शब्दवाणी — 120 Sacred Shabds
सत्य, धर्म, करुणा, जीव-दया एवं पर्यावरण संरक्षण के पावन अमर उपदेश। मूल शब्दवाणी अपरिवर्तनीय सुरक्षित, हिन्दी भावार्थ एवं English translation सहित।
शब्द 71: शब्द 71: धवणा धूजै पाहण पूजै बे फरमाई खुदाई
ओ३म्-धवणा धूजै पाहण पूजै बे फरमाई खुदाई, गुरू के चेले के पाए लागै देखो लोग अन्हयायी। काठी कणजो रूपा रेहण, कापड़ मांह छिपाई। नीचा पड़ पड़ तानैं धोकें, धीरा रे हरि आई। ब्राह्मण नाऊं लादण रूड़ा, बूता नाऊं कूता। वै अपहानै पोह बत...
शबद संख्या 71 में गुरु जम्भेश्वर जी जोगियों, सिद्धों और बाह्य भेष धारियों को सच्चा योग समझाते हैं। वे सिखाते हैं कि कान छिदवाना, भभूत मलना या वन-कंदराओं में भटकना योग नहीं है, अपितु मन के विकारों को वश में करना और जीव दय...
शबद क्रमांक चयन (Shabd 1 to 120 Navigator)
शब्द 41 — शब्द 41: सुण राजेंद्र, सुण जोगेंद्र
शरीर और संसार नश्वर हैं; उनकी अस्थिरता को पहचानना आध्यात्मिक जागृति का आधार है।
शब्द 42 — शब्द 42: आयसा काहे काजे खेह भकरूड़े
धार्मिक वेश या पहचान से अधिक महत्वपूर्ण गुरु-मार्गदर्शन और वास्तविक आध्यात्मिक आचरण है।
शब्द 43 — शब्द 43: ज्यूं राज गयो राजिंदर झूरे
पाखंड और बाहरी प्रतीकों से योग नहीं होता; वास्तविक योग भीतर की साधना और परिवर्तन है।
शब्द 44 — शब्द 44: खरतर झोली खरतर कंथा
सच्ची साधना बाहरी चिह्नों से नहीं, माया-मोह से ऊपर उठने और जीव-दया से प्रकट होती है।
शब्द 45 — शब्द 45: दोय मन दोय दिल सिंधी न कंथा
मन और हृदय में द्वंद्व नहीं, बल्कि सत्य, एकाग्रता और निष्कपटता होनी चाहिए।
शब्द 46 — शब्द 46: जिहिं जोगी के मनही मुद्रा
सच्चा योग भीतर की अवस्था है—सत्य, गुरु-सेवा और जीव के प्रति उत्तरदायित्व उसका आधार हैं।
शब्द 47 — शब्द 47: काया कंथा मन जो गूंठो
मन को साधना ही वास्तविक साधना है।
शब्द 48 — शब्द 48: लक्ष्मण लक्ष्मण न कर आयसां
नाम और पहचान से अधिक महत्वपूर्ण उनके अनुरूप गुण और आचरण हैं।
शब्द 49 — शब्द 49: अवधू अजरा जार ले, अमरा राख ले
गुरु के मार्गदर्शन से साधक नश्वरता के पार स्थायी सत्य की खोज करता है।
शब्द 50 — शब्द 50: तइया सांसू तइया मासूं
परम सत्य भीतर है; बाहरी धार्मिक पहचान और कर्मकांड से ऊपर उठकर उसे पहचानना ही वास्तविक साधना है।
शब्द 51 — शब्द 51: सस पाताले भुयं अंतर अंतर राखिलौ
माया के बीच दया और आंतरिक सत्य को पहचानना आवश्यक है।
शब्द 52 — शब्द 52: मोह मंडप थाप थाप ले
मोह के विरुद्ध ज्ञान ही वास्तविक शस्त्र है।
शब्द 53 — शब्द 53: गुरु हीरा बिणजै लेहम लेहूं
माया और सांसारिक आकर्षण से ऊपर उठकर गुरु के ज्ञान और योग को अपनाना चाहिए।
शब्द 54 — शब्द 54: अरुण विघाणीं रे रवि भाणै
बाहरी प्रकाश के साथ भीतर के ज्ञान-प्रकाश को पहचानना आवश्यक है।
शब्द 55 — शब्द 55: घटिये कै खोज फिरंता
जिस सत्य की खोज करोगे, उसी दिशा में जीवन की यात्रा आगे बढ़ेगी।
शब्द 56 — शब्द 56: कुपाथ कूं दान जु दीयो
सार्थक दान वही है जो उचित स्थान पर हो और सद्गुणों को जन्म दे।
शब्द 57 — शब्द 57: अति बल दानो सब ज्ञानी
बाहरी कर्मों की विशालता से अधिक महत्वपूर्ण आंतरिक ज्ञान और सही आचरण है।
शब्द 58 — शब्द 58: तउवा माण दुर्योधन माण्या
शक्ति और अहंकार की सीमा है; आध्यात्मिक सत्य उससे कहीं आगे है।
शब्द 59 — शब्द 59: पढ़ कागल वेदूं, शास्त्र शब्दूं (काल चक्र)
समय निरंतर घट रहा है; पाखंड छोड़कर सतगुरु शब्द की शरण में आओ।
शब्द 60 — शब्द 60: हस्ती चढ़ंता गेंवर गुड़ंता
भौतिक ऐश्वर्य यहीं रह जाएगा; केवल प्रभु नाम ही अंतिम साथी है।