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✦ श्री गुरु जम्भेश्वर भगवान • प्रामाणिक 120 शब्दवाणी डिजिटल अभिलेखागार (C9.2.1)

शब्दवाणी — 120 Sacred Shabds

सत्य, धर्म, करुणा, जीव-दया एवं पर्यावरण संरक्षण के पावन अमर उपदेश। मूल शब्दवाणी अपरिवर्तनीय सुरक्षित, हिन्दी भावार्थ एवं English translation सहित।

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आज का पावन शबद (Daily Wisdom)

शब्द 71: शब्द 71: धवणा धूजै पाहण पूजै बे फरमाई खुदाई

मूल वाणी:

ओ३म्-धवणा धूजै पाहण पूजै बे फरमाई खुदाई, गुरू के चेले के पाए लागै देखो लोग अन्हयायी। काठी कणजो रूपा रेहण, कापड़ मांह छिपाई। नीचा पड़ पड़ तानैं धोकें, धीरा रे हरि आई। ब्राह्मण नाऊं लादण रूड़ा, बूता नाऊं कूता। वै अपहानै पोह बत...

हिन्दी भावार्थ:

शबद संख्या 71 में गुरु जम्भेश्वर जी जोगियों, सिद्धों और बाह्य भेष धारियों को सच्चा योग समझाते हैं। वे सिखाते हैं कि कान छिदवाना, भभूत मलना या वन-कंदराओं में भटकना योग नहीं है, अपितु मन के विकारों को वश में करना और जीव दय...

प्रदर्शित शबद: 1–20 (कुल 20) सारे फ़िल्टर साफ़ करें (Reset)
61 Raag Ramkali

शब्द 61 — शब्द 61: कैतैं कारण किरिया चू यो,

ओ३म्-कैतैं कारण किरिया चूक्यो, कैतैं सूरज सामो थूक्यो। कैतैं उभै कांसा मांया, कैतैं छान तिणूका खैंचा। कैतैं ब्राह्मण निवत बहोड्या, कैतैं आवा कोरंभ चोर्या। कैतैं बाड़ी का बन फल तोड़या, कैतैं जोगी का खप्पर फोड्या। कैतैं ब्राह्मण का तागा तोड़्या, कैतैं बैर बिरोध धन लोड़या। कैतैं सूवा गाय का बच्छा बिछोड़्या, कैतैं चरती पिवती गऊ बिडारी। कैतैं हरी पराई नारी, कैतैं सगा सहोदर मारया। कैतैं तिरिया शिर खड़ग उभारया, कैतैं फिरतैं दातण कीयो। कैतैं रण मैं जाय दों दीयो, कैतैं वाट कूट धन लीयो। किसे सरापे लक्ष्मण हुइयों।
शबद संख्या 61 में गुरु जम्भेश्वर जी जोगियों, सिद्धों और बाह्य भेष धारियों को सच्चा योग समझाते हैं। वे सिखाते हैं कि कान छिदवाना, भभूत मलना या वन-कंदराओं में भटकना योग नहीं है, अपितु मन के विकारों को वश में करना और जीव दया पालना ही सच्चा योग है।
In Shabad #61, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He addresses ascetics and mendicants, elucidating that genuine Yoga is not found in external robes or ritual austerities, but in internal purity, self-control, and loving kindness towards all creation.
✦ मुख्य संदेश:

धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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65 Raag Gauri

शब्द 65 — शब्द 65: तउवा जाग जु गोरख जाज्ज्या,

ओ३म्-तउवा जाग जु गोरख जाग्या, निरह निरंजन निरह निरालंब। जुग छतीसों एकै आसन बैठा बरत्या, अवर भी अबधू जागत जांगू। तउवा त्याग जू ब्रह्मा त्यागा, अवर भी त्यागत त्यागूं। तउवा भाग जो इश्वर मस्तक, अवर भी मस्तक भागूं। तउवा सीर जो ईश्वर गौरी, अवर भी कहियत सीरूं। तउवा बीर जो राम लक्ष्मण, अवर भी कहियत बीरों। तउवा पाग जो दश शिर बांधी, अवर भी बांधत पागो। तउवा लाज जो सीता लाजी, अवर भी लाजत लाजूं। तउवा बाजा राम बजाया, अवर बजावत बाजूं। तउवा पाज जो सीता कारण लक्ष्मण बांधी, अवर भी बांधत पाजूं। तउवा काज जो हनुमत सारा, अवर भी सारत काजूं। तउवा खागज जो कुम्भकरण महरावण खाज्या, अवर भी खावत खागूं। तउवा राज दुर्योधन माण्या, अवर भी माणत राजूं। तउवा राग ज कन्हड़ बांणी, अवर भी कहिये रागूं। तउवा माघ तुरंगम तेजी, टटू तणा भी माघूं। तउवा बागज हंसा टोली, बुगला टोली भी बागूं। तउवा नाग उद्यावल कहिये, गरूड़ सीया भी नागूं। तउवा शागज नागरबेली, कूकर बगरा भी शांगू। जां जां शैतानी करै उफारूं, तां तां महंतज फलियों। जुरा जम राक्षस जुरा जुरिन्द्र, कंश केशी चंडरूं। मधु कीचक हिरणाक्ष हिरणाकुस, चक्र धर बलदेऊं। पावत वासुदेवो मंडलीक कांय न जोयबा, इहिं धर ऊपर रती न रहीबा रांजू।
शबद संख्या 65 में गुरु जम्भेश्वर जी जोगियों, सिद्धों और बाह्य भेष धारियों को सच्चा योग समझाते हैं। वे सिखाते हैं कि कान छिदवाना, भभूत मलना या वन-कंदराओं में भटकना योग नहीं है, अपितु मन के विकारों को वश में करना और जीव दया पालना ही सच्चा योग है।
In Shabad #65, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He addresses ascetics and mendicants, elucidating that genuine Yoga is not found in external robes or ritual austerities, but in internal purity, self-control, and loving kindness towards all creation.
✦ मुख्य संदेश:

धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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67 Raag Kalyan

शब्द 67 — शब्द 67 (शुक्ल हंस): श्री गढ़ आल मोत पुर

ओ३म्-श्री गढ़ आल मोत पुर पाटण भुंय नागोरी, म्हे ऊंडे नीरे अवतार लीयो। अठगी ठंगण अदगी दागण, अगजा गंजण, ऊंनथ नाथन, अनू नवावन, काहि को म्हे खैंकाल कीयों। काहीं सुरग मुरादे देसां, काहीं दौरै दीयूं। होम करीलो दिन ठावीलो, सैंस रचीलो छापर नीबी दूण पूरूं, गांव सुंदरीयो छीलै बलदीयो। छंदे मन्हदे बाल दीयो। अजम्है होता नागो बाड़े, रैण थंभै गढ़ गागरणो। कुं कुं कंचन सोरठ मरहठ, तिलंग दीप गढ गागरणो। गढ़ दिल्ली कंचन अर दूणायर, फिर फिर दुनिया परखै लीयों। थटै भवणिया अरू गुजरात। आछो जाई सवा लाख मालवै परवत मांडू मांही ज्ञान कथूं। खुरासाण गढ लंका भीतर। गूगल खेऊं पैरठयों। ईडर कोट उजैणी नगरी, काहिंदा सिंध पुरी विश्राम लीयों। कायं रे सायरा गाजै बाजै, घुरै घुरहरै करै इवांणी आप बलूं। किहिं गुण सायरा मीठा होता, किकिहिं अवगुण हुओ खार खंरूं। जद बासग नेतो मेर मथाणी, समंद बिरोल्यो ढोयऊरू। रैणायर डोहण पांणी पोहण, असुरां बेधी करण छलूं। दहशिर नै जद वाचा दीन्हहीं, तद म्हे मेल्ही अनंत छलूं। दहशिर का दश मस्तक छेद्या, ताणु बाणु लड़ू कुलूं। सोखा बाणु एक बखाणू, जाका बहु परवाणूं। निश्चय राखी तास बलूं, राय विष्णु से बाद न कीजैं। कांय बधारो दैत्य कुलूं। म्हेपण म्हेई, थेपण थेई, सा पुरूषा की लच्छ कुलूं। गाजै गुड़कै से यूं वीहै, जेझल जाकी सैहस फणूं। मेरे माय न बाप न बहण न भाई, साख न सैंण न लोक जणो। बैकुण्ठे विश्वास बिलम्बण, पार गिराये मात खिणू। विष्णुं विष्णुं तू भण रे प्राणी, विष्णु भणन्हता अनन्त गुणूं। सहसे नावें, सहंसे ठावें, सहसे गावै, गाजे बाजे, हीरे नीरे, गगन गहीरे, चवदा भवणे, तिहूं तृलोके जम्बू दीपे, सप्त पताले, अई अमाणो तत समाणो। गुरू फुरमाणो, बहू परवाणो। अइयां, उइयां निरजत सिरजत, नान्हीं मोटी जीया जूंणी एती सास फुरतै सारूं। कृष्णी माया घन बरंषता, म्हे अगिणि गिणूं फूहांरूं। कुण जाणै म्हे देव कुदेवों, कुण जाणै म्हे अलख अभेवों। कुण जाणै म्हे सुर नर देवों, कुण जाणै म्हारा पहला भेवूं। कुण जाणै म्हे ज्ञानी के ध्यानी, कुण जाणै म्हे केवल ज्ञानी। कुण जाणै म्हे ब्रह्मज्ञानी। कुण जाणै म्हे ब्रह्मचारी। कुण जाणै म्हे अल्प अहारी, कुण जाणै म्हे पुरूष कै नारी। कुण जाणै म्हे बाद बिबादी, कुण जाणै म्हे लुब्ध सवादी। कुण जाणै म्हे जोगी के भोगी, कुण जाणै म्हे आप संयोगी। कुण जाणै म्हे भावत भोगी। कुण जाणै म्है लील पती, कुण जाणै म्है सूम क दाता, कुण जाणै म्है सती कुसती, आप ही सूमर आप ही दाता, आप कुसती आपें सती। नव दाणूँ निरवंश गुमाया, कैरव किया फिती फिती। राम रूप कर राक्षस हड़िया, बाण कै आगै वनचर जुड़िया। तद म्हें राखी कमल पती, दया रूप म्हे आप बखांणा संहार रूप म्हे आप हती। सोलै संहस नवरंग गोपी, भोलम भालम, टोलम टालम, छोलम छालम, सहजै राखीलो म्हे कन्हड़ बालो आप जती। छोलबीया म्हे तपी तपेश्वर, छोलब कीया फती फती। राखण मतां तो पड़दै राखां, यूं दाहै पान वणासपती।
शबद संख्या 67 में गुरु जम्भेश्वर जी जोगियों, सिद्धों और बाह्य भेष धारियों को सच्चा योग समझाते हैं। वे सिखाते हैं कि कान छिदवाना, भभूत मलना या वन-कंदराओं में भटकना योग नहीं है, अपितु मन के विकारों को वश में करना और जीव दया पालना ही सच्चा योग है।
In Shabad #67, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He addresses ascetics and mendicants, elucidating that genuine Yoga is not found in external robes or ritual austerities, but in internal purity, self-control, and loving kindness towards all creation.
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धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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71 Raag Kedara

शब्द 71 — शब्द 71: धवणा धूजै पाहण पूजै बे फरमाई खुदाई

ओ३म्-धवणा धूजै पाहण पूजै बे फरमाई खुदाई, गुरू के चेले के पाए लागै देखो लोग अन्हयायी। काठी कणजो रूपा रेहण, कापड़ मांह छिपाई। नीचा पड़ पड़ तानैं धोकें, धीरा रे हरि आई। ब्राह्मण नाऊं लादण रूड़ा, बूता नाऊं कूता। वै अपहानै पोह बतावैं, बैर जगावैं सूता। भूत परेती जाखा खांणी, यह पाखण्ड परवाणो। बल बल कूकस कांय दलीजै, जामे कणूं न दाणू। तेल लीयो खल चोपै जोगी, खलपण सूंघी बिकाणो। कालर बीज न बीज पिराणी, थल सिर न कर निवाणो। नीर गए छीलर कांय सोधो, रीता रह्या इवाणो। भवंता ते फिरंता, फिरंता ते भवंता, मड़े मसाणे। तड़े तड़ंगे, पड़े पखांणे, वहां तो सिद्धि न काई। निज पोह खोज पिराणी, जे नर दावो छोड्यो मेर चुकाई, राह तेतीसों की जाणी।
शबद संख्या 71 में गुरु जम्भेश्वर जी जोगियों, सिद्धों और बाह्य भेष धारियों को सच्चा योग समझाते हैं। वे सिखाते हैं कि कान छिदवाना, भभूत मलना या वन-कंदराओं में भटकना योग नहीं है, अपितु मन के विकारों को वश में करना और जीव दया पालना ही सच्चा योग है।
In Shabad #71, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He addresses ascetics and mendicants, elucidating that genuine Yoga is not found in external robes or ritual austerities, but in internal purity, self-control, and loving kindness towards all creation.
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धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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73 Raag Ramkali

शब्द 73 — शब्द 73: हरी कंकेहड़ी मंडप मैड़ी जहां

ओ३म्-हरी कंकेहड़ी मंडप मैड़ी जहां हमारा बासा। चार चक नव दीप थरहरै, जो आपो परकासूं। गुणिंया म्हारा सुगणा चेला, म्हे सुगणा का दासूं। सुगणा होय सैं सुरगे जायसैं, नुगरा रहा निरासूं। जा का थान सुहाया घर बैकुण्ठे, जाय संदेसो लायो। अमिया ठमियां इमृत भोजन, मनसा पलंग सेज निहाल बिछायों। जागो जोवो जोत न खोवो, छल जासी संसारूं। भणी न भणबा सुणी न सुणबा, कही न कहबा, खडी न खड़बा, रे भल कृषाणी। ताकै करण न घातो हेलो, कलीकाल जुग बरते जैंलो, तातै नही सुरां सो मेलों।
शबद संख्या 73 में गुरु जम्भेश्वर जी मानव जीवन की नश्वरता और सत्कर्मों की महत्ता का बोध कराते हैं। वे प्राणी को सचेत करते हैं कि व्यर्थ के अहंकार को त्यागकर सत्य, शील, संतोष और परमार्थ के मार्ग पर चलें।
In Shabad #73, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He reflects upon the transient nature of human existence, urging seekers to transcend ego and cultivate humility, ethical discipline, and righteous living.
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धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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77 Raag Gauri

शब्द 77 — शब्द 77: भूला लो भल भूला लो,

ओ३म्-भूला लो भल भूला लो, भूला भूल न भूलूं। जिहिं ठूंठडीये पान न होता, ते यूं चाहत फूलूं। को को कपूर घूंटीलो, बिन घूंटी नहीं जाणी। सतगुरू होयबा सहजे चीन्हबा, जाचंध आल बखांणी। ओछी किरिया आवै फिरियां, भ्रांती सुरग न जाई। अन्हत निरंजन लेखो लेसी, पर चीन्हों नहीं लोकाई। कण बिन कूकस रस बिन बाकस, बिन किरिया परिवारूं। हरि बिंन देहरै जांण न पावै, अम्बाराय दवारूं।
शबद संख्या 77 में गुरु जम्भेश्वर जी अविनाशी परमात्मा विष्णु के अनन्य सुमिरन का संदेश देते हैं। वे मानव को सचेत करते हैं कि सांसारिक भ्रम और मोह-माया नश्वर हैं; केवल प्रभु का नाम और सदाचार ही भवसागर पार कराने वाले हैं।
In Shabad #77, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He inspires ceaseless remembrance of the Supreme Lord Vishnu, reminding the soul that worldly entanglements are fleeting and only spiritual truth liberates from worldly suffering.
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79 Raag Dhanasri

शब्द 79 — शब्द 79: बारा पोल नवै दरसाजी

ओ३म्-बारा पोल नवै दरसाजी, राय अथरगढ थीरूं। इस गढ कोई थिर न रहिबा, निश्चै चाल गया गुरू पीरूं।
शबद संख्या 79 में गुरु जम्भेश्वर जी सद्गुरु की अनन्य महिमा और मार्गदर्शन की अनिवार्यता प्रकट करते हैं। गुरु-मुख से प्रकट होने वाला ज्ञान ही अज्ञान के अंधकार को मिटाकर मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।
In Shabad #79, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He glorifies the necessity of the True Master (Satguru), whose enlightened guidance dissolves worldly delusion and leads the aspirant towards liberation.
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83 Raag Kedara

शब्द 83 — शब्द 83: जो नर घोड़ै चढै पाग न बांधै

ओ३म्-जो नर घोड़ै चढै पाग न बांधै, ताकी करणी कौण बिचारूं। शुचियारा होयसी आय मिलसी, करड़ा दोजग खारूं। जीव तड़े को रिजक न मेटूं, मूवां परहथ सारूं। हाथ न धोवै पग न पखालै, नाहरसिंघ नर काजूं। जुग अनंत अनंत बरत्या, म्हे शून्हय मंडल का राजूं।
शबद संख्या 83 में गुरु जम्भेश्वर जी सृष्टि के मूल तत्वों—जल, वायु, पृथ्वी, वनस्पति और मूक पशु-पक्षियों के संरक्षण का पावन संदेश देते हैं। प्रकृति परमात्मा का ही स्वरूप है, अतः उसकी रक्षा करना प्रत्येक मनुष्य का सर्वोपरि धर्म है।
In Shabad #83, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He emphasizes the sacred sanctity of nature, water, air, trees, and voiceless creatures, teaching that preserving the environment is living worship of the omnipresent Creator.
✦ मुख्य संदेश:

धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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85 Raag Ramkali

शब्द 85 — शब्द 85: भोम भली कृषाण भी भला,

ओ३म्-भोम भली कृषाण भी भला, खेवट करो कमाई। गुरू प्रसाद काया गढ़ खोजो, दिल भीतर चोर न जाई। थलिये आय सतगुरू परकाश्यो, जोलै पड़ी लोकाई। एक खिण मे तीन भवन म्हे पोखां, जीवा जूण सवाई। करण समो दातार न हुवो, जिन कंचन बाहू उठाई। सोई कवीसा कवल नवेड़ी, जिण सुरह सुबच्छ दुहाई। मेर समो कोई केर न देख्यो, सायर जिसी तलाई। लंक सरीखो कोट न देख्यो, समंद सरीखी खाई। दशरथ सो कोई पिता न देख्यो, देवलदै सी माई। सीत सरीखी तिरिया न देखी, गरब न करीयों काई। हनमत सो कोई पायक न देख्यो, भीम जैसी सबलाई। रावण सो कोई राव न देख्यो, जिण चोहचक आन फिराई। एक तिरिया कै राहा बेधी, लंका फेर बसाई। संखा मोहरा सेतम सेतूं, ताक्यूं बिलगै काई। ब्राह्मण था ते वेदे भूला, काजी कलम गुमाई। जोग बिहूंणा जोगी भूला, मुंडिया अकल न काई। इहिं कलयुग मैं दोय जन भूला, एक पिता एक माई। बाप जाणै मेरै हलीयो टोरै, कोहर सींचण जाई। माय जाणै मेरै बहूटल आवै, बाजै बिरद बधाई। म्हे शिंभू का फरमाया आया, बैठा तखत रचाई। दोय भुजडंडे परवत तोलां, फेरां आपण राई। एक पलक मैं सर्व संतोषा जीया जूण सवाई। जुगां जुगां को जोगी आयो, बैठो आसन धारी, । हाली पूछै पाली पूछै, यह कलि पूछण हारी । थली फिंरतो खिलेरी पूछै, मेरी गुमाई छाली। बांण चहोड़ पारधियो पूछै, किहिं अवगुण चूकै चोट हमारी। रहोरे मूर्खा मुग्ध गंवारा, करो मजूरी पेट भराई। है है जायो जीव न घाई । मैडी बैठो राजेन्द्र पूछै, स्वामी जी कती एक आयु हमारी। चाकर पूछै ठाकर पूछै और पूछै कीर कहारी। सोक दुहागण तेपण पूछै लेले हाथ सुपारी। बांझ तिरिया बहु तेरी पूछै, किसी परापति म्हारी। त्रेता जुग में हीरा विणज्या, द्वापर गऊ चराई। वृन्दावन मैं बंसी बजाई, कलजुग चारी छाली। नव खेड़ी म्हे आगै खेड़ी, दशवैं कालंके की बारी। उत्तम देश पसारो मांड्यो, रमण बैठो जुवारी। एक खंड बैठा नवखंड जीता को ऐसो लहो जुवारी।
शबद संख्या 85 में गुरु जम्भेश्वर जी धार्मिक पाखंड, बाह्य कर्मकांड और मूक प्राणियों पर होने वाली क्रूरता का कड़ा विरोध करते हैं। वे स्पष्ट उपदेश देते हैं कि परमात्मा के दरबार में दया, सत्य, पवित्र आचरण और ईमानदारी ही सच्ची बंदगी है।
In Shabad #85, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He fearlessly denounces hypocrisy, empty rituals, and cruelty against innocent beings, emphasizing that true divine devotion lies in universal compassion, truthful living, and non-violence.
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धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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89 Raag Gauri

शब्द 89 — शब्द 89: उरधक चन्हदा

ओ३म्-उरधक चन्हदा, निरधक सूरूं, नव लख तारा नेड़ा न दूरूं। नव लख चन्हदा नव लख सूरूं, नव लख धंधू कारूं। तांह परेरै तेपण होता, तिंहका करूं बिचारूं।
शबद संख्या 89 में गुरु जम्भेश्वर जी धार्मिक पाखंड, बाह्य कर्मकांड और मूक प्राणियों पर होने वाली क्रूरता का कड़ा विरोध करते हैं। वे स्पष्ट उपदेश देते हैं कि परमात्मा के दरबार में दया, सत्य, पवित्र आचरण और ईमानदारी ही सच्ची बंदगी है।
In Shabad #89, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He fearlessly denounces hypocrisy, empty rituals, and cruelty against innocent beings, emphasizing that true divine devotion lies in universal compassion, truthful living, and non-violence.
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धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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91 Raag Dhanasri

शब्द 91 — शब्द 91: छंदे मंदे बालक बुद्धे

ओ३म्-छंदे मंदे बालक बुद्धे, कूड़े कपटे ऋध न सिद्धे। मेरे गुरू जो दीन्हही शिक्षा, सर्व आलिङ्गण फेरी दीक्षा। जाण अजाण बहिया जब जब, सर्व अलिड़्गण मेटे तब तब। ममता हस्ती बांध्या काल, काल पर काले पसरत डाल। ध्यान न डोले मन न टले, अहनिश ब्रह्म ज्ञान उ चरै। काया पत नगरी मन पत राजा, पंच आत्मा परिवारूं। है कोई आछै मही मंडल शूरा, मनराय सूं झूझ रचायले। अथगा थगायले, अवसा बसायले, अनबे माघ पाल ले। सत-सत भाखत गुरू रायों, जरा मरण भो भागूं।
शबद संख्या 91 में गुरु जम्भेश्वर जी सद्गुरु की अनन्य महिमा और मार्गदर्शन की अनिवार्यता प्रकट करते हैं। गुरु-मुख से प्रकट होने वाला ज्ञान ही अज्ञान के अंधकार को मिटाकर मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।
In Shabad #91, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He glorifies the necessity of the True Master (Satguru), whose enlightened guidance dissolves worldly delusion and leads the aspirant towards liberation.
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धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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95 Raag Kedara

शब्द 95 — शब्द 95: बाद बिवाद फिटाकर प्राणी

ओ३म्-बाद बिवाद फिटाकर प्राणी, छाडो मनहट मन का भाणो। कांही कै मन भयो अंधेरो, कांही सूर उगाणो। नुगरा कै मन भयो अंधेरो, सुगरा सूर उगाणो। चरण भी रहिया, लोयण झुरिया, पिंजर पड्यो पुराणो। बेटा बेटी बहन रू भाई, सबसै भयो अभाणो। तेल लियो खल चोपै जोगी, रीता रहीयो घाणो। हंस उडाणो पंथ बिलब्यो, कीयो दूर पयाणो। आगै सुरपति लेखो मांगै, कहि जीवड़ा के करण कमाणो। जीवड़ा नै पाछो सुझण लागो सुकरत नै पछताणो।
शबद संख्या 95 में गुरु जम्भेश्वर जी जोगियों, सिद्धों और बाह्य भेष धारियों को सच्चा योग समझाते हैं। वे सिखाते हैं कि कान छिदवाना, भभूत मलना या वन-कंदराओं में भटकना योग नहीं है, अपितु मन के विकारों को वश में करना और जीव दया पालना ही सच्चा योग है।
In Shabad #95, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He addresses ascetics and mendicants, elucidating that genuine Yoga is not found in external robes or ritual austerities, but in internal purity, self-control, and loving kindness towards all creation.
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धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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97 Raag Ramkali

शब्द 97 — शब्द 97: विष्णु विष्णु तूं भण रे प्राणी

ओ३म्-विष्णु विष्णु तूं भण रे प्राणी, जो मन मानै रे भाई। दिनका भूला रात न चेता, कांय पड़ा सूता, आस किसी मन थाई। तेरी कुड़ काची लगवाड़ घणो छै, कुशल किसी मन भाई। हिरदै नाम विष्णु को जंपो, हाथे करो टवाई। हरि पर हर की आण न मानी, भूला भूल जपी महमाई। पाहन प्रीत फिटाकर प्राणी, गुरू बिन मुक्ति न जाई। पंच क्रोड़ी ले प्रहलाद उतरियो, जिन खर तर करी कमाई। सात क्रोड़ी ले राजा हरिचंद उतरियो, तारादे रोहिताश हरिचन्हद हाटोहाट बिकाई। नव क्रोड़ी राव युधिष्ठर ले उतरियो, धन धन कुन्हती माई। बारा क्रोड़ी समाहन आयो, प्रहलादा सूं वाचा कवल जु थाई। किसकी नारी वस्तु पियारी, किसका भाई। भूली दुनिया मर मर जावै, ना चीन्हो सुरराई। पाहण नाऊं लोहा सक्ता, नुगरा चीन्हत काई।
शबद संख्या 97 में गुरु जम्भेश्वर जी अविनाशी परमात्मा विष्णु के अनन्य सुमिरन का संदेश देते हैं। वे मानव को सचेत करते हैं कि सांसारिक भ्रम और मोह-माया नश्वर हैं; केवल प्रभु का नाम और सदाचार ही भवसागर पार कराने वाले हैं।
In Shabad #97, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He inspires ceaseless remembrance of the Supreme Lord Vishnu, reminding the soul that worldly entanglements are fleeting and only spiritual truth liberates from worldly suffering.
✦ मुख्य संदेश:

धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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101 Raag Gauri

शब्द 101 — शब्द 101: नितही मावस नित संकरांति

ओ३म्-नितही मावस नित संकरांति, नितही नवग्रह वैसैं पांति। नितही गंग हिलोले जाय, सतगुरू चीन्है सहजै न्ह्वाय। निरमल पाणी निरमल घाट निरमल धोबी मांड्यो पाट, जेयो धोबी जाणे धोय घर में मैला वस्त्र रहै न कोय। एक मन एक चित साबण लावै, पहरंतो गाहक अति सुख पावै। ऊंचै नीचे करै पसारा, नाहीं दूजै का संचारा। तिल में तेल पहुप में बास, पांच तत में लियो प्रकाश। बिजली कै चमकै आवै जाय, सहज शून्य में रहै समाय। नै यो गावै न यो गवावै, सुरगे जाते बार न लावै। सतगुरू ऐसा तत बतावै, जुग जुग जीवै बहुरि न आवैं।
शबद संख्या 101 में गुरु जम्भेश्वर जी धार्मिक पाखंड, बाह्य कर्मकांड और मूक प्राणियों पर होने वाली क्रूरता का कड़ा विरोध करते हैं। वे स्पष्ट उपदेश देते हैं कि परमात्मा के दरबार में दया, सत्य, पवित्र आचरण और ईमानदारी ही सच्ची बंदगी है।
In Shabad #101, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He fearlessly denounces hypocrisy, empty rituals, and cruelty against innocent beings, emphasizing that true divine devotion lies in universal compassion, truthful living, and non-violence.
✦ मुख्य संदेश:

धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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103 Raag Dhanasri

शब्द 103 — शब्द 103: देखि अदेख्या

ओ३म्-देखि अदेख्या, सुण्या असुण्या, क्षिमारूप तप कीजै। थोड़े माहि थोड़ेरो दीजै, होते नाहिं न कीजै। कृष्णी मया तिहूं लोका साक्षी, अमृत फूल फलीजै। जोय जोय नांव विष्णु के दीजै, अनन्त गुणा लिख लीजै।
शबद संख्या 103 में गुरु जम्भेश्वर जी अविनाशी परमात्मा विष्णु के अनन्य सुमिरन का संदेश देते हैं। वे मानव को सचेत करते हैं कि सांसारिक भ्रम और मोह-माया नश्वर हैं; केवल प्रभु का नाम और सदाचार ही भवसागर पार कराने वाले हैं।
In Shabad #103, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He inspires ceaseless remembrance of the Supreme Lord Vishnu, reminding the soul that worldly entanglements are fleeting and only spiritual truth liberates from worldly suffering.
✦ मुख्य संदेश:

धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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107 Raag Kedara

शब्द 107 — शब्द 107: सहजे शीले सेज बिछायों

ओ३म्-सहजे शीले सेज बिछायों, उनमन रह्या उदांसू। जुगे जुगन्तर भवे भवन्तर, कहो कहाणी कासूं। रवि ऊगा जब उल्लू अन्धा, दुनियां भया उजासूं। सतगुरू मिलियो सतपंथ बतायो भ्रांत चुकाई, सुगरां भयो बिसवासूं। जां जां जांण्यो, तहां प्रवाणो। सहज समाणो, जिहिं के मन की पूगीं आसूं। जहां गुरू न चीन्हों पंथ न पायो, तहां गल पड़ी परासूं।
शबद संख्या 107 में गुरु जम्भेश्वर जी सद्गुरु की अनन्य महिमा और मार्गदर्शन की अनिवार्यता प्रकट करते हैं। गुरु-मुख से प्रकट होने वाला ज्ञान ही अज्ञान के अंधकार को मिटाकर मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।
In Shabad #107, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He glorifies the necessity of the True Master (Satguru), whose enlightened guidance dissolves worldly delusion and leads the aspirant towards liberation.
✦ मुख्य संदेश:

धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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109 Raag Ramkali

शब्द 109 — शब्द 109: देखत भूली को मनमानै

ओ३म्-देखत भूली को मनमानै, सेवै बिलोवै बाझ सनानै। देखत भूली का मन चेवै, भीतर कोरा बाहर भेवै। देखत भूली को मन मानै, हरि पर हर मिलियो शैताने। देखत भूली को मन चेवै, आक बखांणैं थंदे मेवै। भूलालो भल भूलालो, भूला भूल न भूलूं। जिहिं ठूंठड़िये पान न होता, ते यूं चाहत फूलूं।
शबद संख्या 109 में गुरु जम्भेश्वर जी अविनाशी परमात्मा विष्णु के अनन्य सुमिरन का संदेश देते हैं। वे मानव को सचेत करते हैं कि सांसारिक भ्रम और मोह-माया नश्वर हैं; केवल प्रभु का नाम और सदाचार ही भवसागर पार कराने वाले हैं।
In Shabad #109, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He inspires ceaseless remembrance of the Supreme Lord Vishnu, reminding the soul that worldly entanglements are fleeting and only spiritual truth liberates from worldly suffering.
✦ मुख्य संदेश:

धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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113 Raag Gauri

शब्द 113 — शब्द 113: ईमा मोमण चीमा गोयम

ओ३म्-ईमा मोमण चीमा गोयम, महंमद फुरमानी। उरका फुरका निवाज फरीजां, खासा खबर बिनाणी। इला रास्ती ईमा मोमन, मारफत मुल्लाणी।
शबद संख्या 113 में गुरु जम्भेश्वर जी मानव जीवन की नश्वरता और सत्कर्मों की महत्ता का बोध कराते हैं। वे प्राणी को सचेत करते हैं कि व्यर्थ के अहंकार को त्यागकर सत्य, शील, संतोष और परमार्थ के मार्ग पर चलें।
In Shabad #113, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He reflects upon the transient nature of human existence, urging seekers to transcend ego and cultivate humility, ethical discipline, and righteous living.
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115 Raag Dhanasri

शब्द 115 — शब्द 115: म्हे आप गरीबी तन गूदड़ियों,

ओ३म्-म्हे आप गरीबी तन गूदड़ियों, मेरा कारण किरिया देखो। बिन्दो ब्योहरो ब्योर विचारो, भूलस नाही लेखों। नदिये नीरूं, सागर हीरूं, पवणा रूप फिरै परमेश्वर। बिबै बेला निश्चल थाघ अथाघूं। उमज्ज्या समाघू, ते सरवर कित नीरूं। गहर गंभीरू, खिण एक विश्राम लियों, अब जु मंडल भई अवाजूं। म्हे शून्हय मंडल का राजूं।
शबद संख्या 115 में गुरु जम्भेश्वर जी अविनाशी परमात्मा विष्णु के अनन्य सुमिरन का संदेश देते हैं। वे मानव को सचेत करते हैं कि सांसारिक भ्रम और मोह-माया नश्वर हैं; केवल प्रभु का नाम और सदाचार ही भवसागर पार कराने वाले हैं।
In Shabad #115, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He inspires ceaseless remembrance of the Supreme Lord Vishnu, reminding the soul that worldly entanglements are fleeting and only spiritual truth liberates from worldly suffering.
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119 Raag Kedara

शब्द 119 — शब्द 119: विष्णु विष्णु तू भणरे प्राणी,

ओ३म्-विष्णु विष्णु तू भणरे प्राणी, पैंके लाख उपाजूं। रतन काया बैकूंठे बासो, तेरा जरा मरण भय भाजूं।
शबद संख्या 119 में गुरु जम्भेश्वर जी अविनाशी परमात्मा विष्णु के अनन्य सुमिरन का संदेश देते हैं। वे मानव को सचेत करते हैं कि सांसारिक भ्रम और मोह-माया नश्वर हैं; केवल प्रभु का नाम और सदाचार ही भवसागर पार कराने वाले हैं।
In Shabad #119, Sri Guru Jambheshwar Bhagwan imparts timeless spiritual wisdom. He inspires ceaseless remembrance of the Supreme Lord Vishnu, reminding the soul that worldly entanglements are fleeting and only spiritual truth liberates from worldly suffering.
✦ मुख्य संदेश:

धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं; सच्चा आचरण, जीव-दया और आत्म-साधना ही परमात्मा की सच्ची प्राप्ति है।

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