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विश्नोई एटलस
विश्नोई एटलस धरोहर की खोज • विरासत का संरक्षण
✦ श्री गुरु जम्भेश्वर भगवान • प्रामाणिक 120 शब्दवाणी डिजिटल अभिलेखागार (C9.2.1)

शब्दवाणी — 120 Sacred Shabds

सत्य, धर्म, करुणा, जीव-दया एवं पर्यावरण संरक्षण के पावन अमर उपदेश। मूल शब्दवाणी अपरिवर्तनीय सुरक्षित, हिन्दी भावार्थ एवं English translation सहित।

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आज का पावन शबद (Daily Wisdom)

शब्द 71: शब्द 71: धवणा धूजै पाहण पूजै बे फरमाई खुदाई

मूल वाणी:

ओ३म्-धवणा धूजै पाहण पूजै बे फरमाई खुदाई, गुरू के चेले के पाए लागै देखो लोग अन्हयायी। काठी कणजो रूपा रेहण, कापड़ मांह छिपाई। नीचा पड़ पड़ तानैं धोकें, धीरा रे हरि आई। ब्राह्मण नाऊं लादण रूड़ा, बूता नाऊं कूता। वै अपहानै पोह बत...

हिन्दी भावार्थ:

शबद संख्या 71 में गुरु जम्भेश्वर जी जोगियों, सिद्धों और बाह्य भेष धारियों को सच्चा योग समझाते हैं। वे सिखाते हैं कि कान छिदवाना, भभूत मलना या वन-कंदराओं में भटकना योग नहीं है, अपितु मन के विकारों को वश में करना और जीव दय...

प्रदर्शित शबद: 1–20 (कुल 120)
01 Raag Bhairav

शब्द 1 — शब्द 1: गुरू चीन्हों गुरू चीन्ह पुरोहित

ओ३म्—गुरू चीन्हों गुरू चीन्ह पुरोहित, गुरू मुख धर्म बखाणी। जो गुरू होयबा सहजे शीले शब्दे नादे वेदे तिहिं गुरू का आंलिकार पिछाणी। छव दरशण जिहिं कै रूपण, थापण, संसार बरतण, निज कर थरप्या, सो गुरू प्रत्यक्ष जाणी। जिहिं कै खर तर गोठ निरोत्तर वाचा, रहिया रूद्र समाधी। गुरू आप संतोखी, अवरां पोषी, तत महारस बाणी। के के अलिया बासण, होत हुताशण, तामैं क्षीर दुहीजूं। रसूवन गोरस, घीय न लीजूं, तहां दूध न पाणी। गुरू ध्याइये रे ज्ञानी, तोड़त मोहा, अति खुरसाणी छीजत लोहा। पाणी छल तेरी खाल पखाला, सतगुरू तोड़े मन का साला। सतगुरू है तो सहज पिछाणी, कृष्ण चरित बिन काचे करवै रहयो न रहसी पाणी।
सच्चे गुरु को पहचानना चाहिए। गुरु वह है जिसके माध्यम से धर्म का वास्तविक ज्ञान प्रकट होता है। सच्चा गुरु सहजता, शील, शब्द, नाद और ज्ञान से पहचाना जाता है। वह संसार के वास्तविक स्वरूप को समझता है और आत्मज्ञान में स्थित रहता है। गुरु संतोषी होता है और दूसरों का पोषण करता है। गुरु की वाणी गहरे आध्यात्मिक ज्ञान से युक्त होती है। ज्ञानी व्यक्ति को गुरु का ध्यान करना चाहिए, क्योंकि सच्चे गुरु का ज्ञान मोह को तोड़ता है और मन के अज्ञान को दूर करता है।
Recognize the true Guru—the Guru who reveals the path of Dharma. A true Guru is recognized through simplicity, discipline, sacred knowledge, inner sound and wisdom. Such a Guru understands the nature of existence and remains established in spiritual realization. The Guru is content and nourishes others through profound wisdom. A seeker should contemplate upon the true Guru, because true spiritual guidance breaks attachment and removes the impurities of the mind.
✦ मुख्य संदेश:

सच्चे गुरु की पहचान बाहरी आडंबर से नहीं, बल्कि ज्ञान, शील, सहजता और धर्म से होती है।

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02 Raag Bhairav

शब्द 2 — शब्द 2: मोरे छाया न माया

ओ३म्—मोरे छाया न माया, लोहू न मांसू, रतूँ न धातूँ। मोरे माई न बापूं, आपण आपू, रोही न रापूं, कोपूं न कलापूं, दुःख न सरापूं। लोई अलोई, व्यूंह तुलोई, ऐसा न कोई जपां भी सोई, जिहिं जंपे आवागवण न होई। मोरी आद न जाणत, महीयल धूंवा बखाणत। उरथ धाकले तसूलूं, अन्नत तो हम रचीलो, हमै सिरजीले से कोण? म्हे जोगी कै भोगी, कै अल्प अहारी, ज्ञानी कै ध्यानी, कै निज कर्म धारी। सोखी कै पोखी, कै जल बिंब धारी, दया धर्म थापले निज बाला ब्रह्मचारी।
यह शब्द उस परम सत्य की ओर संकेत करता है जो सांसारिक माया, शरीर, रिश्तों और भौतिक पहचान से परे है। वह किसी एक सांसारिक संबंध से बंधा हुआ नहीं है। मनुष्य को बाहरी मोह, क्रोध, दुख और अहंकार से ऊपर उठना चाहिए। साधक अपने कर्म, ज्ञान, ध्यान, संयम और दया-धर्म के माध्यम से आत्मिक जीवन को विकसित करे। ब्रह्मचर्य, संयम और धर्म का आधार जीवन को शुद्ध करने वाला है।
This Shabd points toward the ultimate reality beyond worldly illusion, physical identity and ordinary relationships. The seeker is encouraged to rise above attachment, anger, suffering and ego. A spiritual aspirant should cultivate discipline through right action, knowledge, meditation, restraint and compassion. A life grounded in Dharma and self-control becomes a path toward spiritual realization.
✦ मुख्य संदेश:

माया और सांसारिक मोह से ऊपर उठकर ज्ञान, कर्म, संयम और दया-धर्म का जीवन अपनाना चाहिए।

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03 Raag Bhairav

शब्द 3 — शब्द 3: मोरे अंग न अलसी

ओ३म्—मोरे अंग न अलसी, तेल न मलियो, ना परमल पीसियां। जीमत पीवत भोगत बिलसत दीसां नाहीं, म्हापण को आधरूं। अड़सठ तीरथ हिरदा भीतर, बाहर लोका चारूं। नांहिं मोटी जीया जूणी, एती सांस फुरंतै सारूं। बासंदर क्यूं एक भणीजे, जिहिं कै पवन पिराणों। आला सूका मेल्है नाहीं, जिहिं दिशा करै मुहाणों। पापे गुनहे वीहे नाहीं, रीस करै रीसाणों। बहुली दौरे लावण हारूं, भावै जाण मैं जाणूं। न तूं सुरनर, न तूं शंकर, न तूं राव न राणों। काचे पिंड अकाज चलावै, म्हा अधूरत दाणों। मोरे छुरी न धारूं, लोह न सारूं न हथियारूं। सूरज को रिप बिहंडा नाहीं, ताते कहां उठावत भारूं। जिहिं हाकणड़ी बलद जू हाके, न लोहै की आरूं।
मनुष्य को केवल बाहरी तीर्थ, आडंबर और शारीरिक सजावट में सत्य नहीं खोजना चाहिए। वास्तविक तीर्थ हृदय के भीतर है। जीवन क्षणभंगुर है और शरीर नश्वर है, इसलिए आत्मिक सत्य की खोज आवश्यक है। साधक को हिंसा, क्रोध, अहंकार और बाहरी शक्ति के प्रदर्शन से दूर रहना चाहिए। जीवन का उद्देश्य केवल शरीर को चलाना या भौतिक सुख प्राप्त करना नहीं, बल्कि भीतर के सत्य को पहचानना है।
One should not seek spiritual truth merely through external rituals, bodily adornment or pilgrimage. The true sacred place is within the heart. Life is transient and the physical body is impermanent; therefore, the seeker should search for inner truth. The aspirant should remain free from violence, anger, ego and the display of worldly power. The purpose of life is not merely to sustain the body or pursue material pleasure, but to recognize the deeper spiritual reality within.
✦ मुख्य संदेश:

सच्चा तीर्थ बाहर नहीं, भीतर है; आत्मज्ञान बाहरी आडंबर से नहीं बल्कि आंतरिक साधना से प्राप्त होता है।

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04 Raag Bhairav

शब्द 4 — शब्द 4: जद पवन न होता

ओ३म्—जद पवन न होता, पाणी न होता, न होता धर गैंदारूं। चंदन न होता, सूर न होता, न होता गिंगदर तारूं। गऊ न गौरू माया जाल न होता, न होता हेत पियारूं। माय न बाप न बहण न भाई, साख न सैण न होता, न होता पख परवारूं। लख चौरासी जीया जूणी न होती, न होती वणीं अठारा भारूं। सप्त पाताल फूंगींद न होता, न होता सागर खारूं। अजिया सजिया जीया जूणी न होती, न होती कुड़ी भरतारूं। अर्थ न गर्थ न गर्व न होता, न होता तेजी तुरंग तुखारूं। हाट पटण बाजार न होता, न होता राज दवारूं। चाव न चहन न कोह का बांध न होता, तद होता एक निरंजन शंभू, कै होता धंधे कारूं। बात कदो की पूछै लोई, जुग छत्तीस बिचारूं। ताह परैरे अवर छत्तीसूं, पहला अंत न पारूं। म्हे तदपण होता, अब पण आछै, बल-बल होयसा, कह कद कद का करूं विचारूं।
यह शब्द सृष्टि के अस्तित्व और उसके मूल स्वरूप पर विचार करता है। यदि वायु, जल, सूर्य, चंद्रमा, पृथ्वी, जीव-जंतु, परिवार और संसार की विविधता न होती तो यह दिखाई देने वाला संसार भी नहीं होता। सभी परिवर्तनशील वस्तुओं के पीछे एक निराकार और मूल सत्ता की ओर संकेत किया गया है। मनुष्य संसार की उत्पत्ति और उसकी अनंतता को पूरी तरह समझने में सीमित है।
This Shabd reflects upon existence and the origins of the manifested world. Without air, water, the sun, moon, earth, living beings, relationships and the many forms of creation, the visible world would not exist. Behind all these changing forms lies the reference to a formless and fundamental reality. Human understanding remains limited when attempting to comprehend the vastness and origins of existence.
✦ मुख्य संदेश:

संसार परिवर्तनशील है; उसके पीछे स्थित मूल और निराकार सत्य को समझना ही वास्तविक आध्यात्मिक चिंतन है।

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05 Raag Bhairav

शब्द 5 — शब्द 5: अइया लो अपरंपर बाणी

ओ३म्—अइया लो अपरंपर बाणी, म्हे जपां न जाया जीऊं। नवअवतार नमोनारायण, तेपण रूप हमारा थीयूं। जती तपी तक पीर ऋषेश्वर, कांय जपीजै तेपण जाया जीऊं। खेचर भूचर खेपाला परगट गुस्सा, कांय जपीजै तेपण जाया जीऊं। वासंग शेष गुगिंदा फूणिंदा, कांय जपीजै तेपण जाया जीऊं। चौसठ जोगिन बावन वीरूं, कांय जपीजै तेपण जाया जीऊं। जपां तो एक निरालंभ शंभू, जिहिं कै माई न पीऊं। न तन रकूं, न तन धातूं, न तन ताव न सीऊं। सर्व सिरजत, मरत बिवरजत, तासूं मूलज लेहां कीयूं। अइयालों अपरंपर बाणी, म्हे जपां न जाया जीऊं।
यहाँ अनंत और अपरंपार सत्ता की वाणी का वर्णन है। अनेक रूपों, अवतारों, योगियों, ऋषियों और देव-परंपराओं के बीच साधक उस एक निरालंब, मूल और सर्वोच्च सत्ता की ओर संकेत करता है। वह सत्ता किसी एक शरीर, जाति, रूप या भौतिक सीमा में बंधी नहीं है। समस्त सृष्टि की उत्पत्ति और परिवर्तन उसी मूल सत्य के संदर्भ में समझे जाते हैं।
This Shabd speaks of the infinite and boundless Divine Reality. Amid countless forms, incarnations, sages, yogis and divine traditions, the seeker points toward the one fundamental, independent and supreme reality. That reality is not confined to a particular body, form or physical limitation. The origin and transformation of creation are understood in relation to this fundamental truth.
✦ मुख्य संदेश:

अनेक रूपों के पीछे एक मूल, निरालंब और अपरंपार सत्य को पहचानना चाहिए।

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06 Raag Asavari

शब्द 6 — शब्द 6: भवन भवन म्हे एका जोती

ओ३म्—भवन भवन म्हे एका जोती, चुण चुण लीया रतना मोती। म्हे खोजी थापन होजी नाहीं, खोज लहां धुर खोजूं। अलख अलेख अडाल अजोनिं स्वयंभू, जिहिं का किसा बिनाणी। म्हे सरे न बैठा सीख न पूछी, निरत सुरत सब जाणी। उतपति हिंदू जरना जोगी, किरिया ब्राह्मण, दिल दरवेंसां, उन मुन मुल्ला, अकळ मिसलमानी।
एक ही दिव्य ज्योति विभिन्न रूपों में दिखाई देती है। साधक उस सत्य को खोजता है जो अलख, अलेख, स्वयंभू और जन्म-मरण से परे है। यह सत्य केवल किसी एक धार्मिक पहचान तक सीमित नहीं है। विभिन्न धार्मिक और आध्यात्मिक परंपराओं के भीतर भी सत्य की खोज दिखाई देती है।
One Divine Light manifests through countless forms. The seeker searches for the Reality that is beyond ordinary description, self-existent and beyond birth and death. This truth is not confined to a single religious identity. The search for spiritual reality can be found within different religious and contemplative traditions.
✦ मुख्य संदेश:

एक परम सत्य अनेक रूपों और परंपराओं के पार विद्यमान है।

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07 Raag Asavari

शब्द 7 — शब्द 7: हिंदू होय कै हरि क्यूं ना जंप्यो

ओ३म्—हिंदू होय कै हरि क्यूं ना जंप्यो, कांय दहदिशा दिल परसरायों। सोम अमावस आदित वारी, कांय काटी बनरायों। गहण गहंतै, बहण बहंतै, निर्जल प्यारस मूल बंधते, कांयरे मुरखा तैं पालंग सेज निहाल बिछाई। जादिन तेर होम न जाप न तप किरिया, जांण कै भागी कपिला गई। कूड़तणों जे करतब कीयो, नातें लाव न सायों। भूला प्राणी आल बखाणी, न जंप्यो सुर रायों। छंदे कहां तो बहुता भावै, खरतऱ को पतियायों। हिव की बेलां हिय न जायों, शंक रह्यो कंदरायों। ठाढी बेला ठार न जायों, ताती बेलां तायों। बिंबे बेलां विष्णु न जंप्यो, ताछे का चीन्हों कछु कमायों। अति आलस भोला वै भूला, न चीन्हो सुररायों। पारब्रह्म की सुध न जाणीं, तो नागे जोग न पायों।
मनुष्य को केवल अपनी धार्मिक पहचान पर निर्भर नहीं रहना चाहिए, बल्कि अपने भीतर परम सत्य की खोज करनी चाहिए। केवल बाहरी पूजा, कर्मकांड, व्रत या धार्मिक दिखावा पर्याप्त नहीं है। अज्ञान, आलस्य और गलत कर्म मनुष्य को वास्तविक आध्यात्मिक लक्ष्य से दूर कर देते हैं। परम सत्य की पहचान के लिए जागरूकता, साधना और सही आचरण आवश्यक हैं।
A person should not rely merely upon religious identity but should seek the Divine Reality within. External worship, ritual, fasting or religious appearance alone is not sufficient. Ignorance, laziness and improper actions lead one away from the true spiritual goal. Awareness, sincere practice and righteous conduct are necessary for recognizing the Supreme Reality.
✦ मुख्य संदेश:

धार्मिक पहचान से अधिक महत्वपूर्ण है वास्तविक साधना, जागरूकता और सही आचरण।

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08 Raag Asavari

शब्द 8 — शब्द 8: सुण रे काजी, सुण रे मुल्ला

ओ३म्—सुण रे काजी, सुण रे मुल्ला, सुण रे बकर कसाई। किणरी थरपी, छाली रोसो, किणरी गाडर गाई। सूळ चुंभीजे, करक दुहेली, तो हंै हंै जायो जीव न भाई। थे तुरकी छुरकी, भिस्ती दावो, खायबा खाज अखाजूं। चर फिर आवै, सहज दुहावै, तिसका खीर हलाली। जिसकै गले करद क्यूं सारो, थे पढ़ सुण रहिया खाली।
यह शब्द जीवों पर होने वाली हिंसा और उसके धार्मिक औचित्य पर प्रश्न उठाता है। जीवित प्राणी को मारकर प्राप्त भोजन या धार्मिक कर्म को केवल नाम बदलकर उचित नहीं ठहराया जा सकता। जीवों के प्रति करुणा और अहिंसा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। बाहरी धार्मिक शब्दावली के बजाय कर्म की वास्तविक प्रकृति को देखना आवश्यक है।
This Shabd questions violence against living beings and the attempt to justify it through religious terminology. Taking the life of a living creature cannot be made righteous merely by giving the act a religious name. Compassion and non-violence toward living beings should be given priority. One should examine the true nature of an action rather than relying upon external religious terminology.
✦ मुख्य संदेश:

जीव-दया और अहिंसा को धार्मिक आडंबर से ऊपर रखना चाहिए।

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09 Raag Asavari

शब्द 9 — शब्द 9: दिल साबित हज काबो नेड़ो

ओ३म्—दिल साबित हज काबो नेड़ो, क्या उलंबग पुकारो। भाई नाऊं बलद पियारो, ताकै गले करद क्यूं सारो। बिन चीन्हैं खुदाय बिबरजत, केहा मुसलमानो। काफर मुकर होयकर राह गुमायो, जोय जोय गाफल करै धिंगाणों। ज्यू थे पश्चिम दिशा उलंबग पुकारो, भलजे यों चीन्हों रहमानों। तो रूख चलते पिंड पड़ते, आवै भिस्त बिमाणों। चढ़ चढ़ भींते मड़ी मसिते, क्या उलंबग पुकारो। कांहे काजे गऊ बिनासो, तो करीम गऊ क्यूं चारी। काहीं लीयूं दूध दहींयू, काहीं लीयूं धीऊं महीयू, काहीं लीयूं हाडू मांसूं, काहीं लीयूं रतूं रुहियूं। सुपणे काजी सुपणे मुल्लां, यामैं कौण भया मुरदारूं। जीवा ऊपर जोर करीजै, अंतकाल होयसी भारूं।
परमात्मा को केवल किसी बाहरी तीर्थ, दिशा या धार्मिक स्थान में खोजने के बजाय हृदय में पहचानना चाहिए। यदि मनुष्य ईश्वर को पहचानने का दावा करता है, तो उसे जीवों पर हिंसा नहीं करनी चाहिए। जीवित प्राणियों पर बलपूर्वक अत्याचार करके धार्मिकता का दावा करना आत्मविरोधी है। करुणा और अहिंसा के बिना धार्मिक कर्मकांड अधूरे हैं।
The Divine should not be sought merely through an external pilgrimage, direction or sacred place; the seeker should recognize the Divine within the heart. If one claims to know God, one should not commit violence against living beings. Claiming religious righteousness while using force against living creatures is contradictory. Without compassion and non-violence, external religious practices remain incomplete.
✦ मुख्य संदेश:

ईश्वर की सच्ची पहचान जीव-दया में दिखाई देती है; हिंसा के साथ धर्म का दावा खोखला हो जाता है।

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10 Raag Asavari

शब्द 10 — शब्द 10: बिस्मिल्ला रहमान रहीम

ओ३म्—बिस्मिल्ला रहमान रहीम, जिहिं कै सदकै भीना भीन। तो भेटीलो रहमान रहीम, करीम काया दिल करणी। कलमा करतब कौल कुराणों। दिल खोजो दरवेश भईलो, तइया मुसलमानों। पीरां पूरषां जमी मुसलां, करतब लेक सलामों। हम दिल लिल्हा, तुम दिल लिल्हा, रहम करैं रहमाणों। इतने मिसले, चालो मियां, तो पावो भिस्त ईमानों।
ईश्वर के नाम का स्मरण केवल शब्दों में नहीं होना चाहिए। रहमान और रहीम के प्रति सच्ची श्रद्धा का अर्थ है कि मनुष्य अपने हृदय और आचरण को भी दया और करुणा से भर दे। धार्मिक शब्द, कलमा, कुराण या सलाम तभी सार्थक हैं जब उनका प्रभाव व्यक्ति के व्यवहार में दिखाई दे। अपने हृदय को खोजकर दया और ईमानदारी का जीवन जीना ही वास्तविक धार्मिकता है।
Remembering the name of the Merciful should not remain merely verbal. True devotion to the Merciful and Compassionate should transform the heart and conduct of the seeker. Religious words, declarations of faith, scripture and greetings become meaningful when they are reflected in one's actions. One should search within the heart and live with compassion, sincerity and faith.
✦ मुख्य संदेश:

सच्ची धार्मिकता केवल शब्दों में नहीं, बल्कि दया, करुणा और आचरण में प्रकट होती है।

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11 Raag Ramkali

शब्द 11 — शब्द 11: दिल साबित हज काबो नेड़ो (सीने सरवर)

ओ३म्—दिल साबित हज काबो नेड़ो, क्या उलंबग पुकारो। सीने सरवर करो बंदगी, हक निवाज गुजारो। इहि हेडे हरदिन की रोजी, तो इसही रोजी सारो। आप खुदाबंद लेखो मांगै, रे बिनही गुनहें जीव क्यूं मारो। थे तक जांणो तकपीड़ न जांणो, बिन परचै बाद निवाज गुजारो। चर फिर आवै सहज दुहावे, जिसका खीर हलाली। तिसकै गले करद क्यूं सारो, थे पढ़ सुण रहिया खाली। थे चढ़ चढ़ भींते मड़ी मसीते, क्या उलंबग पुकारो। कारण खोटा करतब हींणा, थारी खाली पड़ी नमाजूं। किहिं ओजूं तुम धोवो आप, किहिं ओजूं तुम खंडो पाप। किहिं ओजूं तुम धरो धियान, किहिं ओजूं चीन्हों रहमान। रे मुल्ला मन मांहि मसीत नमाज गुजारिये, सुणता ना क्या खरे पुकारिये। अलख न लिखियो खलक पिछाण्यो, चांम कटे क्या हुय्यो। हक हलाल पिछाण्यों नाहीं, तो निश्चै गाफिल दोरै दीयों।
सच्ची इबादत केवल बाहरी तीर्थ, मस्जिद या नमाज़ की औपचारिकता में नहीं है। ईश्वर को हृदय में पहचानना और अपने कर्मों को सही रखना आवश्यक है। यदि व्यक्ति एक ओर ईश्वर की बंदगी करता है और दूसरी ओर जीवों पर हिंसा करता है, तो उसके धार्मिक कर्मकांड का वास्तविक उद्देश्य पूरा नहीं होता। सच्ची धार्मिकता हक, हलाल, करुणा और सही आचरण से जुड़ी है।
True devotion is not limited to external pilgrimage, sacred places or formal prayer. The Divine must be recognized within the heart, and one's actions must reflect righteousness. If a person worships God while causing violence to living beings, the deeper purpose of religious practice remains unfulfilled. True faith is expressed through righteous conduct, compassion and respect for life.
✦ मुख्य संदेश:

इबादत का मूल्य केवल बाहरी कर्मकांड में नहीं, बल्कि हृदय और कर्म की शुद्धता में है।

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12 Raag Ramkali

शब्द 12 — शब्द 12: महंमद-महंमद न कर काजी

ओ३म्—महंमद-महंमद न कर काजी, महंमद का तो विषम विचारूं। महंमद हाथ करद जो होती, लोहे घड़ी न सारूं। महंमद साथ पयंबर सीधा, एक लख असी हजारूं। महंमद मरद हलाली होता, तुम ही भये मुरदारूं।
यह शब्द धार्मिक नाम के केवल उच्चारण के बजाय उसके वास्तविक अर्थ और आचरण पर विचार करने की ओर संकेत करता है। धार्मिक महान व्यक्तित्वों का नाम लेने मात्र से धर्म की सार्थकता नहीं होती; उनके बताए हुए नैतिक आचरण को अपनाना आवश्यक है।
This Shabd directs attention away from merely repeating a religious name and toward understanding its deeper meaning and living according to righteous conduct. Simply invoking the name of a revered religious figure does not by itself constitute true religious practice; the ethical principles associated with faith must be reflected in one's actions.
✦ मुख्य संदेश:

नाम-स्मरण के साथ उसके मूल आचरण और नैतिक संदेश को जीवन में उतारना आवश्यक है।

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13 Raag Ramkali

शब्द 13 — शब्द 13: कांयरे मुरखा, तैं जन्म गुमायों

ओ३म्—कांयरे मुरखा, तैं जन्म गुमायों, भुंय भारी ले भारूं। जादिन तेरे होमने, जपने, तपने, किरिया, गुरु न चीन्हों पंथ न पायों, अहल गई जमवारूं। ताती बेला ताव न जायों, ठाढ़ी बेला ठारूं। बिंबे बेला विष्णु न जंप्यो, ताते बहुत भई कसवारूं। खरी न खाटी देह बिणाड़ी, थिर न पवना पारूं। अहनिश आव घटती जासी, पाछे कौन पुकारूं।
मनुष्य को अपना जीवन व्यर्थ नहीं गंवाना चाहिए। केवल होम, जप, तप और कर्मकांड करने से आध्यात्मिक लक्ष्य प्राप्त नहीं होता, यदि सच्चे गुरु और सही मार्ग की पहचान न हो। जीवन निरंतर घट रहा है। मृत्यु आने के बाद पश्चाताप या पुकार का अवसर नहीं रहेगा। इसलिए जीवित रहते हुए सत्य, गुरु और धर्म के मार्ग को पहचानना चाहिए।
A person should not waste the precious opportunity of human life. Rituals, chanting and austerities alone are insufficient if one has not recognized the true Guru and the right spiritual path. Life is continually diminishing. Once death arrives, there may be no opportunity for regret or correction. Therefore, one should recognize truth, the Guru and Dharma while alive.
✦ मुख्य संदेश:

जीवन क्षणभंगुर है—सत्य और गुरु के मार्ग को समय रहते पहचानना चाहिए।

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14 Raag Ramkali

शब्द 14 — शब्द 14: मोरा उपख्यान वेदूं

ओ३म्—मोरा उपख्यान वेदूं, कूंण तंत भेंदूं, शास्त्रे पुस्तके लिखणा न जाई। मेरा शब्द खोजो, ज्यूं शब्दे शब्द समाई। हिरणा दोह क्यूं हिरण हतलीं, कृष्ण चरित बिन क्यूं बाघ विडारत गाई। सुनही सुनहा का जाया, मुर्दा बघेरी बघेरा न होयबा, कृष्ण चरित बिन। सींचाण कबहूं न सुजीऊं। खर का शब्द न मधुरी बाणी, कृष्ण चरित बिन, ज्ञान न कबहूं गहींरूं। मुंडी का जाया, मुंडा न होयबा, कृष्ण चरित बिन, रीछां कबहूं न सुचीलूं। बिल्ली की इंद्री संतोष न होयबा, कृष्ण चरित बिन, काफरा न होयबा लींलूं। मुरगी का जाया मोरा न होयबा, कृष्ण चरित बिन, भाकला न होयबा चीरूं। दंत बिवाई जन्म न आई, कृष्ण चरित बिन, लोहे पड़े न काठ की सूळूं। नींबड़िये नारेल न होयबा, कृष्ण चरित बिन, छिलरे न होयबा हीरूं। तूंवण नागर बेल न होयबा, कृष्ण चरित बिन, बावली न केली केलूं। गऊ का जाया खगा न होयबा, कृष्ण चरित बिन, दया न पालतो भीलूं। सूरी का जाया हस्ती न होयबा, कृष्ण चरित बिन, ओछा कबहीं न पूरूं। कागण का जाया कोकला न होयबा, कृष्ण चरित बिन, बुगली न जनिबा हंसूं। ज्ञानी कै हृदय प्रमोद आवत, अज्ञानी लागत डांसूं।
यह शब्द ज्ञान की गहराई और गुरु-वाणी के महत्व की ओर संकेत करता है। केवल पुस्तकों और शास्त्रों में लिखे हुए ज्ञान को जान लेना पर्याप्त नहीं; वास्तविक ज्ञान को अनुभव और आचरण में उतारना आवश्यक है। 'कृष्ण चरित' का संदर्भ यहाँ उस आदर्श आचरण/दिव्य चरित्र की ओर संकेत करता है, जिसके बिना केवल बाहरी रूप या नाम वास्तविक परिवर्तन नहीं ला सकते। ज्ञानी व्यक्ति इस सत्य को समझकर आनंद प्राप्त करता है, जबकि अज्ञानी बाहरी रूपों में उलझा रहता है।
This Shabd points toward the depth of spiritual knowledge and the importance of the Guru's word. Merely knowing what is written in books and scriptures is not sufficient; true knowledge must be experienced and reflected in conduct. The reference to “Krishna Charit” points toward the ideal spiritual character and conduct through which knowledge becomes meaningful. The wise recognize this truth, while the ignorant remain caught in external appearances.
✦ मुख्य संदेश:

पुस्तकीय ज्ञान से आगे बढ़कर ज्ञान को चरित्र और आचरण में उतारना आवश्यक है।

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15 Raag Sorath

शब्द 15 — शब्द 15: सुरमा लेगण झीणां शब्दूं

ओ३म्—सुरमा लेगण झीणां शब्दूं, म्हे भूल न भाख्या थूंलूं। सो पति बिरछा सींच प्राणी, जिहिंका मीठा मूल समूलूं। पाते भूला मूल न खोजे, सींचै कांय कु मूलूं। विष्णु-विष्णु भण अजर जरीजे, यह जीवन का मूलूं। खोज प्राणी ऐसा बिनाणी, केवल ज्ञानी, ज्ञान गहींरूं। जिहिं कै गुणे न लाभत छेहूं, गुरु गेंवर गरवा शीतल नीरूं। मेवा ही अति मेड़ूं। हृदयै मुक्ता कमल संतोषी, टेवा ही अति तेजूं। चढ़ कर बोहितां भव जल पार लंघावे, सो गुरु खेवर खेवा खेहूं।
मनुष्य को जीवन के मूल को खोजना चाहिए। जैसे वृक्ष को केवल पत्तों से नहीं, बल्कि उसकी जड़ों को सींचने से पोषण मिलता है, उसी प्रकार आध्यात्मिक जीवन का मूल भीतर के ज्ञान और साधना में है। सच्चा गुरु उस नाविक के समान है जो संसाररूपी भवसागर को पार कराने में मार्गदर्शन करता है। संतोष, ज्ञान और गुरु की शीतल वाणी साधक के जीवन को दिशा देती है।
A person should seek the root of life. Just as a tree is nourished by watering its roots rather than merely its leaves, spiritual life must be nourished at its inner foundation through knowledge and practice. The true Guru is like a boatman who guides the seeker across the ocean of worldly existence. Contentment, wisdom and the Guru's cooling guidance provide direction to the spiritual seeker.
✦ मुख्य संदेश:

मूल को सींचना ही वास्तविक साधना है; सच्चा गुरु भवसागर पार करने का मार्ग दिखाता है।

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16 Raag Sorath

शब्द 16 — शब्द 16: लोहे हंता कंचन घड़ियां

ओ३म्—लोहे हंता कंचन घड़ियां, घड़ियां ठाम सुड़ाऊं। जातां हंता पात करीलूं, यह कृष्ण चरित परिवारूं। बेड़ी काठ संजोगे मिलिया, खेवर खेवा खेहूं। लोहा नीर किसी विधि तरिया, उत्तम संग सनेहूं। बिन किरिया रथ बैसेंला, ज्यूं काठ संगीन लोहा नीर तरीलूं। नांगड़ भागड़ भूला महियल, जीव हंते मड़ खाईलूं।
यहाँ लोहे और लकड़ी के उदाहरण के माध्यम से संगति और उचित मार्गदर्शन का महत्व बताया गया है। जो वस्तु अपने बल पर नहीं तैर सकती, वह उचित साधन और संगति के कारण पार जा सकती है। इसी प्रकार मनुष्य भी अच्छे मार्ग, सही संगति और गुरु के मार्गदर्शन से जीवन के कठिन भवसागर को पार कर सकता है।
Through the imagery of iron, wood and a boat, this Shabd emphasizes the importance of right association and guidance. Something that cannot float by itself may cross the water when supported by the right vessel. Similarly, a person can cross the difficulties of worldly existence through good company, righteous conduct and the guidance of the Guru.
✦ मुख्य संदेश:

सत्संग, सही साधन और गुरु-मार्गदर्शन मनुष्य को कठिनाइयों से पार ले जा सकते हैं।

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17 Raag Sorath

शब्द 17 — शब्द 17: मोरे सहजै सुंदर, लोतर बाणी

ओ३म्—मोरे सहजै सुंदर, लोतर बाणी, ऐसो भयो मन ज्ञानी। तइया सासू, तइया मासूं, रतूं रूहीयू। खीरूं नीरूं, ज्यूं कर देखूं, ज्ञान अंदेसूं। भूला प्राणी कहै सो करणी। अड़ अगाणी, तत समाणी, अइया लो म्हे पुरुष न लेणा नारी। सो दत सागर सो सुघ्यागत, भवन-भवन भिखियारी। भिखियारी लो भिखियारी लो, जे आदि परम तत लाधो। जाके बाद बिराम विरांसो सांसों, ताने कौन कहसी साहिल्या साधु।
ज्ञान प्राप्त होने पर मनुष्य की दृष्टि सहज और सुंदर हो जाती है। वह बाहरी भेदों के बजाय जीवन के मूल तत्व को पहचानने लगता है। संसार में भटकते हुए मनुष्य को उस परम तत्व की खोज करनी चाहिए। जब वह मूल सत्य को पा लेता है, तब बाहरी पहचान और भटकाव का महत्व कम हो जाता है।
When wisdom arises, the mind becomes simple, clear and refined. The seeker begins to recognize the fundamental reality rather than becoming lost in external distinctions. A person wandering through the world should seek the ultimate truth. Once that fundamental reality is realized, superficial identities and worldly wandering lose their importance.
✦ मुख्य संदेश:

ज्ञान मनुष्य की दृष्टि को बाहरी भेदों से उठाकर मूल सत्य की ओर ले जाता है।

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18 Raag Sorath

शब्द 18 — शब्द 18: जांकुंछ जांकुंछ, जां कछु न जाणी

ओ३म्—जांकुंछ जांकुंछ, जां कछु न जाणी। नांकुंछ नांकुंछ, तां कछु जाणी। नांकुंछ नांकुंछ अकथ कहाणी, नांकुंछ नांकुंछ अमृत बाणी। ज्ञानी सो तो ज्ञानी रोवत, पढ़िया रोवत गाहे। केवल करतब मोरी मोरा रोवत, जोय जोय पगं दिखाही। उरध खेंपी मन उन्मन रोवत, मुरखां रोवत धाहीं। मरणत माथ संसारत खेती, कै कै अवतारी रोवत राही। जड़िया बूंठी जे जग जीवै, तो बेदां क्यूं मर जाही। खोज पीरांगी ऐसा बिनाणी, नुगरा खोजत नाहीं। जां कछु होता, ना कछु होयसी, बल कछु होयसी ताहीं।
यह शब्द उस सत्य की ओर संकेत करता है जिसे साधारण शब्दों में पूरी तरह व्यक्त नहीं किया जा सकता। मनुष्य जितना जानता है, उससे कहीं अधिक अज्ञात उसके सामने है। अज्ञान, मृत्यु, संसार की परिवर्तनशीलता और जीवन की अस्थिरता के बीच साधक को सत्य की खोज करते रहना चाहिए। जो आज दिखाई देता है वह बदलने वाला है; इसलिए मूल और स्थायी सत्य की पहचान आवश्यक है।
This Shabd points toward a reality that cannot be fully expressed through ordinary words. What human beings know is limited compared with what remains unknown. Amid ignorance, mortality, change and the impermanence of worldly existence, the seeker should continue searching for truth. What appears today is subject to change; therefore, recognizing the fundamental and enduring reality is essential.
✦ मुख्य संदेश:

संसार परिवर्तनशील और ज्ञान सीमित है; इसलिए साधक को अकथ और मूल सत्य की खोज करनी चाहिए।

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19 Raag Asa

शब्द 19 — शब्द 19: रूप अरूप रमूं, पिंडे ब्रह्मांडे

ओ३म्—रूप अरूप रमूं, पिंडे ब्रह्मांडे, घट घट अघट रहायों। अनंत जुगां में अमर भणिजूं, ना मेरे पिता न मायों। ना मेरे माया, न छाया, रूप न रेखा, बाहर भीतर अगम अलेखा। लेखा एक निरंजन लेसी, जहां चीन्हों, तहां पायों। अड़सठ तीर्थ, हिरदा भीतर, कोई कोई गुरुमुख बिरला न्हायो।
परम सत्य रूप और अरूप दोनों की सीमाओं से परे है। वह प्रत्येक शरीर और समस्त ब्रह्मांड में व्याप्त है, फिर भी उसे किसी एक रूप या रेखा से सीमित नहीं किया जा सकता। बाहरी तीर्थों की अपेक्षा हृदय के भीतर स्थित आध्यात्मिक तीर्थ को पहचानना महत्वपूर्ण है। बहुत विरले गुरुमुख ही इस आंतरिक सत्य में स्नान अर्थात उसका वास्तविक अनुभव कर पाते हैं।
The ultimate Reality transcends the distinction between form and formlessness. It is present within every being and throughout the universe, yet it cannot be confined to a particular shape or boundary. Beyond external pilgrimage lies the inner sacred reality within the heart. Only rare seekers guided by the Guru truly experience this inner pilgrimage.
✦ मुख्य संदेश:

परम सत्य सर्वव्यापी है; वास्तविक तीर्थ अंतर्मन में है।

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20 Raag Asa

शब्द 20 — शब्द 20: जां जां दया न मया

ओ३म्—जां जां दया न मया, तां तां बिकरम कया। जां जां आव न वैंसूं, तां तां सुरग न जैसूं। जां जां जीव न जोती, तां तां मोख न मुक्ति। जां जां दया न धर्मूं, तां तां बिकरम कर्मूं। जां जां पाले न शीळूं, तां तां कर्म कुचीलूं। जां जां खोज्या न मूलूं, तां तां प्रत्यक्ष थूलूं। जां जां भेदा न भेदूं, तो सुरगे किस उमेदूं। जां जां धमंडै से धमंडूं, ताकै तावन छायो, सूते सांस नसायों।
जहाँ दया नहीं है, वहाँ धर्म नहीं है। जहाँ जीव के प्रति प्रकाश और करुणा नहीं है, वहाँ मुक्ति की वास्तविक दिशा नहीं मिलती। मनुष्य को शील, दया, धर्म और मूल सत्य की खोज करनी चाहिए। अहंकार और गलत कर्म आत्मिक उन्नति में बाधा बनते हैं।
Where compassion is absent, true Dharma is absent. Without reverence and compassion toward living beings, there can be no genuine path toward liberation. A person should cultivate discipline, compassion, Dharma and the search for the fundamental truth. Ego and improper actions obstruct spiritual growth.
✦ मुख्य संदेश:

दया, धर्म, शील और मूल सत्य की खोज आध्यात्मिक जीवन के आधार हैं।

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