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विश्नोई एटलस
विश्नोई एटलस धरोहर की खोज • विरासत का संरक्षण
✦ श्री गुरु जम्भेश्वर भगवान • प्रामाणिक 120 शब्दवाणी डिजिटल अभिलेखागार (C9.2.1)

शब्दवाणी — 120 Sacred Shabds

सत्य, धर्म, करुणा, जीव-दया एवं पर्यावरण संरक्षण के पावन अमर उपदेश। मूल शब्दवाणी अपरिवर्तनीय सुरक्षित, हिन्दी भावार्थ एवं English translation सहित।

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आज का पावन शबद (Daily Wisdom)

शब्द 71: शब्द 71: धवणा धूजै पाहण पूजै बे फरमाई खुदाई

मूल वाणी:

ओ३म्-धवणा धूजै पाहण पूजै बे फरमाई खुदाई, गुरू के चेले के पाए लागै देखो लोग अन्हयायी। काठी कणजो रूपा रेहण, कापड़ मांह छिपाई। नीचा पड़ पड़ तानैं धोकें, धीरा रे हरि आई। ब्राह्मण नाऊं लादण रूड़ा, बूता नाऊं कूता। वै अपहानै पोह बत...

हिन्दी भावार्थ:

शबद संख्या 71 में गुरु जम्भेश्वर जी जोगियों, सिद्धों और बाह्य भेष धारियों को सच्चा योग समझाते हैं। वे सिखाते हैं कि कान छिदवाना, भभूत मलना या वन-कंदराओं में भटकना योग नहीं है, अपितु मन के विकारों को वश में करना और जीव दय...

प्रदर्शित शबद: 1–15 (कुल 15) सारे फ़िल्टर साफ़ करें (Reset)
15 Raag Sorath

शब्द 15 — शब्द 15: सुरमा लेगण झीणां शब्दूं

ओ३म्—सुरमा लेगण झीणां शब्दूं, म्हे भूल न भाख्या थूंलूं। सो पति बिरछा सींच प्राणी, जिहिंका मीठा मूल समूलूं। पाते भूला मूल न खोजे, सींचै कांय कु मूलूं। विष्णु-विष्णु भण अजर जरीजे, यह जीवन का मूलूं। खोज प्राणी ऐसा बिनाणी, केवल ज्ञानी, ज्ञान गहींरूं। जिहिं कै गुणे न लाभत छेहूं, गुरु गेंवर गरवा शीतल नीरूं। मेवा ही अति मेड़ूं। हृदयै मुक्ता कमल संतोषी, टेवा ही अति तेजूं। चढ़ कर बोहितां भव जल पार लंघावे, सो गुरु खेवर खेवा खेहूं।
मनुष्य को जीवन के मूल को खोजना चाहिए। जैसे वृक्ष को केवल पत्तों से नहीं, बल्कि उसकी जड़ों को सींचने से पोषण मिलता है, उसी प्रकार आध्यात्मिक जीवन का मूल भीतर के ज्ञान और साधना में है। सच्चा गुरु उस नाविक के समान है जो संसाररूपी भवसागर को पार कराने में मार्गदर्शन करता है। संतोष, ज्ञान और गुरु की शीतल वाणी साधक के जीवन को दिशा देती है।
A person should seek the root of life. Just as a tree is nourished by watering its roots rather than merely its leaves, spiritual life must be nourished at its inner foundation through knowledge and practice. The true Guru is like a boatman who guides the seeker across the ocean of worldly existence. Contentment, wisdom and the Guru's cooling guidance provide direction to the spiritual seeker.
✦ मुख्य संदेश:

मूल को सींचना ही वास्तविक साधना है; सच्चा गुरु भवसागर पार करने का मार्ग दिखाता है।

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16 Raag Sorath

शब्द 16 — शब्द 16: लोहे हंता कंचन घड़ियां

ओ३म्—लोहे हंता कंचन घड़ियां, घड़ियां ठाम सुड़ाऊं। जातां हंता पात करीलूं, यह कृष्ण चरित परिवारूं। बेड़ी काठ संजोगे मिलिया, खेवर खेवा खेहूं। लोहा नीर किसी विधि तरिया, उत्तम संग सनेहूं। बिन किरिया रथ बैसेंला, ज्यूं काठ संगीन लोहा नीर तरीलूं। नांगड़ भागड़ भूला महियल, जीव हंते मड़ खाईलूं।
यहाँ लोहे और लकड़ी के उदाहरण के माध्यम से संगति और उचित मार्गदर्शन का महत्व बताया गया है। जो वस्तु अपने बल पर नहीं तैर सकती, वह उचित साधन और संगति के कारण पार जा सकती है। इसी प्रकार मनुष्य भी अच्छे मार्ग, सही संगति और गुरु के मार्गदर्शन से जीवन के कठिन भवसागर को पार कर सकता है।
Through the imagery of iron, wood and a boat, this Shabd emphasizes the importance of right association and guidance. Something that cannot float by itself may cross the water when supported by the right vessel. Similarly, a person can cross the difficulties of worldly existence through good company, righteous conduct and the guidance of the Guru.
✦ मुख्य संदेश:

सत्संग, सही साधन और गुरु-मार्गदर्शन मनुष्य को कठिनाइयों से पार ले जा सकते हैं।

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17 Raag Sorath

शब्द 17 — शब्द 17: मोरे सहजै सुंदर, लोतर बाणी

ओ३म्—मोरे सहजै सुंदर, लोतर बाणी, ऐसो भयो मन ज्ञानी। तइया सासू, तइया मासूं, रतूं रूहीयू। खीरूं नीरूं, ज्यूं कर देखूं, ज्ञान अंदेसूं। भूला प्राणी कहै सो करणी। अड़ अगाणी, तत समाणी, अइया लो म्हे पुरुष न लेणा नारी। सो दत सागर सो सुघ्यागत, भवन-भवन भिखियारी। भिखियारी लो भिखियारी लो, जे आदि परम तत लाधो। जाके बाद बिराम विरांसो सांसों, ताने कौन कहसी साहिल्या साधु।
ज्ञान प्राप्त होने पर मनुष्य की दृष्टि सहज और सुंदर हो जाती है। वह बाहरी भेदों के बजाय जीवन के मूल तत्व को पहचानने लगता है। संसार में भटकते हुए मनुष्य को उस परम तत्व की खोज करनी चाहिए। जब वह मूल सत्य को पा लेता है, तब बाहरी पहचान और भटकाव का महत्व कम हो जाता है।
When wisdom arises, the mind becomes simple, clear and refined. The seeker begins to recognize the fundamental reality rather than becoming lost in external distinctions. A person wandering through the world should seek the ultimate truth. Once that fundamental reality is realized, superficial identities and worldly wandering lose their importance.
✦ मुख्य संदेश:

ज्ञान मनुष्य की दृष्टि को बाहरी भेदों से उठाकर मूल सत्य की ओर ले जाता है।

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18 Raag Sorath

शब्द 18 — शब्द 18: जांकुंछ जांकुंछ, जां कछु न जाणी

ओ३म्—जांकुंछ जांकुंछ, जां कछु न जाणी। नांकुंछ नांकुंछ, तां कछु जाणी। नांकुंछ नांकुंछ अकथ कहाणी, नांकुंछ नांकुंछ अमृत बाणी। ज्ञानी सो तो ज्ञानी रोवत, पढ़िया रोवत गाहे। केवल करतब मोरी मोरा रोवत, जोय जोय पगं दिखाही। उरध खेंपी मन उन्मन रोवत, मुरखां रोवत धाहीं। मरणत माथ संसारत खेती, कै कै अवतारी रोवत राही। जड़िया बूंठी जे जग जीवै, तो बेदां क्यूं मर जाही। खोज पीरांगी ऐसा बिनाणी, नुगरा खोजत नाहीं। जां कछु होता, ना कछु होयसी, बल कछु होयसी ताहीं।
यह शब्द उस सत्य की ओर संकेत करता है जिसे साधारण शब्दों में पूरी तरह व्यक्त नहीं किया जा सकता। मनुष्य जितना जानता है, उससे कहीं अधिक अज्ञात उसके सामने है। अज्ञान, मृत्यु, संसार की परिवर्तनशीलता और जीवन की अस्थिरता के बीच साधक को सत्य की खोज करते रहना चाहिए। जो आज दिखाई देता है वह बदलने वाला है; इसलिए मूल और स्थायी सत्य की पहचान आवश्यक है।
This Shabd points toward a reality that cannot be fully expressed through ordinary words. What human beings know is limited compared with what remains unknown. Amid ignorance, mortality, change and the impermanence of worldly existence, the seeker should continue searching for truth. What appears today is subject to change; therefore, recognizing the fundamental and enduring reality is essential.
✦ मुख्य संदेश:

संसार परिवर्तनशील और ज्ञान सीमित है; इसलिए साधक को अकथ और मूल सत्य की खोज करनी चाहिए।

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45 Raag Sorath

शब्द 45 — शब्द 45: दोय मन दोय दिल सिंधी न कंथा

ओ३म्—दोय मन दोय दिल सिंधी न कंथा, दोय मन दोय दिल पुली न पंथां। दोय मन दोय दिल कही न कथा, दोय मन दोय दिल सुनीं न कथा। दोय मन दोय दिल पंथ दुहेला, दोय मन दोय दिल गुरु न चेला। दोय मन दोय दिल बंधी न बेला, दोय मन दोय दिल रब दुहेला। दोय मन दोय दिल सूई न धागा, दोय मन दोय दिल दुल बिछड़े न भागा। दोय मन दोय दिल भेद न भेड़ा, दोय मन दोय दिल टेव न टेड़ा। दोय मन दोय दिल केल न केला, दोय मन दोय दिल सुरग न मेला।
दोहरे मन और दोहरे हृदय वाला व्यक्ति स्थिर आध्यात्मिक मार्ग पर नहीं चल सकता। मन में द्वंद्व, कपट और अस्थिरता हो तो गुरु-मार्ग में भी दृढ़ता नहीं रहती। आंतरिक एकाग्रता, सत्यनिष्ठा और स्पष्ट मन आध्यात्मिक जीवन के लिए आवश्यक हैं।
A person with a divided mind and divided heart cannot remain firmly established on the spiritual path. When the mind is filled with conflict, duplicity and instability, steadfastness in the Guru's path is lost. Inner unity, sincerity and clarity are essential for spiritual life.
✦ मुख्य संदेश:

मन और हृदय में द्वंद्व नहीं, बल्कि सत्य, एकाग्रता और निष्कपटता होनी चाहिए।

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46 Raag Sorath

शब्द 46 — शब्द 46: जिहिं जोगी के मनही मुद्रा

ओ३म्—जिहिं जोगी के मनही मुद्रा, तनही कंथा पिंडै अगन थंभायो। जिहिं जोगी की सेवा कीजै, तूठो भवजल पार लंघावे। नाथ कहावे मर मर जावे, से क्यूं नाथ कहावे। नांही मोटी जीवा जूंणी, निरजत सिरजत फिर फिर पूछ्या आवै। हमहीं रावल हमहीं जोगी, हम राजा के रायों। जो ज्यूं आवै सो त्यूं थरपां, साचां सूं सत भायो। पाप न छिपां पुण्य न हारां, करां न करतब लावां बारूं। जीव तड़ै को रिजक न मेटूं, मूवा परहथ सारूं। दोरै भिस्त विचालै ऊभा, मिलिया काम सवारूं।
सच्चे योगी के लिए योग बाहरी मुद्रा या वस्त्र नहीं, बल्कि उसकी आंतरिक अवस्था है। गुरु की सेवा और सही साधना मनुष्य को संसाररूपी भवसागर से पार जाने की दिशा देती है। सत्य का आचरण ऐसा होना चाहिए जिसमें पाप को छिपाने का प्रयास न हो, पुण्य का अहंकार न हो और जीव के जीवन-निर्वाह को नष्ट न किया जाए।
For the true Yogi, Yoga is not merely an external posture or garment but an inner state. Service to the Guru and sincere spiritual practice provide the direction for crossing the ocean of worldly existence. Righteous conduct means neither concealing wrongdoing nor taking pride in virtue, while respecting the sustenance and life of living beings.
✦ मुख्य संदेश:

सच्चा योग भीतर की अवस्था है—सत्य, गुरु-सेवा और जीव के प्रति उत्तरदायित्व उसका आधार हैं।

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47 Raag Sorath

शब्द 47 — शब्द 47: काया कंथा मन जो गूंठो

ओ३म्—काया कंथा मन जो गूंठो, सींगी सांस उसासूं। मन मृग राखलै कर कृषाणी, यूं म्हे भया उदासूं। हमहीं जोगी हमहीं जती, हमहीं सती हमहीं राख बा चींतूं। पंच पटण नव थानक साध ले, आद नाथ के भक्तूं।
साधक को अपने शरीर और मन दोनों पर संयम रखना चाहिए। मन को मृग की तरह चंचल मानकर उसे साधना के द्वारा नियंत्रित करने की बात कही गई है। साधना का लक्ष्य केवल बाहरी योगी बनना नहीं, बल्कि भीतर से संयमित, जागरूक और साधित होना है।
The seeker should cultivate discipline over both body and mind. The mind is compared to a restless deer and must be brought under control through spiritual practice. The purpose of practice is not merely to appear as a Yogi externally, but to become disciplined, aware and spiritually established within.
✦ मुख्य संदेश:

मन को साधना ही वास्तविक साधना है।

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48 Raag Sorath

शब्द 48 — शब्द 48: लक्ष्मण लक्ष्मण न कर आयसां

ओ३म्—लक्ष्मण लक्ष्मण न कर आयसां, म्हारे साधां पड़े विरासूं। लक्ष्मण सो जिन लंका लीवी रावण मारयो, ऐसो किया संग्रामूं। लक्ष्मण तीन भुवन को राजा, तेरे एक न गांवूं। लक्ष्मण कै तो लाख चौरासी जीया जूणी, तेरे एक न जीऊं। लक्ष्मण तो गुणवंती जोगी, तेरे बाद विरासूं। लक्ष्मण का तो लक्षण नाहीं, शीश किसी बिध नाऊं।
यह शब्द लक्ष्मण के नाम और उनके चरित्र से जुड़े रूपक के माध्यम से बाहरी पहचान और वास्तविक गुण के बीच अंतर की ओर संकेत करता है। किसी महान नाम या पहचान को धारण कर लेना पर्याप्त नहीं; उसके अनुरूप गुण, आचरण और साधना भी आवश्यक हैं।
Using Lakshman and his heroic character as imagery, this Shabd points toward the distinction between an external name or identity and the qualities that give that identity meaning. Simply carrying a revered name or identity is not enough; one's qualities, conduct and spiritual discipline must correspond to it.
✦ मुख्य संदेश:

नाम और पहचान से अधिक महत्वपूर्ण उनके अनुरूप गुण और आचरण हैं।

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49 Raag Sorath

शब्द 49 — शब्द 49: अवधू अजरा जार ले, अमरा राख ले

ओ३म्—अवधू अजरा जार ले, अमरा राख ले। राख ले विष्णु की धारणा, पाताल का पाणी आकाश कूं चढ़ायले। भेटलै गुरु का दरशणा।
साधक को नश्वरता से ऊपर उठकर उस आध्यात्मिक सत्य को धारण करने का प्रयास करना चाहिए जो भीतर स्थायी है। गुरु के दर्शन और मार्गदर्शन से साधक को उस आंतरिक आध्यात्मिक अनुभव की दिशा मिलती है।
The seeker should strive to rise beyond impermanence and hold firmly to the enduring spiritual truth within. Through the Guru's presence and guidance, the seeker is directed toward this inner spiritual realization.
✦ मुख्य संदेश:

गुरु के मार्गदर्शन से साधक नश्वरता के पार स्थायी सत्य की खोज करता है।

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50 Raag Sorath

शब्द 50 — शब्द 50: तइया सांसू तइया मासूं

ओ३म्—तइया सांसू तइया मासूं, तइया देह दमाई। उत्तम मध्यम क्यूं जाणीजी?, बिबरस देखो लोई। जाके बाद विराम विरांसो सांसो सरसा भोला चालै, ताकै भीतर छोट लकोई। जाके बाद विराम विरांसो सांसो सरसा भोला भागो, ताकै मूले छोट न होई। दिल दिल आप खुदायबंद जायो, सब दिल जायो सोई। जो जिंदो हज काबे जायो, थल सिर जायो सोई। नाम विष्णु के मुसकल खातै, ते काफर सैतानी। हिंदू होय कर तीरथ न्हावै, पिंड भरावै, तेपण रहया इवाणी। जोगी होय कर मूंड मुंडावै, कान चिरावै, गोरख हटड़ी धोके, तेपण रहया इवाणी। तुरकी होय हज काबो धोके, भूला मुसलमाणी। के के पुरुष अवर जागेला, थल जाग्यो निज बाणी। जिहिं कै नादे वेदे शीले शब्दे, लक्ष्मण अंत न पारूं। अंजन मांहि निरंजन आछै, सो गुरु लक्ष्मण कंवारूं।
मनुष्य चाहे हिंदू हो, मुसलमान हो, योगी हो या किसी अन्य धार्मिक पहचान से जुड़ा हो—केवल तीर्थ-स्नान, हज, पिंडदान, सिर मुंडाना, कान छिदवाना या अन्य बाहरी धार्मिक कर्म ही अंतिम सत्य की प्राप्ति नहीं कराते। परम सत्य प्रत्येक हृदय में विद्यमान है। इसलिए बाहरी धार्मिक पहचान से आगे बढ़कर उस सत्य को अपने भीतर पहचानना आवश्यक है। गुरु इस आंतरिक सत्य की पहचान कराने वाला मार्गदर्शक है।
Whether a person is Hindu, Muslim, Yogi or follows another religious identity, external acts such as pilgrimage, ritual bathing, Hajj, funeral offerings, shaving the head or piercing the ears do not by themselves lead to ultimate realization. The Divine Reality is present within every heart. Therefore, one must move beyond external religious identity and recognize that truth within. The Guru guides the seeker toward this inner realization.
✦ मुख्य संदेश:

परम सत्य भीतर है; बाहरी धार्मिक पहचान और कर्मकांड से ऊपर उठकर उसे पहचानना ही वास्तविक साधना है।

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64 Raag Sorath

शब्द 64 — शब्द 64: मैं कर भूला मांड पिराणी,

ओ३म्-मैं कर भूला मांड पिराणी, काचै कन्ध अगाजूं। काचा कंध गले गल जायसैं, बीखर जैला राजों। गड़ बड़ गाजा कांय बिबाजा, कण बिण कूकस कांय लेणा। कांय बोलो मुख ताजों, भरमी बादी अति अहंकारी। लावत यारी, पशुवां पड़ै भिरांति। जीव बिणासै लाहै कारणै, लोभ सवारथ खायबा खाज अखाजो। जो अति काले ले जम काले तेपण खीणा, जिहिं का लंका गढ़ था राजों। बिन हस्ति पाखर बिन गज गुड़ियों, बिन ढोंला डूमां लाकड़ियो। जाकै परसण बाजा बाजै, सो अपरंपर कांय न जंपो, हिन्हदू मुसलमानों। डर डर जीव कै काजै, रावा रंका राजा रांवां, रावत राजा, खाना खोजां, मीरां मुलका, घंघ फकीरां, घंघा गुरवां, सुरनर देवां, तिमर जू लंगा, आयसां जोयसा, साह पुरोहितां, मिश्रही ब्यासा रूंखां बिरखां, आव घंटती। अतरा माहे कूंण विशेषो, मरणत एको माघों। पशु मुकेरू लहैन फेरूं, कहे ज मेरूं सब जग केरूं, साचै सै हर करै घणेरूं। रिण छाणै यूं बीखर जैला, तातैं मेरूं न तेरूं। विसर गया ते माघूं, रक्तूं नातूं सेतूं धातूं कुमलावै यूं शागू। जीवर पिंड बिछोवा होयसी, ता दिन दाम दुगाणी। आडन पैंको रती बिसोवो सीझै नाही, ओपिंड काम न काजूं। आवत काया ले आयो थो, जातैं सूको जागो। आवत खिण एक लाई थी पर जातैं खिणी न लागो। भाग परापति कर्मा रेखां, दरगै जबला जबला माघौं। बिरखे पान झड़े झड़ जायला, तेपण तेई न लांगू। सेतू दगधूं कवलज कलीयों, कुमलावै यूं शागूं। ऋतुबशंती आई और भलेरा शागूं। भूला तेण गयारे प्राणी, तिहि का खोज न माघूं। विष्णु विष्णु भण लेई न साई, सुर नर ब्रह्मा को न गाई। तातैं जंवर बिन डसीरे भाई, बास बसंतै किवी न कमाई। जंवर तणा जमदूत दहैला, तातैं तेरी कहा न बसाई।
शबद संख्या 64 में गुरु जम्भेश्वर जी सृष्टि के मूल तत्वों—जल, वायु, पृथ्वी, वनस्पति और मूक पशु-पक्षियों के संरक्षण का पावन संदेश देते हैं। प्रकृति परमात्मा का ही स्वरूप है, अतः उसकी रक्षा करना प्रत्येक मनुष्य का सर्वोपरि धर्म है।
In Shabad #64, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He emphasizes the sacred sanctity of nature, water, air, trees, and voiceless creatures, teaching that preserving the environment is living worship of the omnipresent Creator.
✦ मुख्य संदेश:

धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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76 Raag Sorath

शब्द 76 — शब्द 76: तन मन धोइये संजम हुइये,

ओ३म्-तन मन धोइये संजम हुइये, हरष न खोइये। यूं यूं दुनिया करै खुवारी, त्यूं त्यूं किरिया पूरी। मुग्धां सेती यूं टल चालो, यूं खड़कै पास धनुरी।
शबद संख्या 76 में गुरु जम्भेश्वर जी मानव जीवन की नश्वरता और सत्कर्मों की महत्ता का बोध कराते हैं। वे प्राणी को सचेत करते हैं कि व्यर्थ के अहंकार को त्यागकर सत्य, शील, संतोष और परमार्थ के मार्ग पर चलें।
In Shabad #76, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He reflects upon the transient nature of human existence, urging seekers to transcend ego and cultivate humility, ethical discipline, and righteous living.
✦ मुख्य संदेश:

धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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88 Raag Sorath

शब्द 88 — शब्द 88: गोरख लो

ओ३म्-गोरख लो, गोपाल लो, लाल गवाल लो, लाल लीलंग देवों। नवखंड पृथिवी प्रगटियो, कोई बिरला जाणत म्हारी आद मूल का भेवों।
शबद संख्या 88 में गुरु जम्भेश्वर जी जोगियों, सिद्धों और बाह्य भेष धारियों को सच्चा योग समझाते हैं। वे सिखाते हैं कि कान छिदवाना, भभूत मलना या वन-कंदराओं में भटकना योग नहीं है, अपितु मन के विकारों को वश में करना और जीव दया पालना ही सच्चा योग है।
In Shabad #88, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He addresses ascetics and mendicants, elucidating that genuine Yoga is not found in external robes or ritual austerities, but in internal purity, self-control, and loving kindness towards all creation.
✦ मुख्य संदेश:

धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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100 Raag Sorath

शब्द 100 — शब्द 100: अर्थूं गर्थूं साहण थाटूं

ओ३म्-अर्थूं गर्थूं साहण थाटूं, कूड़ा दीठो ना ठाटों। कूड़ी माया जाल न भूली रे राजेन्हद्र, अलगी रही ओजूं की बाटों। नवलख दंताला बार करीलो, बार करे कर बंद करीलो। बंद करे कर दान करीलो, दान करे कर मन फूलीलो। तंत मंत बीर बेताल करीलो, खायबा खाज अखाजू। निरह निरंजन नर निरहारी, तऊ न मिलबा झंझा भाग अभागूं।
शबद संख्या 100 में गुरु जम्भेश्वर जी मानव जीवन की नश्वरता और सत्कर्मों की महत्ता का बोध कराते हैं। वे प्राणी को सचेत करते हैं कि व्यर्थ के अहंकार को त्यागकर सत्य, शील, संतोष और परमार्थ के मार्ग पर चलें।
In Shabad #100, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He reflects upon the transient nature of human existence, urging seekers to transcend ego and cultivate humility, ethical discipline, and righteous living.
✦ मुख्य संदेश:

धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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112 Raag Sorath

शब्द 112 — शब्द 112: जांके पंथ का भांजणा

ओ३म्-जांके पंथ का भांजणा, गुरू का नींदणा। स्वामी का दुस्मणा, कुफर ते काफरा। कुमली कुपातूं, कुचिला कुधातू। हड़ हड़ा, भड़ हड़ा, दाणबे दूतबा, दाणबे भूतबा, राकसा बोकसा, जांका जन्हम नहीं पर कर्म चंडालूं। और कूं जिभै कर आप कूं पोखणा, जिहिंकी रूवाली दीजसीं, दौरे घुप अंधारौं। तान बे तानबा, छान बे छानबा, तोड़ बे तोड़बा, कूक बे पुकारबा, जांकी कोई न करबा सारूं।
शबद संख्या 112 में गुरु जम्भेश्वर जी सद्गुरु की अनन्य महिमा और मार्गदर्शन की अनिवार्यता प्रकट करते हैं। गुरु-मुख से प्रकट होने वाला ज्ञान ही अज्ञान के अंधकार को मिटाकर मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।
In Shabad #112, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He glorifies the necessity of the True Master (Satguru), whose enlightened guidance dissolves worldly delusion and leads the aspirant towards liberation.
✦ मुख्य संदेश:

धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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