श्री गुरु जाम्भोजी महाराज के 29 पावन नियम
उनतीस नियम (विश्नोई धर्म की आचार संहिता)
कार्तिक सुदी अष्टमी संवत् 1542 (ई. 1485) को गुरु जाम्भोजी महाराज ने समराथल धोरे पर पाहल बनाकर विश्नोई धर्म की स्थापना की और ये उनतीस नियम दिए। इनमें पर्यावरण सुरक्षा, जीव दया, व्यक्तिगत शुद्धि और ईश्वर भक्ति का दिव्य समन्वय है।
पानी छानकर पीना और वाणी शुद्ध बोलना
सूक्ष्म जीवों की रक्षा हेतु जल छानकर पीना और दूसरों के कल्याण हेतु मधुर व सत्य वाणी बोलना।
लकड़ी बीनकर और झाड़कर जलाना
ईंधन की लकड़ी को झाड़-पोंछकर देखना ताकि उसमें छिपे कीट-पतंगे अग्नि में न जलें।
दया का भाव रखना
प्रत्येक प्राणी के प्रति दया, करुणा और आत्मीयता का व्यवहार करना।
जीवों पर दया करना और उनकी रक्षा करना
मूक प्राणियों को शरण देना और शिकारियों से उनकी रक्षा हेतु तत्पर रहना।
हरा वृक्ष कभी नहीं काटना
हरे-भरे वृक्षों को काटना महापाप है। केवल गिरी हुई सूखी लकड़ियों का ही उपयोग करना।
बैल व पशुओं को शरण देना
वृद्ध, असहाय पशुओं को कसाईयों से बचाकर गौशालाओं में आजीवन संरक्षण देना।
बैलों का बधियाकरण न करना
पशुओं को क्रूर यातना देकर उनका बधियाकरण न करना।
मांसाहार का पूर्ण त्याग
सभी जीवों को अपना बंधु मानकर मांसाहार का सर्वथा परित्याग करना।
नीले रंग के वस्त्र न पहनना
नीले वस्त्रों का त्याग, क्योंकि ऐतिहासिक रूप से नील के निर्माण में अनगिनत हरे वृक्ष व जल नष्ट होता था।