ओ३म्-भोम भली कृषाण भी भला, खेवट करो कमाई।
गुरू प्रसाद काया गढ़ खोजो, दिल भीतर चोर न जाई।
थलिये आय सतगुरू परकाश्यो, जोलै पड़ी लोकाई।
एक खिण मे तीन भवन म्हे पोखां, जीवा जूण सवाई।
करण समो दातार न हुवो, जिन कंचन बाहू उठाई।
सोई कवीसा कवल नवेड़ी, जिण सुरह सुबच्छ दुहाई। मेर समो कोई केर न देख्यो, सायर जिसी तलाई।
लंक सरीखो कोट न देख्यो, समंद सरीखी खाई।
दशरथ सो कोई पिता न देख्यो, देवलदै सी माई।
सीत सरीखी तिरिया न देखी, गरब न करीयों काई।
हनमत सो कोई पायक न देख्यो, भीम जैसी सबलाई।
रावण सो कोई राव न देख्यो, जिण चोहचक आन फिराई।
एक तिरिया कै राहा बेधी, लंका फेर बसाई।
संखा मोहरा सेतम सेतूं, ताक्यूं बिलगै काई।
ब्राह्मण था ते वेदे भूला, काजी कलम गुमाई।
जोग बिहूंणा जोगी भूला, मुंडिया अकल न काई।
इहिं कलयुग मैं दोय जन भूला, एक पिता एक माई।
बाप जाणै मेरै हलीयो टोरै, कोहर सींचण जाई।
माय जाणै मेरै बहूटल आवै, बाजै बिरद बधाई।
म्हे शिंभू का फरमाया आया, बैठा तखत रचाई।
दोय भुजडंडे परवत तोलां, फेरां आपण राई।
एक पलक मैं सर्व संतोषा जीया जूण सवाई।
जुगां जुगां को जोगी आयो, बैठो आसन धारी, ।
हाली पूछै पाली पूछै, यह कलि पूछण हारी ।
थली फिंरतो खिलेरी पूछै, मेरी गुमाई छाली।
बांण चहोड़ पारधियो पूछै, किहिं अवगुण चूकै चोट हमारी।
रहोरे मूर्खा मुग्ध गंवारा, करो मजूरी पेट भराई।
है है जायो जीव न घाई ।
मैडी बैठो राजेन्द्र पूछै, स्वामी जी कती एक आयु हमारी।
चाकर पूछै ठाकर पूछै और पूछै कीर कहारी।
सोक दुहागण तेपण पूछै लेले हाथ सुपारी।
बांझ तिरिया बहु तेरी पूछै, किसी परापति म्हारी।
त्रेता जुग में हीरा विणज्या, द्वापर गऊ चराई।
वृन्दावन मैं बंसी बजाई, कलजुग चारी छाली।
नव खेड़ी म्हे आगै खेड़ी, दशवैं कालंके की बारी।
उत्तम देश पसारो मांड्यो, रमण बैठो जुवारी।
एक खंड बैठा नवखंड जीता को ऐसो लहो जुवारी।
शबद संख्या 85 में गुरु जम्भेश्वर जी धार्मिक पाखंड, बाह्य कर्मकांड और मूक प्राणियों पर होने वाली क्रूरता का कड़ा विरोध करते हैं। वे स्पष्ट उपदेश देते हैं कि परमात्मा के दरबार में दया, सत्य, पवित्र आचरण और ईमानदारी ही सच्ची बंदगी है।
In Shabad #85, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He fearlessly denounces hypocrisy, empty rituals, and cruelty against innocent beings, emphasizing that true divine devotion lies in universal compassion, truthful living, and non-violence.
✦ मुख्य संदेश:
धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।