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✦ श्री गुरु जम्भेश्वर भगवान • प्रामाणिक 120 शब्दवाणी डिजिटल अभिलेखागार (C9.2.1)

शब्दवाणी — 120 Sacred Shabds

सत्य, धर्म, करुणा, जीव-दया एवं पर्यावरण संरक्षण के पावन अमर उपदेश। मूल शब्दवाणी अपरिवर्तनीय सुरक्षित, हिन्दी भावार्थ एवं English translation सहित।

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आज का पावन शबद (Daily Wisdom)

शब्द 71: शब्द 71: धवणा धूजै पाहण पूजै बे फरमाई खुदाई

मूल वाणी:

ओ३म्-धवणा धूजै पाहण पूजै बे फरमाई खुदाई, गुरू के चेले के पाए लागै देखो लोग अन्हयायी। काठी कणजो रूपा रेहण, कापड़ मांह छिपाई। नीचा पड़ पड़ तानैं धोकें, धीरा रे हरि आई। ब्राह्मण नाऊं लादण रूड़ा, बूता नाऊं कूता। वै अपहानै पोह बत...

हिन्दी भावार्थ:

शबद संख्या 71 में गुरु जम्भेश्वर जी जोगियों, सिद्धों और बाह्य भेष धारियों को सच्चा योग समझाते हैं। वे सिखाते हैं कि कान छिदवाना, भभूत मलना या वन-कंदराओं में भटकना योग नहीं है, अपितु मन के विकारों को वश में करना और जीव दय...

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81 Raag Sarang

शब्द 81 — शब्द 81: भल पांखडी पाखंड मंडा

ओ३म्-भल पांखडी पाखंड मंडा, पहला पाप परा छत खंडा। जा पाखंडी कै नादे वेदे शीले शब्दे बाजत पौण, ता पाखंडी नै चीन्हत कौण। जाकी सहजै चूकै आवागौण।
शबद संख्या 81 में गुरु जम्भेश्वर जी मानव जीवन की नश्वरता और सत्कर्मों की महत्ता का बोध कराते हैं। वे प्राणी को सचेत करते हैं कि व्यर्थ के अहंकार को त्यागकर सत्य, शील, संतोष और परमार्थ के मार्ग पर चलें।
In Shabad #81, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He reflects upon the transient nature of human existence, urging seekers to transcend ego and cultivate humility, ethical discipline, and righteous living.
✦ मुख्य संदेश:

धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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82 Raag Kalyan

शब्द 82 — शब्द 82: अलख-अलख तू अलख न लखणा,

ओ३म्-अलख-अलख तू अलख न लखणा, तेरा अनन्त इलोलूं। कौण सी तेरी करणी पूजै, कौण सैं तिहिं रूप संतूलूं।
शबद संख्या 82 में गुरु जम्भेश्वर जी मानव जीवन की नश्वरता और सत्कर्मों की महत्ता का बोध कराते हैं। वे प्राणी को सचेत करते हैं कि व्यर्थ के अहंकार को त्यागकर सत्य, शील, संतोष और परमार्थ के मार्ग पर चलें।
In Shabad #82, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He reflects upon the transient nature of human existence, urging seekers to transcend ego and cultivate humility, ethical discipline, and righteous living.
✦ मुख्य संदेश:

धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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83 Raag Kedara

शब्द 83 — शब्द 83: जो नर घोड़ै चढै पाग न बांधै

ओ३म्-जो नर घोड़ै चढै पाग न बांधै, ताकी करणी कौण बिचारूं। शुचियारा होयसी आय मिलसी, करड़ा दोजग खारूं। जीव तड़े को रिजक न मेटूं, मूवां परहथ सारूं। हाथ न धोवै पग न पखालै, नाहरसिंघ नर काजूं। जुग अनंत अनंत बरत्या, म्हे शून्हय मंडल का राजूं।
शबद संख्या 83 में गुरु जम्भेश्वर जी सृष्टि के मूल तत्वों—जल, वायु, पृथ्वी, वनस्पति और मूक पशु-पक्षियों के संरक्षण का पावन संदेश देते हैं। प्रकृति परमात्मा का ही स्वरूप है, अतः उसकी रक्षा करना प्रत्येक मनुष्य का सर्वोपरि धर्म है।
In Shabad #83, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He emphasizes the sacred sanctity of nature, water, air, trees, and voiceless creatures, teaching that preserving the environment is living worship of the omnipresent Creator.
✦ मुख्य संदेश:

धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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84 Raag Todi

शब्द 84 — शब्द 84: मूंड मुंडायो मन न मुंडायो,

ओ३म्-मूंड मुंडायो मन न मुंडायो, मुंह अबखल दिल लोभी। अन्हदर दया नहीं सुरकाने, निंदरा हड़ै कसोभी। गुरू गति छूटी टोट पड़ैला, उनकी आवा एकपख सातो। वै करणी हूंता खूंधा, असी सहस नव लाख भवैला कुंभी दौरे ऊंधा।
शबद संख्या 84 में गुरु जम्भेश्वर जी सद्गुरु की अनन्य महिमा और मार्गदर्शन की अनिवार्यता प्रकट करते हैं। गुरु-मुख से प्रकट होने वाला ज्ञान ही अज्ञान के अंधकार को मिटाकर मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।
In Shabad #84, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He glorifies the necessity of the True Master (Satguru), whose enlightened guidance dissolves worldly delusion and leads the aspirant towards liberation.
✦ मुख्य संदेश:

धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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85 Raag Ramkali

शब्द 85 — शब्द 85: भोम भली कृषाण भी भला,

ओ३म्-भोम भली कृषाण भी भला, खेवट करो कमाई। गुरू प्रसाद काया गढ़ खोजो, दिल भीतर चोर न जाई। थलिये आय सतगुरू परकाश्यो, जोलै पड़ी लोकाई। एक खिण मे तीन भवन म्हे पोखां, जीवा जूण सवाई। करण समो दातार न हुवो, जिन कंचन बाहू उठाई। सोई कवीसा कवल नवेड़ी, जिण सुरह सुबच्छ दुहाई। मेर समो कोई केर न देख्यो, सायर जिसी तलाई। लंक सरीखो कोट न देख्यो, समंद सरीखी खाई। दशरथ सो कोई पिता न देख्यो, देवलदै सी माई। सीत सरीखी तिरिया न देखी, गरब न करीयों काई। हनमत सो कोई पायक न देख्यो, भीम जैसी सबलाई। रावण सो कोई राव न देख्यो, जिण चोहचक आन फिराई। एक तिरिया कै राहा बेधी, लंका फेर बसाई। संखा मोहरा सेतम सेतूं, ताक्यूं बिलगै काई। ब्राह्मण था ते वेदे भूला, काजी कलम गुमाई। जोग बिहूंणा जोगी भूला, मुंडिया अकल न काई। इहिं कलयुग मैं दोय जन भूला, एक पिता एक माई। बाप जाणै मेरै हलीयो टोरै, कोहर सींचण जाई। माय जाणै मेरै बहूटल आवै, बाजै बिरद बधाई। म्हे शिंभू का फरमाया आया, बैठा तखत रचाई। दोय भुजडंडे परवत तोलां, फेरां आपण राई। एक पलक मैं सर्व संतोषा जीया जूण सवाई। जुगां जुगां को जोगी आयो, बैठो आसन धारी, । हाली पूछै पाली पूछै, यह कलि पूछण हारी । थली फिंरतो खिलेरी पूछै, मेरी गुमाई छाली। बांण चहोड़ पारधियो पूछै, किहिं अवगुण चूकै चोट हमारी। रहोरे मूर्खा मुग्ध गंवारा, करो मजूरी पेट भराई। है है जायो जीव न घाई । मैडी बैठो राजेन्द्र पूछै, स्वामी जी कती एक आयु हमारी। चाकर पूछै ठाकर पूछै और पूछै कीर कहारी। सोक दुहागण तेपण पूछै लेले हाथ सुपारी। बांझ तिरिया बहु तेरी पूछै, किसी परापति म्हारी। त्रेता जुग में हीरा विणज्या, द्वापर गऊ चराई। वृन्दावन मैं बंसी बजाई, कलजुग चारी छाली। नव खेड़ी म्हे आगै खेड़ी, दशवैं कालंके की बारी। उत्तम देश पसारो मांड्यो, रमण बैठो जुवारी। एक खंड बैठा नवखंड जीता को ऐसो लहो जुवारी।
शबद संख्या 85 में गुरु जम्भेश्वर जी धार्मिक पाखंड, बाह्य कर्मकांड और मूक प्राणियों पर होने वाली क्रूरता का कड़ा विरोध करते हैं। वे स्पष्ट उपदेश देते हैं कि परमात्मा के दरबार में दया, सत्य, पवित्र आचरण और ईमानदारी ही सच्ची बंदगी है।
In Shabad #85, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He fearlessly denounces hypocrisy, empty rituals, and cruelty against innocent beings, emphasizing that true divine devotion lies in universal compassion, truthful living, and non-violence.
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धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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86 Raag Bhairav

शब्द 86 — शब्द 86: जुग जागो जुग जाग पिरांणी,

ओ३म्-जुग जागो जुग जाग पिरांणी, कांय जागंता सोवो। भलकै बीर बिगोवो होयसी, दुसमन कांय लकोवो। ले कूंची दरबान बुलाओ, दिल ताला दिल खोवो। जंपो रे जिण जं यो जणीयर, जपसी सो जिण हारी। लह-लह दाव पड़ंता खेलो, सुर तेतींसा सारी। पवन बंधान काया गढ काची, नीर छलै यूं पारी। पारी बिनसै नीर ढुलैलो, ओपिंड काम न कारी। काची काया दृढ कर सींचो, यूं माली सींचै बाड़ी। ले काया बासंदर होमो, यूं ईंधन की भारी। शील स्नाने संजमे चालो, पाणी देह पखाली। गुरू के बचने निंव खिंव चालो, हाथ जपो जपमाली। वस्तु पियारी खरचो यूं नाहीं, किहिं गुण राखो टाली। खरचे लाहो राखे टोटो, बिबरस जोय निहाली। घर आगी इत गोवल बासो, कूड़ी आधो चारी। आज मूवा कल दूसर दिन है, जो सरै तो सारी। पीछै कलीयर कागा रोलो, रहसी कूक पुकारी। ताण थकै यूं हारयो नाहीं, मुरखा अवसर जौले हारी।
शबद संख्या 86 में गुरु जम्भेश्वर जी सृष्टि के मूल तत्वों—जल, वायु, पृथ्वी, वनस्पति और मूक पशु-पक्षियों के संरक्षण का पावन संदेश देते हैं। प्रकृति परमात्मा का ही स्वरूप है, अतः उसकी रक्षा करना प्रत्येक मनुष्य का सर्वोपरि धर्म है।
In Shabad #86, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He emphasizes the sacred sanctity of nature, water, air, trees, and voiceless creatures, teaching that preserving the environment is living worship of the omnipresent Creator.
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धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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87 Raag Asavari

शब्द 87 — शब्द 87: जिंह का उमज्ज्या समाघूं

ओ३म्-जिंह का उमग्या समाघूं, तिहिं पंथ के बिरला लागूं। बीजा चाकर बीरूं, रण शंख धीरूं। कबही झूझत रायूँ, पासै भाजत भायों। तातैं नुगरा झूझ न कीयों।
शबद संख्या 87 में गुरु जम्भेश्वर जी मानव जीवन की नश्वरता और सत्कर्मों की महत्ता का बोध कराते हैं। वे प्राणी को सचेत करते हैं कि व्यर्थ के अहंकार को त्यागकर सत्य, शील, संतोष और परमार्थ के मार्ग पर चलें।
In Shabad #87, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He reflects upon the transient nature of human existence, urging seekers to transcend ego and cultivate humility, ethical discipline, and righteous living.
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धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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88 Raag Sorath

शब्द 88 — शब्द 88: गोरख लो

ओ३म्-गोरख लो, गोपाल लो, लाल गवाल लो, लाल लीलंग देवों। नवखंड पृथिवी प्रगटियो, कोई बिरला जाणत म्हारी आद मूल का भेवों।
शबद संख्या 88 में गुरु जम्भेश्वर जी जोगियों, सिद्धों और बाह्य भेष धारियों को सच्चा योग समझाते हैं। वे सिखाते हैं कि कान छिदवाना, भभूत मलना या वन-कंदराओं में भटकना योग नहीं है, अपितु मन के विकारों को वश में करना और जीव दया पालना ही सच्चा योग है।
In Shabad #88, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He addresses ascetics and mendicants, elucidating that genuine Yoga is not found in external robes or ritual austerities, but in internal purity, self-control, and loving kindness towards all creation.
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धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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89 Raag Gauri

शब्द 89 — शब्द 89: उरधक चन्हदा

ओ३म्-उरधक चन्हदा, निरधक सूरूं, नव लख तारा नेड़ा न दूरूं। नव लख चन्हदा नव लख सूरूं, नव लख धंधू कारूं। तांह परेरै तेपण होता, तिंहका करूं बिचारूं।
शबद संख्या 89 में गुरु जम्भेश्वर जी धार्मिक पाखंड, बाह्य कर्मकांड और मूक प्राणियों पर होने वाली क्रूरता का कड़ा विरोध करते हैं। वे स्पष्ट उपदेश देते हैं कि परमात्मा के दरबार में दया, सत्य, पवित्र आचरण और ईमानदारी ही सच्ची बंदगी है।
In Shabad #89, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He fearlessly denounces hypocrisy, empty rituals, and cruelty against innocent beings, emphasizing that true divine devotion lies in universal compassion, truthful living, and non-violence.
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धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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90 Raag Bilawal

शब्द 90 — शब्द 90: चोईस चेड़ा कालिंग केड़ा

ओ३म्-चोईस चेड़ा कालिंग केड़ा, अधिक कलावंत आयसैं। वै फेर आसन, मुकर होय बैसैंला, नुगरा थान रचायसै। जाणत भूला महा पापी, बहु दुनियां भोलायसै। दिल का कूड़ा कुड़ीयारा, उपंग बात चलाय सै। गुरू गहणा जो लेवै नाहीं, दशबंध घर बोसायसै। आप थापी महापापी, दज्ज्धी परलै जायसै। सतगुरू कै बैडै न चढ़ै, गुरस्वामी नै भाय सै। मंत्र बेलु ऋध सिध कर सैं, दे दे कार चलायसै। काठ का घोड़ा निरजीव ता सरजीव कर सैं, तांनै दाल चरायसैं। अधर आसण मांड बैसैला, मूवा मड़ा हंसाय सैं। जां जां पवन आसण, पाणी आसण, चंद आसण, सूर आसण, गुरू आसण संभराथले। कहै सतगुरू भूल मत जाइयो, पड़ोला अभै दोजखे।
शबद संख्या 90 में गुरु जम्भेश्वर जी सृष्टि के मूल तत्वों—जल, वायु, पृथ्वी, वनस्पति और मूक पशु-पक्षियों के संरक्षण का पावन संदेश देते हैं। प्रकृति परमात्मा का ही स्वरूप है, अतः उसकी रक्षा करना प्रत्येक मनुष्य का सर्वोपरि धर्म है।
In Shabad #90, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He emphasizes the sacred sanctity of nature, water, air, trees, and voiceless creatures, teaching that preserving the environment is living worship of the omnipresent Creator.
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धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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91 Raag Dhanasri

शब्द 91 — शब्द 91: छंदे मंदे बालक बुद्धे

ओ३म्-छंदे मंदे बालक बुद्धे, कूड़े कपटे ऋध न सिद्धे। मेरे गुरू जो दीन्हही शिक्षा, सर्व आलिङ्गण फेरी दीक्षा। जाण अजाण बहिया जब जब, सर्व अलिड़्गण मेटे तब तब। ममता हस्ती बांध्या काल, काल पर काले पसरत डाल। ध्यान न डोले मन न टले, अहनिश ब्रह्म ज्ञान उ चरै। काया पत नगरी मन पत राजा, पंच आत्मा परिवारूं। है कोई आछै मही मंडल शूरा, मनराय सूं झूझ रचायले। अथगा थगायले, अवसा बसायले, अनबे माघ पाल ले। सत-सत भाखत गुरू रायों, जरा मरण भो भागूं।
शबद संख्या 91 में गुरु जम्भेश्वर जी सद्गुरु की अनन्य महिमा और मार्गदर्शन की अनिवार्यता प्रकट करते हैं। गुरु-मुख से प्रकट होने वाला ज्ञान ही अज्ञान के अंधकार को मिटाकर मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।
In Shabad #91, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He glorifies the necessity of the True Master (Satguru), whose enlightened guidance dissolves worldly delusion and leads the aspirant towards liberation.
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धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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92 Raag Maru

शब्द 92 — शब्द 92: काया कोट पवन कुट वाली,

ओ३म्-काया कोट पवन कुट वाली, कुकर्म कुलफ बणायो। माया जाल भरम का सकल, बहु जग रहीया छायों। पढ़ वेद कुरांण कुमाया जालों, दंत कथा जुग छायो। सिध साधक को एक मतो, जिन जीवत मुक्त दृढ़ायो। जुगां जुगां को जोगी आयो, सतगुरू सिद्ध बतायो। सहज स्नानी केवल ज्ञानी, ब्रह्मज्ञानी सुकृत अहल्यो न जाई। यूं यूं भणतां, यूं यूं सुणंता समझ बिना कुछ सिद्धि न पाई।
शबद संख्या 92 में गुरु जम्भेश्वर जी जोगियों, सिद्धों और बाह्य भेष धारियों को सच्चा योग समझाते हैं। वे सिखाते हैं कि कान छिदवाना, भभूत मलना या वन-कंदराओं में भटकना योग नहीं है, अपितु मन के विकारों को वश में करना और जीव दया पालना ही सच्चा योग है।
In Shabad #92, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He addresses ascetics and mendicants, elucidating that genuine Yoga is not found in external robes or ritual austerities, but in internal purity, self-control, and loving kindness towards all creation.
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धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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93 Raag Sarang

शब्द 93 — शब्द 93: आद शब्द अनाहद बांणी

ओ३म्-आद शब्द अनाहद बांणी, चवदै भवण रहया पाणी। जिहिं पाणी से इंड ऊपना, उपन्ना ब्रह्मा इन्हद्र मुरारी।
शबद संख्या 93 में गुरु जम्भेश्वर जी सृष्टि के मूल तत्वों—जल, वायु, पृथ्वी, वनस्पति और मूक पशु-पक्षियों के संरक्षण का पावन संदेश देते हैं। प्रकृति परमात्मा का ही स्वरूप है, अतः उसकी रक्षा करना प्रत्येक मनुष्य का सर्वोपरि धर्म है।
In Shabad #93, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He emphasizes the sacred sanctity of nature, water, air, trees, and voiceless creatures, teaching that preserving the environment is living worship of the omnipresent Creator.
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धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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94 Raag Kalyan

शब्द 94 — शब्द 94: सहस्त्र नाम सांई भल शिंभु,

ओ३म्-सहस्त्र नाम सांई भल शिंभु, म्हे उपना आद मुरारी। जद मैं रहयो निरालंभ हो कर, उतपति धंधू कारी। ना मेरै मायन ना मेरै बापन, मैं अपनी काया आप संवारी। जुग छतीसों शून्हयहि बरत्या सतजुग माहीं सिरजी सारी। ब्रह्मा इन्हद्र सकल जग थरप्या, दीन्हही करामात केती वारी। चन्हद सूर दोय साक्षी थरप्या, पवन पवनेश्वर पवन अधारी। तदम्हे रूप कीयो मैनावतीयो, सत्यव्रत को ज्ञान उचारी। तदम्हे रूप र यो कामठीयो, तेतीसो की कोड़ हंकारी। जब मैं रूप धरयो बाराहि, पृथिवी दाढ़ चढ़ाई सारी। नरसिंह रूप धर हिरण्यकश्यप मारयो, प्रहलादो रहियो शरण हमारी। बावन होय बलिराज चितायो, तीन पैंड कीवीं धरसारी। परशुराम होय क्षत्रियपन साध्यो, गर्भ न छूट्यो नारी। च्ची राम शिर मुकुट बंधायो, सीता के अहंकारी। कन्हड़ होय कर बंसी बजाई गऊ चराई, धरती छेदी, काली ना यो, असुर मार किया क्षयकारी। बुद्ध रूप गयासुर मारयो, काफर मार किया बेगारी। पंथ चलायो राह दिखायो, नौवर विजय हुई हमारी। शेष जंभराय आप अपरंपर, अबल दिन से कहियो। जांभा गोरख गुरू अपारा। काजी मुल्ला पढ़िया पंडित, निंदा करै गवारा। दोजख छोड़ भिस्त जे चाहो, तो कहिया करो हमारा। इन्हद्रपुरी बैकुण्ठे बासो, तो पावो मोक्षहि द्वारा।
शबद संख्या 94 में गुरु जम्भेश्वर जी धार्मिक पाखंड, बाह्य कर्मकांड और मूक प्राणियों पर होने वाली क्रूरता का कड़ा विरोध करते हैं। वे स्पष्ट उपदेश देते हैं कि परमात्मा के दरबार में दया, सत्य, पवित्र आचरण और ईमानदारी ही सच्ची बंदगी है।
In Shabad #94, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He fearlessly denounces hypocrisy, empty rituals, and cruelty against innocent beings, emphasizing that true divine devotion lies in universal compassion, truthful living, and non-violence.
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धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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95 Raag Kedara

शब्द 95 — शब्द 95: बाद बिवाद फिटाकर प्राणी

ओ३म्-बाद बिवाद फिटाकर प्राणी, छाडो मनहट मन का भाणो। कांही कै मन भयो अंधेरो, कांही सूर उगाणो। नुगरा कै मन भयो अंधेरो, सुगरा सूर उगाणो। चरण भी रहिया, लोयण झुरिया, पिंजर पड्यो पुराणो। बेटा बेटी बहन रू भाई, सबसै भयो अभाणो। तेल लियो खल चोपै जोगी, रीता रहीयो घाणो। हंस उडाणो पंथ बिलब्यो, कीयो दूर पयाणो। आगै सुरपति लेखो मांगै, कहि जीवड़ा के करण कमाणो। जीवड़ा नै पाछो सुझण लागो सुकरत नै पछताणो।
शबद संख्या 95 में गुरु जम्भेश्वर जी जोगियों, सिद्धों और बाह्य भेष धारियों को सच्चा योग समझाते हैं। वे सिखाते हैं कि कान छिदवाना, भभूत मलना या वन-कंदराओं में भटकना योग नहीं है, अपितु मन के विकारों को वश में करना और जीव दया पालना ही सच्चा योग है।
In Shabad #95, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He addresses ascetics and mendicants, elucidating that genuine Yoga is not found in external robes or ritual austerities, but in internal purity, self-control, and loving kindness towards all creation.
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धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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96 Raag Todi

शब्द 96 — शब्द 96: सुण गुणवंता

ओ३म्-सुण गुणवंता, सुण बुधवंता, मेरी उत्पत्ति आद लुहारूं। भाठी अंदर लोह तपीलो, तंतक सोना घड़ै कसारूं। मेरी मनसा अहरण, नाद हथोडाे, शशीयर सूर तपीलो। पवन अधारी खालूं। जेथे गुरू का शब्द मानीलो, लंघिबा भव जल पारूं। आसण छोड़ि सुखासण बैठो, जुग-जुग जीवै जंभ लुहारूं।
शबद संख्या 96 में गुरु जम्भेश्वर जी जोगियों, सिद्धों और बाह्य भेष धारियों को सच्चा योग समझाते हैं। वे सिखाते हैं कि कान छिदवाना, भभूत मलना या वन-कंदराओं में भटकना योग नहीं है, अपितु मन के विकारों को वश में करना और जीव दया पालना ही सच्चा योग है।
In Shabad #96, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He addresses ascetics and mendicants, elucidating that genuine Yoga is not found in external robes or ritual austerities, but in internal purity, self-control, and loving kindness towards all creation.
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97 Raag Ramkali

शब्द 97 — शब्द 97: विष्णु विष्णु तूं भण रे प्राणी

ओ३म्-विष्णु विष्णु तूं भण रे प्राणी, जो मन मानै रे भाई। दिनका भूला रात न चेता, कांय पड़ा सूता, आस किसी मन थाई। तेरी कुड़ काची लगवाड़ घणो छै, कुशल किसी मन भाई। हिरदै नाम विष्णु को जंपो, हाथे करो टवाई। हरि पर हर की आण न मानी, भूला भूल जपी महमाई। पाहन प्रीत फिटाकर प्राणी, गुरू बिन मुक्ति न जाई। पंच क्रोड़ी ले प्रहलाद उतरियो, जिन खर तर करी कमाई। सात क्रोड़ी ले राजा हरिचंद उतरियो, तारादे रोहिताश हरिचन्हद हाटोहाट बिकाई। नव क्रोड़ी राव युधिष्ठर ले उतरियो, धन धन कुन्हती माई। बारा क्रोड़ी समाहन आयो, प्रहलादा सूं वाचा कवल जु थाई। किसकी नारी वस्तु पियारी, किसका भाई। भूली दुनिया मर मर जावै, ना चीन्हो सुरराई। पाहण नाऊं लोहा सक्ता, नुगरा चीन्हत काई।
शबद संख्या 97 में गुरु जम्भेश्वर जी अविनाशी परमात्मा विष्णु के अनन्य सुमिरन का संदेश देते हैं। वे मानव को सचेत करते हैं कि सांसारिक भ्रम और मोह-माया नश्वर हैं; केवल प्रभु का नाम और सदाचार ही भवसागर पार कराने वाले हैं।
In Shabad #97, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He inspires ceaseless remembrance of the Supreme Lord Vishnu, reminding the soul that worldly entanglements are fleeting and only spiritual truth liberates from worldly suffering.
✦ मुख्य संदेश:

धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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98 Raag Bhairav

शब्द 98 — शब्द 98: जिहि गुरू कै खिणही ताऊं,

ओ३म्-जिहि गुरू कै खिणही ताऊं, खिणही सीऊ, खिणही पवणा, खिणही पाणी, खिणही मेघ मण्डाणो। कृष्ण करंता बार न होई, थल सिर नीर निवाणो। भूला प्राणी विष्णु जंपो रे, यूं मौत टलै जिरवाणो। भीगा है पण भेद्या नाहीं, पांणी मांहि पखाणो। जीवत मरो रे जीवत मरो, जिन जीवन की बिध जांणी। जे कोई आवै हो हो कर, तो आप जै हुईये पांणी। जाकै बहुती नवणी, बहुती खवणीं बहुती क्रिया समांणी। जांकी तो निज निर्मल काया जोय जोय देखो, ले चढ़ियो अस्मानी। यह मढ देवल मूल न जोयबा, निज कर जपो पिराणी। अनन्त रूप जोवो अभ्यागत, जिहिंका खोज लहो सुर बाणी। सेतम सेतूं, जेरज जेरू, इंडस इंडू, अइयालो उरध जे खैणी।
शबद संख्या 98 में गुरु जम्भेश्वर जी सृष्टि के मूल तत्वों—जल, वायु, पृथ्वी, वनस्पति और मूक पशु-पक्षियों के संरक्षण का पावन संदेश देते हैं। प्रकृति परमात्मा का ही स्वरूप है, अतः उसकी रक्षा करना प्रत्येक मनुष्य का सर्वोपरि धर्म है।
In Shabad #98, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He emphasizes the sacred sanctity of nature, water, air, trees, and voiceless creatures, teaching that preserving the environment is living worship of the omnipresent Creator.
✦ मुख्य संदेश:

धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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99 Raag Asavari

शब्द 99 — शब्द 99: साच सही म्हे कूड़ न कहिबा

ओ३म्-साच सही म्हे कूड़ न कहिबा, नेड़ा था पण दूर न रहीबा। सदा सन्हतोषी सत उपकरणा, म्हे तजीया मान अभिमानू। बस कर पवणा बस कर पाणी, बस कर हाट पटण दरवाजों। दशे दवारे ताला जड़िया, जो ऐसा उसताजों। दशे दवारे ताला कूंची, भीतर पोल बणाई। जो आराध्यो राव युधिष्ठर, सो अराधो रे भाई। जिहिं गुरू कै झुरैन झुरबा, खिरैन खिंरणा, बंक तृबंके, नाल पै नालै। नैंणे नीर न झुरबा, बिन पुल बंध्या बांणो। त या आलिंगण तोड़ी माया, तन लोचन गुण बांणो। हालीलो भल पालीलो सिध पालीलो, खेड़त सूना राणो।
शबद संख्या 99 में गुरु जम्भेश्वर जी सृष्टि के मूल तत्वों—जल, वायु, पृथ्वी, वनस्पति और मूक पशु-पक्षियों के संरक्षण का पावन संदेश देते हैं। प्रकृति परमात्मा का ही स्वरूप है, अतः उसकी रक्षा करना प्रत्येक मनुष्य का सर्वोपरि धर्म है।
In Shabad #99, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He emphasizes the sacred sanctity of nature, water, air, trees, and voiceless creatures, teaching that preserving the environment is living worship of the omnipresent Creator.
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धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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100 Raag Sorath

शब्द 100 — शब्द 100: अर्थूं गर्थूं साहण थाटूं

ओ३म्-अर्थूं गर्थूं साहण थाटूं, कूड़ा दीठो ना ठाटों। कूड़ी माया जाल न भूली रे राजेन्हद्र, अलगी रही ओजूं की बाटों। नवलख दंताला बार करीलो, बार करे कर बंद करीलो। बंद करे कर दान करीलो, दान करे कर मन फूलीलो। तंत मंत बीर बेताल करीलो, खायबा खाज अखाजू। निरह निरंजन नर निरहारी, तऊ न मिलबा झंझा भाग अभागूं।
शबद संख्या 100 में गुरु जम्भेश्वर जी मानव जीवन की नश्वरता और सत्कर्मों की महत्ता का बोध कराते हैं। वे प्राणी को सचेत करते हैं कि व्यर्थ के अहंकार को त्यागकर सत्य, शील, संतोष और परमार्थ के मार्ग पर चलें।
In Shabad #100, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He reflects upon the transient nature of human existence, urging seekers to transcend ego and cultivate humility, ethical discipline, and righteous living.
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धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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