Skip to main content
विश्नोई एटलस
विश्नोई एटलस धरोहर की खोज • विरासत का संरक्षण
✦ श्री गुरु जम्भेश्वर भगवान • प्रामाणिक 120 शब्दवाणी डिजिटल अभिलेखागार (C9.2.1)

शब्दवाणी — 120 Sacred Shabds

सत्य, धर्म, करुणा, जीव-दया एवं पर्यावरण संरक्षण के पावन अमर उपदेश। मूल शब्दवाणी अपरिवर्तनीय सुरक्षित, हिन्दी भावार्थ एवं English translation सहित।

☀
आज का पावन शबद (Daily Wisdom)

शब्द 71: शब्द 71: धवणा धूजै पाहण पूजै बे फरमाई खुदाई

मूल वाणी:

ओ३म्-धवणा धूजै पाहण पूजै बे फरमाई खुदाई, गुरू के चेले के पाए लागै देखो लोग अन्हयायी। काठी कणजो रूपा रेहण, कापड़ मांह छिपाई। नीचा पड़ पड़ तानैं धोकें, धीरा रे हरि आई। ब्राह्मण नाऊं लादण रूड़ा, बूता नाऊं कूता। वै अपहानै पोह बत...

हिन्दी भावार्थ:

शबद संख्या 71 में गुरु जम्भेश्वर जी जोगियों, सिद्धों और बाह्य भेष धारियों को सच्चा योग समझाते हैं। वे सिखाते हैं कि कान छिदवाना, भभूत मलना या वन-कंदराओं में भटकना योग नहीं है, अपितु मन के विकारों को वश में करना और जीव दय...

प्रदर्शित शबद: 1–20 (कुल 20) सारे फ़िल्टर साफ़ करें (Reset)
01 Raag Bhairav

शब्द 1 — शब्द 1: गुरू चीन्हों गुरू चीन्ह पुरोहित

ओ३म्—गुरू चीन्हों गुरू चीन्ह पुरोहित, गुरू मुख धर्म बखाणी। जो गुरू होयबा सहजे शीले शब्दे नादे वेदे तिहिं गुरू का आंलिकार पिछाणी। छव दरशण जिहिं कै रूपण, थापण, संसार बरतण, निज कर थरप्या, सो गुरू प्रत्यक्ष जाणी। जिहिं कै खर तर गोठ निरोत्तर वाचा, रहिया रूद्र समाधी। गुरू आप संतोखी, अवरां पोषी, तत महारस बाणी। के के अलिया बासण, होत हुताशण, तामैं क्षीर दुहीजूं। रसूवन गोरस, घीय न लीजूं, तहां दूध न पाणी। गुरू ध्याइये रे ज्ञानी, तोड़त मोहा, अति खुरसाणी छीजत लोहा। पाणी छल तेरी खाल पखाला, सतगुरू तोड़े मन का साला। सतगुरू है तो सहज पिछाणी, कृष्ण चरित बिन काचे करवै रहयो न रहसी पाणी।
सच्चे गुरु को पहचानना चाहिए। गुरु वह है जिसके माध्यम से धर्म का वास्तविक ज्ञान प्रकट होता है। सच्चा गुरु सहजता, शील, शब्द, नाद और ज्ञान से पहचाना जाता है। वह संसार के वास्तविक स्वरूप को समझता है और आत्मज्ञान में स्थित रहता है। गुरु संतोषी होता है और दूसरों का पोषण करता है। गुरु की वाणी गहरे आध्यात्मिक ज्ञान से युक्त होती है। ज्ञानी व्यक्ति को गुरु का ध्यान करना चाहिए, क्योंकि सच्चे गुरु का ज्ञान मोह को तोड़ता है और मन के अज्ञान को दूर करता है।
Recognize the true Guru—the Guru who reveals the path of Dharma. A true Guru is recognized through simplicity, discipline, sacred knowledge, inner sound and wisdom. Such a Guru understands the nature of existence and remains established in spiritual realization. The Guru is content and nourishes others through profound wisdom. A seeker should contemplate upon the true Guru, because true spiritual guidance breaks attachment and removes the impurities of the mind.
✦ मुख्य संदेश:

सच्चे गुरु की पहचान बाहरी आडंबर से नहीं, बल्कि ज्ञान, शील, सहजता और धर्म से होती है।

प्रमाणित शबद पढ़ें
02 Raag Bhairav

शब्द 2 — शब्द 2: मोरे छाया न माया

ओ३म्—मोरे छाया न माया, लोहू न मांसू, रतूँ न धातूँ। मोरे माई न बापूं, आपण आपू, रोही न रापूं, कोपूं न कलापूं, दुःख न सरापूं। लोई अलोई, व्यूंह तुलोई, ऐसा न कोई जपां भी सोई, जिहिं जंपे आवागवण न होई। मोरी आद न जाणत, महीयल धूंवा बखाणत। उरथ धाकले तसूलूं, अन्नत तो हम रचीलो, हमै सिरजीले से कोण? म्हे जोगी कै भोगी, कै अल्प अहारी, ज्ञानी कै ध्यानी, कै निज कर्म धारी। सोखी कै पोखी, कै जल बिंब धारी, दया धर्म थापले निज बाला ब्रह्मचारी।
यह शब्द उस परम सत्य की ओर संकेत करता है जो सांसारिक माया, शरीर, रिश्तों और भौतिक पहचान से परे है। वह किसी एक सांसारिक संबंध से बंधा हुआ नहीं है। मनुष्य को बाहरी मोह, क्रोध, दुख और अहंकार से ऊपर उठना चाहिए। साधक अपने कर्म, ज्ञान, ध्यान, संयम और दया-धर्म के माध्यम से आत्मिक जीवन को विकसित करे। ब्रह्मचर्य, संयम और धर्म का आधार जीवन को शुद्ध करने वाला है।
This Shabd points toward the ultimate reality beyond worldly illusion, physical identity and ordinary relationships. The seeker is encouraged to rise above attachment, anger, suffering and ego. A spiritual aspirant should cultivate discipline through right action, knowledge, meditation, restraint and compassion. A life grounded in Dharma and self-control becomes a path toward spiritual realization.
✦ मुख्य संदेश:

माया और सांसारिक मोह से ऊपर उठकर ज्ञान, कर्म, संयम और दया-धर्म का जीवन अपनाना चाहिए।

प्रमाणित शबद पढ़ें
03 Raag Bhairav

शब्द 3 — शब्द 3: मोरे अंग न अलसी

ओ३म्—मोरे अंग न अलसी, तेल न मलियो, ना परमल पीसियां। जीमत पीवत भोगत बिलसत दीसां नाहीं, म्हापण को आधरूं। अड़सठ तीरथ हिरदा भीतर, बाहर लोका चारूं। नांहिं मोटी जीया जूणी, एती सांस फुरंतै सारूं। बासंदर क्यूं एक भणीजे, जिहिं कै पवन पिराणों। आला सूका मेल्है नाहीं, जिहिं दिशा करै मुहाणों। पापे गुनहे वीहे नाहीं, रीस करै रीसाणों। बहुली दौरे लावण हारूं, भावै जाण मैं जाणूं। न तूं सुरनर, न तूं शंकर, न तूं राव न राणों। काचे पिंड अकाज चलावै, म्हा अधूरत दाणों। मोरे छुरी न धारूं, लोह न सारूं न हथियारूं। सूरज को रिप बिहंडा नाहीं, ताते कहां उठावत भारूं। जिहिं हाकणड़ी बलद जू हाके, न लोहै की आरूं।
मनुष्य को केवल बाहरी तीर्थ, आडंबर और शारीरिक सजावट में सत्य नहीं खोजना चाहिए। वास्तविक तीर्थ हृदय के भीतर है। जीवन क्षणभंगुर है और शरीर नश्वर है, इसलिए आत्मिक सत्य की खोज आवश्यक है। साधक को हिंसा, क्रोध, अहंकार और बाहरी शक्ति के प्रदर्शन से दूर रहना चाहिए। जीवन का उद्देश्य केवल शरीर को चलाना या भौतिक सुख प्राप्त करना नहीं, बल्कि भीतर के सत्य को पहचानना है।
One should not seek spiritual truth merely through external rituals, bodily adornment or pilgrimage. The true sacred place is within the heart. Life is transient and the physical body is impermanent; therefore, the seeker should search for inner truth. The aspirant should remain free from violence, anger, ego and the display of worldly power. The purpose of life is not merely to sustain the body or pursue material pleasure, but to recognize the deeper spiritual reality within.
✦ मुख्य संदेश:

सच्चा तीर्थ बाहर नहीं, भीतर है; आत्मज्ञान बाहरी आडंबर से नहीं बल्कि आंतरिक साधना से प्राप्त होता है।

प्रमाणित शबद पढ़ें
04 Raag Bhairav

शब्द 4 — शब्द 4: जद पवन न होता

ओ३म्—जद पवन न होता, पाणी न होता, न होता धर गैंदारूं। चंदन न होता, सूर न होता, न होता गिंगदर तारूं। गऊ न गौरू माया जाल न होता, न होता हेत पियारूं। माय न बाप न बहण न भाई, साख न सैण न होता, न होता पख परवारूं। लख चौरासी जीया जूणी न होती, न होती वणीं अठारा भारूं। सप्त पाताल फूंगींद न होता, न होता सागर खारूं। अजिया सजिया जीया जूणी न होती, न होती कुड़ी भरतारूं। अर्थ न गर्थ न गर्व न होता, न होता तेजी तुरंग तुखारूं। हाट पटण बाजार न होता, न होता राज दवारूं। चाव न चहन न कोह का बांध न होता, तद होता एक निरंजन शंभू, कै होता धंधे कारूं। बात कदो की पूछै लोई, जुग छत्तीस बिचारूं। ताह परैरे अवर छत्तीसूं, पहला अंत न पारूं। म्हे तदपण होता, अब पण आछै, बल-बल होयसा, कह कद कद का करूं विचारूं।
यह शब्द सृष्टि के अस्तित्व और उसके मूल स्वरूप पर विचार करता है। यदि वायु, जल, सूर्य, चंद्रमा, पृथ्वी, जीव-जंतु, परिवार और संसार की विविधता न होती तो यह दिखाई देने वाला संसार भी नहीं होता। सभी परिवर्तनशील वस्तुओं के पीछे एक निराकार और मूल सत्ता की ओर संकेत किया गया है। मनुष्य संसार की उत्पत्ति और उसकी अनंतता को पूरी तरह समझने में सीमित है।
This Shabd reflects upon existence and the origins of the manifested world. Without air, water, the sun, moon, earth, living beings, relationships and the many forms of creation, the visible world would not exist. Behind all these changing forms lies the reference to a formless and fundamental reality. Human understanding remains limited when attempting to comprehend the vastness and origins of existence.
✦ मुख्य संदेश:

संसार परिवर्तनशील है; उसके पीछे स्थित मूल और निराकार सत्य को समझना ही वास्तविक आध्यात्मिक चिंतन है।

प्रमाणित शबद पढ़ें
05 Raag Bhairav

शब्द 5 — शब्द 5: अइया लो अपरंपर बाणी

ओ३म्—अइया लो अपरंपर बाणी, म्हे जपां न जाया जीऊं। नवअवतार नमोनारायण, तेपण रूप हमारा थीयूं। जती तपी तक पीर ऋषेश्वर, कांय जपीजै तेपण जाया जीऊं। खेचर भूचर खेपाला परगट गुस्सा, कांय जपीजै तेपण जाया जीऊं। वासंग शेष गुगिंदा फूणिंदा, कांय जपीजै तेपण जाया जीऊं। चौसठ जोगिन बावन वीरूं, कांय जपीजै तेपण जाया जीऊं। जपां तो एक निरालंभ शंभू, जिहिं कै माई न पीऊं। न तन रकूं, न तन धातूं, न तन ताव न सीऊं। सर्व सिरजत, मरत बिवरजत, तासूं मूलज लेहां कीयूं। अइयालों अपरंपर बाणी, म्हे जपां न जाया जीऊं।
यहाँ अनंत और अपरंपार सत्ता की वाणी का वर्णन है। अनेक रूपों, अवतारों, योगियों, ऋषियों और देव-परंपराओं के बीच साधक उस एक निरालंब, मूल और सर्वोच्च सत्ता की ओर संकेत करता है। वह सत्ता किसी एक शरीर, जाति, रूप या भौतिक सीमा में बंधी नहीं है। समस्त सृष्टि की उत्पत्ति और परिवर्तन उसी मूल सत्य के संदर्भ में समझे जाते हैं।
This Shabd speaks of the infinite and boundless Divine Reality. Amid countless forms, incarnations, sages, yogis and divine traditions, the seeker points toward the one fundamental, independent and supreme reality. That reality is not confined to a particular body, form or physical limitation. The origin and transformation of creation are understood in relation to this fundamental truth.
✦ मुख्य संदेश:

अनेक रूपों के पीछे एक मूल, निरालंब और अपरंपार सत्य को पहचानना चाहिए।

प्रमाणित शबद पढ़ें
51 Raag Bhairav

शब्द 51 — शब्द 51: सस पाताले भुयं अंतर अंतर राखिलौ

ओ३म्—सस पाताले भुयं अंतर अंतर राखिलौ, म्हे अटला अटळूं। अल्लाह अलेख अडाल अजूनी शंभू, पवन अधारी पिंडजलूं। काया भीतर माया आछै, माया भीतर दया आछै। दया भीतर छाया जिहिंकै, छाया भीतर बिंब फलूं। पूरक पूर पूर ले पौण, भूख नहीं अन्न जीमत कौण।
परम तत्व की व्यापकता और शरीर के भीतर स्थित सूक्ष्म तत्वों की ओर संकेत मिलता है। संसार में माया है, लेकिन उसी के भीतर दया भी विद्यमान है। दया से करुणा और जीवन का वास्तविक प्रतिबिंब विकसित होता है। मनुष्य को बाहरी संसार के साथ-साथ अपने भीतर के तत्व को भी पहचानना चाहिए।
This Shabd points toward the pervasive nature of the Divine Reality and the subtle principles present within the human being. Though worldly existence contains illusion and attachment, compassion is also present within it. The seeker should therefore look beyond the external world and recognize the deeper reality within.
✦ मुख्य संदेश:

माया के बीच दया और आंतरिक सत्य को पहचानना आवश्यक है।

प्रमाणित शबद पढ़ें
52 Raag Bhairav

शब्द 52 — शब्द 52: मोह मंडप थाप थाप ले

ओ३म्—मोह मंडप थाप थाप ले, राख राखले, अधरा धरूं आदेश बेसूं। ते नरैसूं, ते नरां अपरं पारूं। रण मध्यै से नर रहियौं, ते नरा अडरा डरूं। ज्ञान खड्गूं जथा हाथै, कोण होयसी हमारा रिपूं।
मोह का संसार मनुष्य के चारों ओर एक मंडप की तरह खड़ा हो जाता है। साधक को इस मोह से ऊपर उठकर ज्ञान को अपने हाथ में शस्त्र की तरह धारण करना चाहिए। जब ज्ञान दृढ़ होता है, तब अज्ञान और मोह उसके वास्तविक शत्रु के रूप में पहचाने जाते हैं।
Attachment builds a pavilion around the human being, creating an environment of illusion. The seeker must rise above this attachment and hold knowledge like a sword. When knowledge becomes firm, ignorance and attachment are recognized as the true enemies.
✦ मुख्य संदेश:

मोह के विरुद्ध ज्ञान ही वास्तविक शस्त्र है।

प्रमाणित शबद पढ़ें
53 Raag Bhairav

शब्द 53 — शब्द 53: गुरु हीरा बिणजै लेहम लेहूं

ओ३म्—गुरु हीरा बिणजै लेहम लेहूं, गुरु नै दोष न देणा। पवणा पाणी जमी मेहूं, भार अठारह पर्वत रेहूं। सूरज जोती परे परे, एती गुरु कै शरणूं। केती पवली अरु जल बिंबा, नवसे नदी निवासी नाला, सायर एती जराणा। कोड़ निनाणवे राजा भोगी, गुरु कै आखर कारण जोगी। माया राणी राज तजीलो, गुरु भेटीलो जोग सझीलो। पिंडा देख न झुरणा, कर कूषाणी बेफायात संठो। जो जो जीव पिंडै निसरणा, आदू पहली घड़ी अढाई। स्वर्गै पहुंचता हिरणी हिरणा, सुरां पुरनां तेतीसां मेलो।
गुरु को हीरे के समान मूल्यवान बताया गया है। गुरु के मार्गदर्शन को दोष देने के बजाय उसके द्वारा बताए हुए मार्ग को समझना चाहिए। संसार, प्रकृति, शरीर और भौतिक सुख सभी परिवर्तनशील हैं। माया और सांसारिक राज-पाट को छोड़कर गुरु से मिलने वाला योग और ज्ञान अधिक महत्वपूर्ण है।
The Guru is portrayed as precious as a diamond. Instead of blaming the Guru's guidance, the seeker should understand and follow the path shown by the Guru. The world, nature, body and material pleasures are all impermanent. Beyond worldly power and attachment lies the deeper Yoga and wisdom received through the Guru.
✦ मुख्य संदेश:

माया और सांसारिक आकर्षण से ऊपर उठकर गुरु के ज्ञान और योग को अपनाना चाहिए।

प्रमाणित शबद पढ़ें
54 Raag Bhairav

शब्द 54 — शब्द 54: अरुण विघाणीं रे रवि भाणै

ओ३म्—अरुण विघाणीं रे रवि भाणै देव दिवाणै, विष्णु पुराणों। बिंबा बाणो सूर उगाणो, विष्णु बिंबाणो कृष्ण पुराणों। कांय झंख्यो तै आल पिराणी, सुर नर तणीं सबेरूं। इंद्रो फूटो बेला बरती, ताछे हुई बेर अबेरूं। मेरे परै सो जोयण बिंबा लोयण, पुरुष भलो निज बाणी।
सूर्य, प्रकाश और विष्णु के प्रतीकों के माध्यम से ज्ञान और चेतना की ओर संकेत किया गया है। मनुष्य को केवल बाहरी घटनाओं में उलझने के बजाय अपने भीतर के प्रकाश और सत्य को देखना चाहिए। आंतरिक दृष्टि से सत्य को पहचानना ही वास्तविक जागरण है।
Through imagery of the sun, light and Vishnu, this Shabd points toward knowledge and consciousness. Rather than becoming absorbed only in external events, one should recognize the inner light and truth. True awakening comes through inner vision and realization.
✦ मुख्य संदेश:

बाहरी प्रकाश के साथ भीतर के ज्ञान-प्रकाश को पहचानना आवश्यक है।

प्रमाणित शबद पढ़ें
55 Raag Bhairav

शब्द 55 — शब्द 55: घटिये कै खोज फिरंता

ओ३म्—घटिये कै खोज फिरंता, सुण सेवता, खोज हस्ती को पायो। लूंकड़िये को खोज फिरंता, सुण सेवता, खोज सुरह को पायो। मोथड़िये कै गूढ़ खणंता, सुण सेवता, लाधो थान सुथानो। रांधड़िये को घाट घड़ंता, सुण सेवता, कंचन सोनो डांयो। हस्ती चढ़ंता गेंवर गुड़ंता, सुणही सुणहां भुंकत कायो।
मनुष्य जिस वस्तु की खोज करता है, उसी के अनुसार उसका प्रयास और परिणाम होता है। कहीं हाथी की खोज है, कहीं पशु की, कहीं छिपे हुए स्थान की और कहीं सोने की। यह शब्द संकेत देता है कि खोज की दिशा ही प्राप्ति को निर्धारित करती है। साधक यदि सत्य की खोज करे तो उसकी यात्रा भी उसी दिशा में आगे बढ़ेगी।
A person searches according to what one seeks, and the nature of the search determines what is eventually found. The Shabd suggests that the direction of one's search shapes one's realization. If the seeker searches for truth, the spiritual journey moves toward that truth.
✦ मुख्य संदेश:

जिस सत्य की खोज करोगे, उसी दिशा में जीवन की यात्रा आगे बढ़ेगी।

प्रमाणित शबद पढ़ें
56 Raag Bhairav

शब्द 56 — शब्द 56: कुपाथ कूं दान जु दीयो

ओ३म्—कुपाथ कूं दान जु दीयो, जाणै ऐण अंधेरी चोर जु लीयो। चोर जु लेकर भाखर चढ़ियो, कह जिवड़ा तैं कैनै दीयों। दान सुपाते बीज सुखेते, अमृत फूलै जी। काया कसौटी मन जो गूंठो, जरणा ढाकण दीजे। थोड़े मांहि थोड़े रो दीजे, होते नाह न कीजे। जोय जोय नाम विष्णु के बीजे, अनंत गुण लिख लीजे।
दान का महत्व केवल दान देने में नहीं बल्कि उचित पात्र और उचित उद्देश्य में है। गलत स्थान पर दिया गया दान अंधकार में खो सकता है, जबकि उचित स्थान पर दिया गया दान बीज की तरह फलता है। मनुष्य को अपने मन और शरीर को कसौटी पर कसना चाहिए तथा जीवन में विष्णु-नाम और सद्गुणों का बीज बोना चाहिए।
The value of charity lies not merely in giving, but in giving to the right recipient and for the right purpose. Charity given without discernment may disappear like something lost in darkness, whereas rightful giving grows like a well-planted seed. The seeker should test and discipline the mind and body and sow the seeds of divine remembrance and virtue.
✦ मुख्य संदेश:

सार्थक दान वही है जो उचित स्थान पर हो और सद्गुणों को जन्म दे।

प्रमाणित शबद पढ़ें
57 Raag Bhairav

शब्द 57 — शब्द 57: अति बल दानो सब ज्ञानी

ओ३म्—अति बल दानो सब ज्ञानी, गऊ कोट जे तीरथ दानो, बहुत करै अचारूं। ते पण जोय जोय पार न पायो, भण परापति सारूं। घट ऊंधै बरसत बहु मेहा, नीर थयो पण ढालूं। को होयसी राजा दुर्योधन सो, विष्णु सभा मह लागो। तिणहीं तो जोय जोय पार न पायो, अध विच रहियौं ढालूं। जपिया तपिया पोह बिन खपिया, खप खप गया इवाणी। तेज पार पहुंचता नाहीं, तांकी धोती रही असमानी।
बहुत बड़ा दान, तीर्थ और धार्मिक आचार करने के बाद भी मनुष्य अंतिम सत्य तक नहीं पहुँच सकता यदि उसके भीतर वास्तविक ज्ञान और सही आचरण नहीं है। दुर्योधन और अन्य उदाहरणों के माध्यम से संकेत है कि बाहरी सामर्थ्य, धार्मिक कर्म या प्रतिष्ठा अपने आप में मुक्ति का साधन नहीं।
Even great acts of charity, pilgrimage and religious observance cannot by themselves lead a person to the ultimate truth if true knowledge and righteous conduct are absent. Through examples such as Duryodhana, the Shabd suggests that worldly power, external religious acts and prestige alone cannot bring spiritual liberation.
✦ मुख्य संदेश:

बाहरी कर्मों की विशालता से अधिक महत्वपूर्ण आंतरिक ज्ञान और सही आचरण है।

प्रमाणित शबद पढ़ें
58 Raag Bhairav

शब्द 58 — शब्द 58: तउवा माण दुर्योधन माण्या

ओ३म्—तउवा माण दुर्योधन माण्या, अवर भी माणत मांग। तउवा दान जु कृष्णी माया, और भी फूलत दानो। तउवा जाण जु सहस्र झूंझ्या, और भी झूंझत जाणो। तउवा बाणजूं सीता कारण लक्ष्मण खेंच्या, और भी खेंचत बाणो। जती तपी तक पीरं ऋषीश्वर, तोल रहया शैतानो। तिण किण खेंच न सके, शंभू तणी कमाण। तेज पार पहुंचता नाहीं, ते कियो आपो भांगो।
दुर्योधन, दान, युद्ध, रामायण के पात्रों और शिव के धनुष जैसे उदाहरणों द्वारा मानवीय शक्ति और अहंकार की सीमाएँ बताई गई हैं। मनुष्य कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, केवल शक्ति के आधार पर अंतिम सत्य प्राप्त नहीं किया जा सकता। अहंकार और बाहरी सामर्थ्य से ऊपर उठना आवश्यक है।
Through examples involving Duryodhana, charity, battles, the Ramayana and Shiva's bow, the Shabd reflects upon the limits of human power and pride. No matter how powerful a person becomes, ultimate realization cannot be attained through power alone. One must rise beyond ego and external strength.
✦ मुख्य संदेश:

शक्ति और अहंकार की सीमा है; आध्यात्मिक सत्य उससे कहीं आगे है।

प्रमाणित शबद पढ़ें
59 Raag Bhairav

शब्द 59 — शब्द 59: पढ़ कागल वेदूं, शास्त्र शब्दूं (काल चक्र)

ओ३म्—पढ़ कागल वेदूं शास्त्र शब्दूं, भूला भूले झंख्या आलूं। अहनिश आव घटंती जावै, तेरा सरो न कारज कालूं। विष्णु विष्णु भण रे प्राणी, तज पाखंड जंजालूं। सतगुरु शब्द सार पिछाणो, तो छूटै जम जालूं।
केवल धार्मिक पुस्तकें और शास्त्र पढ़ते रहने से जीवन का कार्य सिद्ध नहीं होता यदि काल और समय की गति को न समझा जाए। दिन-रात निरंतर आयु घट रही है। पाखंड और सांसारिक प्रपंचों को छोड़कर सच्चे सतगुरु के शब्द को समझना और प्रभु स्मरण करना ही मुक्ति दिलाता है।
Merely reading paper treatises and scripture will not accomplish the soul’s destiny if one ignores the relentless march of time. Life slips away day and night. Renounce pretension and deceit; recognize the true essence of the Guru's sacred word to overcome mortality.
✦ मुख्य संदेश:

समय निरंतर घट रहा है; पाखंड छोड़कर सतगुरु शब्द की शरण में आओ।

प्रमाणित शबद पढ़ें
60 Raag Bhairav

शब्द 60 — शब्द 60: हस्ती चढ़ंता गेंवर गुड़ंता

ओ३म्—हस्ती चढ़ंता गेंवर गुड़ंता, राज सभा रस भोगूं। जा दिन जम का दूत आवेगा, ता दिन छूटै लोगूं। सुत बित दारा कोई न संगी, अहनिश भज निरजोगूं। विष्णु नाम सार सुख दाता, मिटै सकल भव रोगूं।
हाथी पर चढ़ना, राज-दरबार का सुख और भौतिक ऐश्वर्य भोगना अंततः यहीं छूट जाता है। मृत्यु के समय कोई पुत्र, धन अथवा परिवार साथ नहीं देता। केवल परमात्मा का पावन नाम ही संसार के समस्त दुखों और भवरोगों को मिटाने वाला सच्चा सहारा है।
Riding royal elephants and enjoying royal courtly pleasures will all be left behind. When the final hour arrives, neither family nor wealth accompanies the departing soul. Only the divine remembrance of the Supreme Lord cures worldly affliction and grants eternal peace.
✦ मुख्य संदेश:

भौतिक ऐश्वर्य यहीं रह जाएगा; केवल प्रभु नाम ही अंतिम साथी है।

प्रमाणित शबद पढ़ें
62 Raag Bhairav

शब्द 62 — शब्द 62: नामै कारण किरिया चू यो,

ओ३म्-नामै कारण किरिया चूक्यो, नामै सूरज साम्हो थूक्यो। नामै ऊभै कांसा मांया, नामै छान तिणूका खैं या। नामैं ब्राह्मण निवत बहोड्या, नामैं आवा कोरम्भ चोरया। नामैं बाड़ी का बनफल तोड्या, नामैं जोगी का ख पर फोड्या। नामैं ब्राह्मण का तागा तोड्या, नामैं बैर बिरोध धन लोड्या। नामैं सूवा गाय का बच्छ बिछोड्या, नामैं चरती पिवती गऊ बिडारी। नामैं हरी पराई नारी, नामैं सगा सहोदर मारया। नामैं तिरिया सिर खड़ग उभारया, नामैं फिरतै दातण कीयो, नामैं रण में जाय दौं दियो, नामैं बाट कूट धन लीयो। एक जू ओंगुण रामैं कीयों, अण हुंतो मिरघो मारण गइयो। दूजो औगुण रामै कीयो, एको दोष अदोषा दीयों। बनखंड मैं जद साथर सोइयों, जद को दोष तदो को होइयों।
शबद संख्या 62 में गुरु जम्भेश्वर जी जोगियों, सिद्धों और बाह्य भेष धारियों को सच्चा योग समझाते हैं। वे सिखाते हैं कि कान छिदवाना, भभूत मलना या वन-कंदराओं में भटकना योग नहीं है, अपितु मन के विकारों को वश में करना और जीव दया पालना ही सच्चा योग है।
In Shabad #62, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He addresses ascetics and mendicants, elucidating that genuine Yoga is not found in external robes or ritual austerities, but in internal purity, self-control, and loving kindness towards all creation.
✦ मुख्य संदेश:

धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

प्रमाणित शबद पढ़ें
74 Raag Bhairav

शब्द 74 — शब्द 74: कड़वा मीठा भोजन भख ले,

ओ३म्-कड़वा मीठा भोजन भख ले, भखकर देखत खीरूं। धर आखरड़ी साथर सोवण, ओढण ऊना चीरूं। सहजे सोवण पोह का जागण, जे मन रहिबा थीरूं। सुरग पहेली सांभल जिवड़ा, पोह उतरबा तीरूं।
शबद संख्या 74 में गुरु जम्भेश्वर जी मानव जीवन की नश्वरता और सत्कर्मों की महत्ता का बोध कराते हैं। वे प्राणी को सचेत करते हैं कि व्यर्थ के अहंकार को त्यागकर सत्य, शील, संतोष और परमार्थ के मार्ग पर चलें।
In Shabad #74, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He reflects upon the transient nature of human existence, urging seekers to transcend ego and cultivate humility, ethical discipline, and righteous living.
✦ मुख्य संदेश:

धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

प्रमाणित शबद पढ़ें
86 Raag Bhairav

शब्द 86 — शब्द 86: जुग जागो जुग जाग पिरांणी,

ओ३म्-जुग जागो जुग जाग पिरांणी, कांय जागंता सोवो। भलकै बीर बिगोवो होयसी, दुसमन कांय लकोवो। ले कूंची दरबान बुलाओ, दिल ताला दिल खोवो। जंपो रे जिण जं यो जणीयर, जपसी सो जिण हारी। लह-लह दाव पड़ंता खेलो, सुर तेतींसा सारी। पवन बंधान काया गढ काची, नीर छलै यूं पारी। पारी बिनसै नीर ढुलैलो, ओपिंड काम न कारी। काची काया दृढ कर सींचो, यूं माली सींचै बाड़ी। ले काया बासंदर होमो, यूं ईंधन की भारी। शील स्नाने संजमे चालो, पाणी देह पखाली। गुरू के बचने निंव खिंव चालो, हाथ जपो जपमाली। वस्तु पियारी खरचो यूं नाहीं, किहिं गुण राखो टाली। खरचे लाहो राखे टोटो, बिबरस जोय निहाली। घर आगी इत गोवल बासो, कूड़ी आधो चारी। आज मूवा कल दूसर दिन है, जो सरै तो सारी। पीछै कलीयर कागा रोलो, रहसी कूक पुकारी। ताण थकै यूं हारयो नाहीं, मुरखा अवसर जौले हारी।
शबद संख्या 86 में गुरु जम्भेश्वर जी सृष्टि के मूल तत्वों—जल, वायु, पृथ्वी, वनस्पति और मूक पशु-पक्षियों के संरक्षण का पावन संदेश देते हैं। प्रकृति परमात्मा का ही स्वरूप है, अतः उसकी रक्षा करना प्रत्येक मनुष्य का सर्वोपरि धर्म है।
In Shabad #86, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He emphasizes the sacred sanctity of nature, water, air, trees, and voiceless creatures, teaching that preserving the environment is living worship of the omnipresent Creator.
✦ मुख्य संदेश:

धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

प्रमाणित शबद पढ़ें
98 Raag Bhairav

शब्द 98 — शब्द 98: जिहि गुरू कै खिणही ताऊं,

ओ३म्-जिहि गुरू कै खिणही ताऊं, खिणही सीऊ, खिणही पवणा, खिणही पाणी, खिणही मेघ मण्डाणो। कृष्ण करंता बार न होई, थल सिर नीर निवाणो। भूला प्राणी विष्णु जंपो रे, यूं मौत टलै जिरवाणो। भीगा है पण भेद्या नाहीं, पांणी मांहि पखाणो। जीवत मरो रे जीवत मरो, जिन जीवन की बिध जांणी। जे कोई आवै हो हो कर, तो आप जै हुईये पांणी। जाकै बहुती नवणी, बहुती खवणीं बहुती क्रिया समांणी। जांकी तो निज निर्मल काया जोय जोय देखो, ले चढ़ियो अस्मानी। यह मढ देवल मूल न जोयबा, निज कर जपो पिराणी। अनन्त रूप जोवो अभ्यागत, जिहिंका खोज लहो सुर बाणी। सेतम सेतूं, जेरज जेरू, इंडस इंडू, अइयालो उरध जे खैणी।
शबद संख्या 98 में गुरु जम्भेश्वर जी सृष्टि के मूल तत्वों—जल, वायु, पृथ्वी, वनस्पति और मूक पशु-पक्षियों के संरक्षण का पावन संदेश देते हैं। प्रकृति परमात्मा का ही स्वरूप है, अतः उसकी रक्षा करना प्रत्येक मनुष्य का सर्वोपरि धर्म है।
In Shabad #98, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He emphasizes the sacred sanctity of nature, water, air, trees, and voiceless creatures, teaching that preserving the environment is living worship of the omnipresent Creator.
✦ मुख्य संदेश:

धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

प्रमाणित शबद पढ़ें
110 Raag Bhairav

शब्द 110 — शब्द 110: मथुरा नगर की राणी होती,

ओ३म्-मथुरा नगर की राणी होती, होती पाटमदे राणी। तीरथ वासी जाती लूटे, अति लूटे खुरसाणी। मानक मोती हीरा लूट्या, जाय बीलूधा दांणी। कवले चूकी बचने हारी, जिहिं औगुण ढांची ढोवै पांणी। विष्णु कूं दोष किसो रे प्राणी, आपे खता कमाणी।
शबद संख्या 110 में गुरु जम्भेश्वर जी अविनाशी परमात्मा विष्णु के अनन्य सुमिरन का संदेश देते हैं। वे मानव को सचेत करते हैं कि सांसारिक भ्रम और मोह-माया नश्वर हैं; केवल प्रभु का नाम और सदाचार ही भवसागर पार कराने वाले हैं।
In Shabad #110, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He inspires ceaseless remembrance of the Supreme Lord Vishnu, reminding the soul that worldly entanglements are fleeting and only spiritual truth liberates from worldly suffering.
✦ मुख्य संदेश:

धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

प्रमाणित शबद पढ़ें
📡 ऑफलाइन मोड सक्रिय (Offline Mode Active) आपातकालीन नंबर →