी रक्षा करना प्रत्येक मनुष्य का सर्वोपरि धर्म है।
In Shabad #93, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He emphasizes the sacred sanctity of nature, water, air, trees, and voiceless creatures, teaching that preserving the environment is living worship of the omnipresent Creator.
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95 Raag Kedara

शब्द 95 — शब्द 95: बाद बिवाद फिटाकर प्राणी

ओ३म्-बाद बिवाद फिटाकर प्राणी, छाडो मनहट मन का भाणो। कांही कै मन भयो अंधेरो, कांही सूर उगाणो। नुगरा कै मन भयो अंधेरो, सुगरा सूर उगाणो। चरण भी रहिया, लोयण झुरिया, पिंजर पड्यो पुराणो। बेटा बेटी बहन रू भाई, सबसै भयो अभाणो। तेल लियो खल चोपै जोगी, रीता रहीयो घाणो। हंस उडाणो पंथ बिलब्यो, कीयो दूर पयाणो। आगै सुरपति लेखो मांगै, कहि जीवड़ा के करण कमाणो। जीवड़ा नै पाछो सुझण लागो सुकरत नै पछताणो।
शबद संख्या 95 में गुरु जम्भेश्वर जी जोगियों, सिद्धों और बाह्य भेष धारियों को सच्चा योग समझाते हैं। वे सिखाते हैं कि कान छिदवाना, भभूत मलना या वन-कंदराओं में भटकना योग नहीं है, अपितु मन के विकारों को वश में करना और जीव दया पालना ही सच्चा योग है।
In Shabad #95, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He addresses ascetics and mendicants, elucidating that genuine Yoga is not found in external robes or ritual austerities, but in internal purity, self-control, and loving kindness towards all creation.
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99 Raag Asavari

शब्द 99 — शब्द 99: साच सही म्हे कूड़ न कहिबा

ओ३म्-साच सही म्हे कूड़ न कहिबा, नेड़ा था पण दूर न रहीबा। सदा सन्हतोषी सत उपकरणा, म्हे तजीया मान अभिमानू। बस कर पवणा बस कर पाणी, बस कर हाट पटण दरवाजों। दशे दवारे ताला जड़िया, जो ऐसा उसताजों। दशे दवारे ताला कूंची, भीतर पोल बणाई। जो आराध्यो राव युधिष्ठर, सो अराधो रे भाई। जिहिं गुरू कै झुरैन झुरबा, खिरैन खिंरणा, बंक तृबंके, नाल पै नालै। नैंणे नीर न झुरबा, बिन पुल बंध्या बांणो। त या आलिंगण तोड़ी माया, तन लोचन गुण बांणो। हालीलो भल पालीलो सिध पालीलो, खेड़त सूना राणो।
शबद संख्या 99 में गुरु जम्भेश्वर जी सृष्टि के मूल तत्वों—जल, वायु, पृथ्वी, वनस्पति और मूक पशु-पक्षियों के संरक्षण का पावन संदेश देते हैं। प्रकृति परमात्मा का ही स्वरूप है, अतः उसकी रक्षा करना प्रत्येक मनुष्य का सर्वोपरि धर्म है।
In Shabad #99, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He emphasizes the sacred sanctity of nature, water, air, trees, and voiceless creatures, teaching that preserving the environment is living worship of the omnipresent Creator.
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101 Raag Gauri

शब्द 101 — शब्द 101: नितही मावस नित संकरांति

ओ३म्-नितही मावस नित संकरांति, नितही नवग्रह वैसैं पांति। नितही गंग हिलोले जाय, सतगुरू चीन्है सहजै न्ह्वाय। निरमल पाणी निरमल घाट निरमल धोबी मांड्यो पाट, जेयो धोबी जाणे धोय घर में मैला वस्त्र रहै न कोय। एक मन एक चित साबण लावै, पहरंतो गाहक अति सुख पावै। ऊंचै नीचे करै पसारा, नाहीं दूजै का संचारा। तिल में तेल पहुप में बास, पांच तत में लियो प्रकाश। बिजली कै चमकै आवै जाय, सहज शून्य में रहै समाय। नै यो गावै न यो गवावै, सुरगे जाते बार न लावै। सतगुरू ऐसा तत बतावै, जुग जुग जीवै बहुरि न आवैं।
शबद संख्या 101 में गुरु जम्भेश्वर जी धार्मिक पाखंड, बाह्य कर्मकांड और मूक प्राणियों पर होने वाली क्रूरता का कड़ा विरोध करते हैं। वे स्पष्ट उपदेश देते हैं कि परमात्मा के दरबार में दया, सत्य, पवित्र आचरण और ईमानदारी ही सच्ची बंदगी है।
In Shabad #101, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He fearlessly denounces hypocrisy, empty rituals, and cruelty against innocent beings, emphasizing that true divine devotion lies in universal compassion, truthful living, and non-violence.
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105 Raag Sarang

शब्द 105 — शब्द 105: आप अलेख उपन्ना शंभू

ओ३म्-आप अलेख उपन्ना शंभू, निरह निरंजन धंधू कारूं। आपै आप हुआ अपरंपर, न तद चन्हदा नै तद सूरूं। पवण न पाणी धरती आकाश न थीयों। नातद मास न वर्ष न घड़ी न पहरूं, धूप न छाया ताव न सीयों। न त्रिलोक न तारा मंडल, मेघ न माला वर्षा थीयों। न तद जोग नक्षत्र तिथि न बारसीयो, ना तद चवदश पूनो मावसींयो। न तद समद न सागर न गिरि न पर्वत, ना धौलागिर मेर थींयो। ना तद हाट न बाट न कोट न कसबा, बिणज न बाखर लाभ थीयों। यह छत धार बड़े सुलतानो, रावण राणा ये दिवाणा हिन्हदू मुसलमानु। दोय पंथ नाही जूवा जूवा। नातद कामन करसण, जोगन दर्शन। तीर्थ वासी ये मसवासी, ना तद होता जपिया तपिया। न ख चर हींवर बाज थीयो। नातद शूर न वीर न खड़ग न क्षत्री, रण संग्रांम न जूझ न थीयों। ना तद सिंह न स्यावज मिरग पंखेरूं, हंस न मोरा लेल सूवो। रंग न रसना, कापड़ चोपड़, गोहूं चावल भोग थीयों। माय न बाप न बहण न भाई, ना तद होता पूत धीयों। सास न शब्दूं, जीव न पिंडू, नातद होता पुरूष त्रियों। पाप न पुण्य न सती कुसती, नातद होती मया न दया। आपै आप ऊपनां शम्भू, निरह निरंजन धन्हधू कारूं। आपो आप हुआ अपरंपर, हे राजेन्हद्र लेह विचारूं।
शबद संख्या 105 में गुरु जम्भेश्वर जी सृष्टि के मूल तत्वों—जल, वायु, पृथ्वी, वनस्पति और मूक पशु-पक्षियों के संरक्षण का पावन संदेश देते हैं। प्रकृति परमात्मा का ही स्वरूप है, अतः उसकी रक्षा करना प्रत्येक मनुष्य का सर्वोपरि धर्म है।
In Shabad #105, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He emphasizes the sacred sanctity of nature, water, air, trees, and voiceless creatures, teaching that preserving the environment is living worship of the omnipresent Creator.
✦ मुख्य संदेश:

धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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107 Raag Kedara

शब्द 107 — शब्द 107: सहजे शीले सेज बिछायों

ओ३म्-सहजे शीले सेज बिछायों, उनमन रह्या उदांसू। जुगे जुगन्तर भवे भवन्तर, कहो कहाणी कासूं। रवि ऊगा जब उल्लू अन्धा, दुनियां भया उजासूं। सतगुरू मिलियो सतपंथ बतायो भ्रांत चुकाई, सुगरां भयो बिसवासूं। जां जां जांण्यो, तहां प्रवाणो। सहज समाणो, जिहिं के मन की पूगीं आसूं। जहां गुरू न चीन्हों पंथ न पायो, तहां गल पड़ी परासूं।
शबद संख्या 107 में गुरु जम्भेश्वर जी सद्गुरु की अनन्य महिमा और मार्गदर्शन की अनिवार्यता प्रकट करते हैं। गुरु-मुख से प्रकट होने वाला ज्ञान ही अज्ञान के अंधकार को मिटाकर मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।
In Shabad #107, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He glorifies the necessity of the True Master (Satguru), whose enlightened guidance dissolves worldly delusion and leads the aspirant towards liberation.
✦ मुख्य संदेश:

धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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111 Raag Asavari

शब्द 111 — शब्द 111: खरड़ ओढ़ीजै

ओ३म्-खरड़ ओढ़ीजै, तूंबा जीमीजैं, सुरहै दुहीजै, कृत खेत की सींव में लीजैं, पीजै ऊंडा नीरूं। सुर नर देवा बंदी खाने, तित उतरीया तीरूं। भोलम भालम टोलम टालम यूं जाणो त्यूं आणो। म्हे बाचा दइ प्रहलादा सूं सुचेलो गुरू लाजै, कोड़ तेतींसू बाड़ै दीन्हही तिनकी जात पिछाणो।
शबद संख्या 111 में गुरु जम्भेश्वर जी सद्गुरु की अनन्य महिमा और मार्गदर्शन की अनिवार्यता प्रकट करते हैं। गुरु-मुख से प्रकट होने वाला ज्ञान ही अज्ञान के अंधकार को मिटाकर मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।
In Shabad #111, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He glorifies the necessity of the True Master (Satguru), whose enlightened guidance dissolves worldly delusion and leads the aspirant towards liberation.
✦ मुख्य संदेश:

धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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113 Raag Gauri

शब्द 113 — शब्द 113: ईमा मोमण चीमा गोयम

ओ३म्-ईमा मोमण चीमा गोयम, महंमद फुरमानी। उरका फुरका निवाज फरीजां, खासा खबर बिनाणी। इला रास्ती ईमा मोमन, मारफत मुल्लाणी।
शबद संख्या 113 में गुरु जम्भेश्वर जी मानव जीवन की नश्वरता और सत्कर्मों की महत्ता का बोध कराते हैं। वे प्राणी को सचेत करते हैं कि व्यर्थ के अहंकार को त्यागकर सत्य, शील, संतोष और परमार्थ के मार्ग पर चलें।
In Shabad #113, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He reflects upon the transient nature of human existence, urging seekers to transcend ego and cultivate humility, ethical discipline, and righteous living.
✦ मुख्य संदेश:

धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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117 Raag Sarang

शब्द 117 — शब्द 117: टूका पाया मगर मचाया

ओ३म्-टूका पाया मगर मचाया, यूं हंडियाया कुत्ता। जोग जुगत की सार न जाणी, मूंड मुंडाय बिगूता। चेला गुरू अपरचै खीणा, मरते मोक्ष न पायों।
शबद संख्या 117 में गुरु जम्भेश्वर जी सद्गुरु की अनन्य महिमा और मार्गदर्शन की अनिवार्यता प्रकट करते हैं। गुरु-मुख से प्रकट होने वाला ज्ञान ही अज्ञान के अंधकार को मिटाकर मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।
In Shabad #117, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He glorifies the necessity of the True Master (Satguru), whose enlightened guidance dissolves worldly delusion and leads the aspirant towards liberation.
✦ मुख्य संदेश:

धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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119 Raag Kedara

शब्द 119 — शब्द 119: विष्णु विष्णु तू भणरे प्राणी,

ओ३म्-विष्णु विष्णु तू भणरे प्राणी, पैंके लाख उपाजूं। रतन काया बैकूंठे बासो, तेरा जरा मरण भय भाजूं।
शबद संख्या 119 में गुरु जम्भेश्वर जी अविनाशी परमात्मा विष्णु के अनन्य सुमिरन का संदेश देते हैं। वे मानव को सचेत करते हैं कि सांसारिक भ्रम और मोह-माया नश्वर हैं; केवल प्रभु का नाम और सदाचार ही भवसागर पार कराने वाले हैं।
In Shabad #119, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He inspires ceaseless remembrance of the Supreme Lord Vishnu, reminding the soul that worldly entanglements are fleeting and only spiritual truth liberates from worldly suffering.
✦ मुख्य संदेश:

धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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