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शब्द वाणी के पद 2 ('शब्द 2: मोरे छाया न माया') में गुरु जाम्भोजी ने साधक को किस अंतःकरण वृत्ति को त्यागने का निर्देश दिया है?
पद 2 (शब्द 2: मोरे छाया न माया, Raag Bhairav) में गुरु जाम्भोजी महाराज ने स्पष्ट किया है कि: काम, क्रोध, मद, लोभ व मिथ्या अहंकार का त्याग।
शब्द वाणी के पद 4 ('शब्द 4: जद पवन न होता') में गुरु जाम्भोजी ने साधक को किस अंतःकरण वृत्ति को त्यागने का निर्देश दिया है?
पद 4 (शब्द 4: जद पवन न होता, Raag Bhairav) में गुरु जाम्भोजी महाराज ने स्पष्ट किया है कि: काम, क्रोध, मद, लोभ व मिथ्या अहंकार का त्याग।
शब्द वाणी के पद 6 ('शब्द 6: भवन भवन म्हे एका जोती') में गुरु जाम्भोजी ने साधक को किस अंतःकरण वृत्ति को त्यागने का निर्देश दिया है?
पद 6 (शब्द 6: भवन भवन म्हे एका जोती, Raag Asavari) में गुरु जाम्भोजी महाराज ने स्पष्ट किया है कि: काम, क्रोध, मद, लोभ व मिथ्या अहंकार का त्याग।
शब्द वाणी के पद 8 ('शब्द 8: सुण रे काजी, सुण रे मुल्ला') में गुरु जाम्भोजी ने साधक को किस अंतःकरण वृत्ति को त्यागने का निर्देश दिया है?
पद 8 (शब्द 8: सुण रे काजी, सुण रे मुल्ला, Raag Asavari) में गुरु जाम्भोजी महाराज ने स्पष्ट किया है कि: काम, क्रोध, मद, लोभ व मिथ्या अहंकार का त्याग।
शब्द वाणी के पद 10 ('शब्द 10: बिस्मिल्ला रहमान रहीम') में गुरु जाम्भोजी ने साधक को किस अंतःकरण वृत्ति को त्यागने का निर्देश दिया है?
पद 10 (शब्द 10: बिस्मिल्ला रहमान रहीम, Raag Asavari) में गुरु जाम्भोजी महाराज ने स्पष्ट किया है कि: काम, क्रोध, मद, लोभ व मिथ्या अहंकार का त्याग।
शब्द वाणी के पद 12 ('शब्द 12: महंमद-महंमद न कर काजी') में गुरु जाम्भोजी ने साधक को किस अंतःकरण वृत्ति को त्यागने का निर्देश दिया है?
पद 12 (शब्द 12: महंमद-महंमद न कर काजी, Raag Ramkali) में गुरु जाम्भोजी महाराज ने स्पष्ट किया है कि: काम, क्रोध, मद, लोभ व मिथ्या अहंकार का त्याग।
शब्द वाणी के पद 14 ('शब्द 14: मोरा उपख्यान वेदूं') में गुरु जाम्भोजी ने साधक को किस अंतःकरण वृत्ति को त्यागने का निर्देश दिया है?
पद 14 (शब्द 14: मोरा उपख्यान वेदूं, Raag Ramkali) में गुरु जाम्भोजी महाराज ने स्पष्ट किया है कि: काम, क्रोध, मद, लोभ व मिथ्या अहंकार का त्याग।
शब्द वाणी के पद 16 ('शब्द 16: लोहे हंता कंचन घड़ियां') में गुरु जाम्भोजी ने साधक को किस अंतःकरण वृत्ति को त्यागने का निर्देश दिया है?
पद 16 (शब्द 16: लोहे हंता कंचन घड़ियां, Raag Sorath) में गुरु जाम्भोजी महाराज ने स्पष्ट किया है कि: काम, क्रोध, मद, लोभ व मिथ्या अहंकार का त्याग।
शब्द वाणी के पद 18 ('शब्द 18: जांकुंछ जांकुंछ, जां कछु न जाणी') में गुरु जाम्भोजी ने साधक को किस अंतःकरण वृत्ति को त्यागने का निर्देश दिया है?
पद 18 (शब्द 18: जांकुंछ जांकुंछ, जां कछु न जाणी, Raag Sorath) में गुरु जाम्भोजी महाराज ने स्पष्ट किया है कि: काम, क्रोध, मद, लोभ व मिथ्या अहंकार का त्याग।
शब्द वाणी के पद 20 ('शब्द 20: जां जां दया न मया') में गुरु जाम्भोजी ने साधक को किस अंतःकरण वृत्ति को त्यागने का निर्देश दिया है?
पद 20 (शब्द 20: जां जां दया न मया, Raag Asa) में गुरु जाम्भोजी महाराज ने स्पष्ट किया है कि: काम, क्रोध, मद, लोभ व मिथ्या अहंकार का त्याग।
पद संख्या 22 ('शब्द 22: लो लो रे राजिंदर रायों') में वर्णित 'अमर पद' की प्राप्ति हेतु कौन सा साधन सर्वश्रेष्ठ प्रतिपादित है?
पद 22 (शब्द 22: लो लो रे राजिंदर रायों, Raag Dhanasari) में गुरु जाम्भोजी महाराज ने स्पष्ट किया है कि: सत्य आचरण, संयमित जीवन एवं परमात्मा का अनन्य ध्यान।
पद संख्या 24 ('शब्द 24: आसण बैसण कूड़ कपटण') में वर्णित 'अमर पद' की प्राप्ति हेतु कौन सा साधन सर्वश्रेष्ठ प्रतिपादित है?
पद 24 (शब्द 24: आसण बैसण कूड़ कपटण, Raag Dhanasari) में गुरु जाम्भोजी महाराज ने स्पष्ट किया है कि: सत्य आचरण, संयमित जीवन एवं परमात्मा का अनन्य ध्यान।
पद संख्या 26 ('शब्द 26: घण तण जीम्या, को गुण नाहीं') में वर्णित 'अमर पद' की प्राप्ति हेतु कौन सा साधन सर्वश्रेष्ठ प्रतिपादित है?
पद 26 (शब्द 26: घण तण जीम्या, को गुण नाहीं, Raag Bilawal) में गुरु जाम्भोजी महाराज ने स्पष्ट किया है कि: सत्य आचरण, संयमित जीवन एवं परमात्मा का अनन्य ध्यान।
पद संख्या 28 ('शब्द 28: मछली मच्छ फिरै जल भीतर') में वर्णित 'अमर पद' की प्राप्ति हेतु कौन सा साधन सर्वश्रेष्ठ प्रतिपादित है?
पद 28 (शब्द 28: मछली मच्छ फिरै जल भीतर, Raag Bilawal) में गुरु जाम्भोजी महाराज ने स्पष्ट किया है कि: सत्य आचरण, संयमित जीवन एवं परमात्मा का अनन्य ध्यान।
पद संख्या 30 ('शब्द 30: कूं ची वाला शब्द (आयो हुंकारो जीवड़ो बुलायो)') में वर्णित 'अमर पद' की प्राप्ति हेतु कौन सा साधन सर्वश्रेष्ठ प्रतिपादित है?
पद 30 (शब्द 30: कूं ची वाला शब्द (आयो हुंकारो जीवड़ो बुलायो), Raag Bilawal) में गुरु जाम्भोजी महाराज ने स्पष्ट किया है कि: सत्य आचरण, संयमित जीवन एवं परमात्मा का अनन्य ध्यान।
पद संख्या 32 ('शब्द 32: कोड़ गऊ जे तीरथ दानौं') में वर्णित 'अमर पद' की प्राप्ति हेतु कौन सा साधन सर्वश्रेष्ठ प्रतिपादित है?
पद 32 (शब्द 32: कोड़ गऊ जे तीरथ दानौं, Raag Gauri) में गुरु जाम्भोजी महाराज ने स्पष्ट किया है कि: सत्य आचरण, संयमित जीवन एवं परमात्मा का अनन्य ध्यान।
पद संख्या 34 ('शब्द 34: फुंरंग फुंहारे कृष्णी माया') में वर्णित 'अमर पद' की प्राप्ति हेतु कौन सा साधन सर्वश्रेष्ठ प्रतिपादित है?
पद 34 (शब्द 34: फुंरंग फुंहारे कृष्णी माया, Raag Gauri) में गुरु जाम्भोजी महाराज ने स्पष्ट किया है कि: सत्य आचरण, संयमित जीवन एवं परमात्मा का अनन्य ध्यान।
पद संख्या 36 ('शब्द 36: काजी कथै कुराणूं') में वर्णित 'अमर पद' की प्राप्ति हेतु कौन सा साधन सर्वश्रेष्ठ प्रतिपादित है?
पद 36 (शब्द 36: काजी कथै कुराणूं, Raag Gauri) में गुरु जाम्भोजी महाराज ने स्पष्ट किया है कि: सत्य आचरण, संयमित जीवन एवं परमात्मा का अनन्य ध्यान।
पद संख्या 38 ('शब्द 38: रेरे पिंड स पिंडूं') में वर्णित 'अमर पद' की प्राप्ति हेतु कौन सा साधन सर्वश्रेष्ठ प्रतिपादित है?
पद 38 (शब्द 38: रेरे पिंड स पिंडूं, Raag Gauri) में गुरु जाम्भोजी महाराज ने स्पष्ट किया है कि: सत्य आचरण, संयमित जीवन एवं परमात्मा का अनन्य ध्यान।
पद संख्या 40 ('शब्द 40: सस पाताले तिहूं त्रिलोके') में वर्णित 'अमर पद' की प्राप्ति हेतु कौन सा साधन सर्वश्रेष्ठ प्रतिपादित है?
पद 40 (शब्द 40: सस पाताले तिहूं त्रिलोके, Raag Gauri) में गुरु जाम्भोजी महाराज ने स्पष्ट किया है कि: सत्य आचरण, संयमित जीवन एवं परमात्मा का अनन्य ध्यान।