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विश्नोई एटलस
विश्नोई एटलस धरोहर की खोज • विरासत का संरक्षण
✦ श्री गुरु जम्भेश्वर भगवान • प्रामाणिक 120 शब्दवाणी डिजिटल अभिलेखागार (C9.2.1)

शब्दवाणी — 120 Sacred Shabds

सत्य, धर्म, करुणा, जीव-दया एवं पर्यावरण संरक्षण के पावन अमर उपदेश। मूल शब्दवाणी अपरिवर्तनीय सुरक्षित, हिन्दी भावार्थ एवं English translation सहित।

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आज का पावन शबद (Daily Wisdom)

शब्द 71: शब्द 71: धवणा धूजै पाहण पूजै बे फरमाई खुदाई

मूल वाणी:

ओ३म्-धवणा धूजै पाहण पूजै बे फरमाई खुदाई, गुरू के चेले के पाए लागै देखो लोग अन्हयायी। काठी कणजो रूपा रेहण, कापड़ मांह छिपाई। नीचा पड़ पड़ तानैं धोकें, धीरा रे हरि आई। ब्राह्मण नाऊं लादण रूड़ा, बूता नाऊं कूता। वै अपहानै पोह बत...

हिन्दी भावार्थ:

शबद संख्या 71 में गुरु जम्भेश्वर जी जोगियों, सिद्धों और बाह्य भेष धारियों को सच्चा योग समझाते हैं। वे सिखाते हैं कि कान छिदवाना, भभूत मलना या वन-कंदराओं में भटकना योग नहीं है, अपितु मन के विकारों को वश में करना और जीव दय...

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22 Raag Dhanasari

शब्द 22 — शब्द 22: लो लो रे राजिंदर रायों

ओ३म्—लो लो रे राजिंदर रायों, बाजै बाव सुवायों, आभै अमी झुरायों। कालर करसण कीयां, नेपे कछु न कायों। अइया उत्तम खेती, को को इमृत रायों। को को दाख दिखायों, को को ईख उपायों। को को नींब निबोली, को को ढाक ढकोली। को को तूषण तूंषण बेलीं, को को आक अकायों, को को कछु कमायों। ताकां मूल कुमूलूं, डाल कुडालूं, ताकां पात कुपातूं, ताकां फल बीज कुबीजूं, तो नीर दोष किसायों। क्यों क्यों भूपभागे ऊंगा, क्यों क्यों कर्म विहूंगा। को को चिड़ी चमड़ी, को को उल्लू आयों। ताकै ज्ञान न जोती, मोक्ष न मुक्ति। याके कर्म इसायों, तो नीरे दोष किसायों।
यहाँ खेती और पेड़-पौधों के उदाहरण द्वारा कर्म और उसके परिणाम का संबंध समझाया गया है। जिस प्रकार अलग-अलग बीज, जड़, शाखा, पत्ते और फल अपनी प्रकृति के अनुसार परिणाम देते हैं, उसी प्रकार मनुष्य के कर्म भी परिणाम उत्पन्न करते हैं। यदि कर्म ही गलत हैं तो केवल बाहरी परिस्थितियों को दोष देना उचित नहीं है। ज्ञान के अभाव में मनुष्य अपने कर्मों के परिणाम को समझ नहीं पाता।
Using the imagery of agriculture and plants, this Shabd reflects upon the relationship between actions and their consequences. Just as different roots, branches, leaves, seeds and fruits produce results according to their nature, human actions also produce corresponding consequences. When one's actions are wrong, merely blaming external circumstances is not sufficient. Without wisdom, a person may fail to understand the consequences of their own actions.
✦ मुख्य संदेश:

जैसा कर्म और जैसा बीज, वैसा ही उसका परिणाम।

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23 Raag Dhanasari

शब्द 23 — शब्द 23: साहिल्या हुआ मरण भय भागा

ओ३म्—साहिल्या हुआ मरण भय भागा, गाफिल मरणो धणा डरे। सतगुरु मिलियो सत पंथ बतायो, भ्रांत चुकाई, मरणे बहु उपकार करे। रतन काया सोभंति लाभै, पार गिराये जीव तिरै। पार गिराये सनेही करणी, जंपो विष्णु न दोष दिल करणी। जंपो विष्णु न निंदा करणी, मांडो कांध विष्णु कै सरणी। अंतरा बोल करो जे साचा, तो पार गिराय गुरु की वाचा। रवणां ठवणां चवरा भवनां, तांहि परे रे रतन काया छैं, लाभै किसे विचारे। जे नविये नवणीं, खविये खवणी, जरिये जरनी, करिये करणीं, तो सीख हुआ घर जाइये। रतन काया सांचे की ढाली, गुरु प्रसादे केवल ज्ञाने, धर्म आचारे, शीले संजमे, सतगुरु तूठे पाइये।
सच्चे गुरु की प्राप्ति मनुष्य को सही मार्ग दिखाती है और मृत्यु के भय तथा भ्रम को दूर करती है। मानव शरीर अत्यंत मूल्यवान है; इसका उपयोग सत्य, धर्म और आत्मज्ञान की प्राप्ति के लिए होना चाहिए। गुरु की वाणी को सत्य रूप में स्वीकार करके धर्माचरण, शील, संयम और ज्ञान का जीवन अपनाना चाहिए। यही मानव जीवन की वास्तविक सार्थकता है।
Finding the true Guru provides the seeker with the right path and helps overcome fear of death and confusion. Human life is precious and should be used for the pursuit of truth, Dharma and spiritual wisdom. By following the Guru's truthful guidance and cultivating righteous conduct, discipline, character and knowledge, one can make meaningful use of human life.
✦ मुख्य संदेश:

सतगुरु सही मार्ग दिखाकर भ्रम दूर करता है; मानव जीवन को धर्म, ज्ञान, शील और संयम में लगाना चाहिए।

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24 Raag Dhanasari

शब्द 24 — शब्द 24: आसण बैसण कूड़ कपटण

ओ३म्—आसण बैसण कूड़ कपटण, कोई कोई चीन्हत वोजू बाटे। वोजू बाटे जे नर भया, काचीं काया छोड़ कैलाशे गया।
मनुष्य अनेक प्रकार के आसन, बैठने की विधि और बाहरी साधना कर सकता है, लेकिन यदि उसके भीतर कपट और असत्य है तो केवल बाहरी साधना पर्याप्त नहीं। जो वास्तविक मार्ग को पहचानता है, वह नश्वर शरीर से परे आत्मिक सत्य की ओर बढ़ता है।
A person may practice various postures, disciplines and outward forms of spiritual practice, but if deceit remains within, external practice alone is insufficient. One who recognizes the true path moves beyond attachment to the perishable body toward spiritual truth.
✦ मुख्य संदेश:

बाहरी साधना से अधिक आवश्यक आंतरिक सत्य और निष्कपटता है।

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