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श्री गुरु जाम्भोजी महाराज द्वारा उद्घोषित शब्द संख्या 101 ('शब्द 101: नितही मावस नित संकरांति') का प्रमुख आध्यात्मिक उपदेश अथवा केंद्रीय भाव क्या है?
शब्द संख्या 101 का मुख्य दार्शनिक संदेश: शबद संख्या 101 में गुरु जम्भेश्वर जी धार्मिक पाखंड, बाह्य कर्मकांड और मूक प्राणियों पर होने वाली क्रूरता का कड़ा विरोध करते हैं। वे स्पष्ट उपदेश देते हैं कि परमात्मा के दरबार में दया, सत्य, पवित्र आचरण और ईमानदारी ही सच्ची बंदगी है।
श्री गुरु जाम्भोजी महाराज द्वारा उद्घोषित शब्द संख्या 102 ('शब्द 102: विष्णु विष्णु भण अजर जरीजै,') का प्रमुख आध्यात्मिक उपदेश अथवा केंद्रीय भाव क्या है?
शब्द संख्या 102 का मुख्य दार्शनिक संदेश: शबद संख्या 102 में गुरु जम्भेश्वर जी अविनाशी परमात्मा विष्णु के अनन्य सुमिरन का संदेश देते हैं। वे मानव को सचेत करते हैं कि सांसारिक भ्रम और मोह-माया नश्वर हैं; केवल प्रभु का नाम और सदाचार ही भवसागर पार कराने वाले हैं।
श्री गुरु जाम्भोजी महाराज द्वारा उद्घोषित शब्द संख्या 103 ('शब्द 103: देखि अदेख्या') का प्रमुख आध्यात्मिक उपदेश अथवा केंद्रीय भाव क्या है?
शब्द संख्या 103 का मुख्य दार्शनिक संदेश: शबद संख्या 103 में गुरु जम्भेश्वर जी अविनाशी परमात्मा विष्णु के अनन्य सुमिरन का संदेश देते हैं। वे मानव को सचेत करते हैं कि सांसारिक भ्रम और मोह-माया नश्वर हैं; केवल प्रभु का नाम और सदाचार ही भवसागर पार कराने वाले हैं।
श्री गुरु जाम्भोजी महाराज द्वारा उद्घोषित शब्द संख्या 104 ('शब्द 104: कंचन दांनू कछु न मानूं,') का प्रमुख आध्यात्मिक उपदेश अथवा केंद्रीय भाव क्या है?
शब्द संख्या 104 का मुख्य दार्शनिक संदेश: शबद संख्या 104 में गुरु जम्भेश्वर जी मानव जीवन की नश्वरता और सत्कर्मों की महत्ता का बोध कराते हैं। वे प्राणी को सचेत करते हैं कि व्यर्थ के अहंकार को त्यागकर सत्य, शील, संतोष और परमार्थ के मार्ग पर चलें।
श्री गुरु जाम्भोजी महाराज द्वारा उद्घोषित शब्द संख्या 105 ('शब्द 105: आप अलेख उपन्ना शंभू') का प्रमुख आध्यात्मिक उपदेश अथवा केंद्रीय भाव क्या है?
शब्द संख्या 105 का मुख्य दार्शनिक संदेश: शबद संख्या 105 में गुरु जम्भेश्वर जी सृष्टि के मूल तत्वों—जल, वायु, पृथ्वी, वनस्पति और मूक पशु-पक्षियों के संरक्षण का पावन संदेश देते हैं। प्रकृति परमात्मा का ही स्वरूप है, अतः उसकी रक्षा करना प्रत्येक मनुष्य का सर्वोपरि धर्म है।
श्री गुरु जाम्भोजी महाराज द्वारा उद्घोषित शब्द संख्या 106 ('शब्द 106: सुंणरे काजी सुंणरे मुल्ला') का प्रमुख आध्यात्मिक उपदेश अथवा केंद्रीय भाव क्या है?
शब्द संख्या 106 का मुख्य दार्शनिक संदेश: शबद संख्या 106 में गुरु जम्भेश्वर जी धार्मिक पाखंड, बाह्य कर्मकांड और मूक प्राणियों पर होने वाली क्रूरता का कड़ा विरोध करते हैं। वे स्पष्ट उपदेश देते हैं कि परमात्मा के दरबार में दया, सत्य, पवित्र आचरण और ईमानदारी ही सच्ची बंदगी है।
श्री गुरु जाम्भोजी महाराज द्वारा उद्घोषित शब्द संख्या 107 ('शब्द 107: सहजे शीले सेज बिछायों') का प्रमुख आध्यात्मिक उपदेश अथवा केंद्रीय भाव क्या है?
शब्द संख्या 107 का मुख्य दार्शनिक संदेश: शबद संख्या 107 में गुरु जम्भेश्वर जी सद्गुरु की अनन्य महिमा और मार्गदर्शन की अनिवार्यता प्रकट करते हैं। गुरु-मुख से प्रकट होने वाला ज्ञान ही अज्ञान के अंधकार को मिटाकर मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।
श्री गुरु जाम्भोजी महाराज द्वारा उद्घोषित शब्द संख्या 108 ('शब्द 108: हालीलो भल पालीलो सिध पालीलो') का प्रमुख आध्यात्मिक उपदेश अथवा केंद्रीय भाव क्या है?
शब्द संख्या 108 का मुख्य दार्शनिक संदेश: शबद संख्या 108 में गुरु जम्भेश्वर जी सद्गुरु की अनन्य महिमा और मार्गदर्शन की अनिवार्यता प्रकट करते हैं। गुरु-मुख से प्रकट होने वाला ज्ञान ही अज्ञान के अंधकार को मिटाकर मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।
श्री गुरु जाम्भोजी महाराज द्वारा उद्घोषित शब्द संख्या 109 ('शब्द 109: देखत भूली को मनमानै') का प्रमुख आध्यात्मिक उपदेश अथवा केंद्रीय भाव क्या है?
शब्द संख्या 109 का मुख्य दार्शनिक संदेश: शबद संख्या 109 में गुरु जम्भेश्वर जी अविनाशी परमात्मा विष्णु के अनन्य सुमिरन का संदेश देते हैं। वे मानव को सचेत करते हैं कि सांसारिक भ्रम और मोह-माया नश्वर हैं; केवल प्रभु का नाम और सदाचार ही भवसागर पार कराने वाले हैं।
श्री गुरु जाम्भोजी महाराज द्वारा उद्घोषित शब्द संख्या 110 ('शब्द 110: मथुरा नगर की राणी होती,') का प्रमुख आध्यात्मिक उपदेश अथवा केंद्रीय भाव क्या है?
शब्द संख्या 110 का मुख्य दार्शनिक संदेश: शबद संख्या 110 में गुरु जम्भेश्वर जी अविनाशी परमात्मा विष्णु के अनन्य सुमिरन का संदेश देते हैं। वे मानव को सचेत करते हैं कि सांसारिक भ्रम और मोह-माया नश्वर हैं; केवल प्रभु का नाम और सदाचार ही भवसागर पार कराने वाले हैं।
श्री गुरु जाम्भोजी महाराज द्वारा उद्घोषित शब्द संख्या 111 ('शब्द 111: खरड़ ओढ़ीजै') का प्रमुख आध्यात्मिक उपदेश अथवा केंद्रीय भाव क्या है?
शब्द संख्या 111 का मुख्य दार्शनिक संदेश: शबद संख्या 111 में गुरु जम्भेश्वर जी सद्गुरु की अनन्य महिमा और मार्गदर्शन की अनिवार्यता प्रकट करते हैं। गुरु-मुख से प्रकट होने वाला ज्ञान ही अज्ञान के अंधकार को मिटाकर मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।
श्री गुरु जाम्भोजी महाराज द्वारा उद्घोषित शब्द संख्या 112 ('शब्द 112: जांके पंथ का भांजणा') का प्रमुख आध्यात्मिक उपदेश अथवा केंद्रीय भाव क्या है?
शब्द संख्या 112 का मुख्य दार्शनिक संदेश: शबद संख्या 112 में गुरु जम्भेश्वर जी सद्गुरु की अनन्य महिमा और मार्गदर्शन की अनिवार्यता प्रकट करते हैं। गुरु-मुख से प्रकट होने वाला ज्ञान ही अज्ञान के अंधकार को मिटाकर मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।
श्री गुरु जाम्भोजी महाराज द्वारा उद्घोषित शब्द संख्या 113 ('शब्द 113: ईमा मोमण चीमा गोयम') का प्रमुख आध्यात्मिक उपदेश अथवा केंद्रीय भाव क्या है?
शब्द संख्या 113 का मुख्य दार्शनिक संदेश: शबद संख्या 113 में गुरु जम्भेश्वर जी मानव जीवन की नश्वरता और सत्कर्मों की महत्ता का बोध कराते हैं। वे प्राणी को सचेत करते हैं कि व्यर्थ के अहंकार को त्यागकर सत्य, शील, संतोष और परमार्थ के मार्ग पर चलें।
श्री गुरु जाम्भोजी महाराज द्वारा उद्घोषित शब्द संख्या 114 ('शब्द 114: सुरनर तणो सन्हदेसो आयो') का प्रमुख आध्यात्मिक उपदेश अथवा केंद्रीय भाव क्या है?
शब्द संख्या 114 का मुख्य दार्शनिक संदेश: शबद संख्या 114 में गुरु जम्भेश्वर जी सद्गुरु की अनन्य महिमा और मार्गदर्शन की अनिवार्यता प्रकट करते हैं। गुरु-मुख से प्रकट होने वाला ज्ञान ही अज्ञान के अंधकार को मिटाकर मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।
श्री गुरु जाम्भोजी महाराज द्वारा उद्घोषित शब्द संख्या 115 ('शब्द 115: म्हे आप गरीबी तन गूदड़ियों,') का प्रमुख आध्यात्मिक उपदेश अथवा केंद्रीय भाव क्या है?
शब्द संख्या 115 का मुख्य दार्शनिक संदेश: शबद संख्या 115 में गुरु जम्भेश्वर जी अविनाशी परमात्मा विष्णु के अनन्य सुमिरन का संदेश देते हैं। वे मानव को सचेत करते हैं कि सांसारिक भ्रम और मोह-माया नश्वर हैं; केवल प्रभु का नाम और सदाचार ही भवसागर पार कराने वाले हैं।
श्री गुरु जाम्भोजी महाराज द्वारा उद्घोषित शब्द संख्या 116 ('शब्द 116: आयसां मृगछाला पावोडी कांय फिरावो,') का प्रमुख आध्यात्मिक उपदेश अथवा केंद्रीय भाव क्या है?
शब्द संख्या 116 का मुख्य दार्शनिक संदेश: शबद संख्या 116 में गुरु जम्भेश्वर जी अविनाशी परमात्मा विष्णु के अनन्य सुमिरन का संदेश देते हैं। वे मानव को सचेत करते हैं कि सांसारिक भ्रम और मोह-माया नश्वर हैं; केवल प्रभु का नाम और सदाचार ही भवसागर पार कराने वाले हैं।
श्री गुरु जाम्भोजी महाराज द्वारा उद्घोषित शब्द संख्या 117 ('शब्द 117: टूका पाया मगर मचाया') का प्रमुख आध्यात्मिक उपदेश अथवा केंद्रीय भाव क्या है?
शब्द संख्या 117 का मुख्य दार्शनिक संदेश: शबद संख्या 117 में गुरु जम्भेश्वर जी सद्गुरु की अनन्य महिमा और मार्गदर्शन की अनिवार्यता प्रकट करते हैं। गुरु-मुख से प्रकट होने वाला ज्ञान ही अज्ञान के अंधकार को मिटाकर मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।
श्री गुरु जाम्भोजी महाराज द्वारा उद्घोषित शब्द संख्या 118 ('शब्द 118: सुरगा हूंते शम्भू आयो') का प्रमुख आध्यात्मिक उपदेश अथवा केंद्रीय भाव क्या है?
शब्द संख्या 118 का मुख्य दार्शनिक संदेश: शबद संख्या 118 में गुरु जम्भेश्वर जी मानव जीवन की नश्वरता और सत्कर्मों की महत्ता का बोध कराते हैं। वे प्राणी को सचेत करते हैं कि व्यर्थ के अहंकार को त्यागकर सत्य, शील, संतोष और परमार्थ के मार्ग पर चलें।
श्री गुरु जाम्भोजी महाराज द्वारा उद्घोषित शब्द संख्या 119 ('शब्द 119: विष्णु विष्णु तू भणरे प्राणी,') का प्रमुख आध्यात्मिक उपदेश अथवा केंद्रीय भाव क्या है?
शब्द संख्या 119 का मुख्य दार्शनिक संदेश: शबद संख्या 119 में गुरु जम्भेश्वर जी अविनाशी परमात्मा विष्णु के अनन्य सुमिरन का संदेश देते हैं। वे मानव को सचेत करते हैं कि सांसारिक भ्रम और मोह-माया नश्वर हैं; केवल प्रभु का नाम और सदाचार ही भवसागर पार कराने वाले हैं।
श्री गुरु जाम्भोजी महाराज द्वारा उद्घोषित शब्द संख्या 120 ('शब्द 120: विष्णु विष्णु तू भणरे प्राणीं,') का प्रमुख आध्यात्मिक उपदेश अथवा केंद्रीय भाव क्या है?
शब्द संख्या 120 का मुख्य दार्शनिक संदेश: शबदवाणी के इस अंतिम १२०वें शबद में गुरु जम्भेश्वर भगवान जीवन के अंतिम सत्य और काल की गति का स्मरण कराते हैं। वे कहते हैं: हे प्राणी! क्षण-क्षण तेरी आयु घट रही है और मृत्यु दिन-प्रतिदिन निकट आ रही है। सद्गुरु के वचनों को अपनाकर सद्बुद्धि ग्रहण कर, क्योंकि जो भलाई बोएगा वह भलाई पाएगा और जो बुराई कमाएगा वह दुर्दशा को प्राप्त होगा।