Language:
PRACTICE QUESTION VAULT

सार्वभौमिक प्रश्न बैंक व विगत वर्ष प्रश्न

RPSC, REET, UPSC एवं बिश्नोई विद्वत शोध पीठ द्वारा सत्यापित प्रश्नों का अभ्यास करें। प्रत्येक प्रश्न के साथ विस्तृत उत्तर व विधिक संदर्भ उपलब्ध है।

✓ ३०० प्रामाणिक प्रश्न उपलब्ध (कुल: 300 प्रश्न)
Q-SHABD-021-B • दार्शनिक भावार्थ व उपदेश 🏛️ श्री शब्द वाणी (Shabd Vani)

श्री गुरु जाम्भोजी महाराज द्वारा उद्घोषित शब्द संख्या 21 ('शब्द 21: जिहिं कै सार असारूं') का प्रमुख आध्यात्मिक उपदेश अथवा केंद्रीय भाव क्या है?

A सांसारिक धन-संपत्ति एवं सांसारिक यश का संचय करना
B बिना गुरु मार्गदर्शन के केवल किताबी ज्ञान पर निर्भर रहना
C संसार के शोर से ऊपर उठकर गुरु की सूक्ष्म वाणी को सुनना और समझना चाहिए।
D जातिगत भेदभाव एवं सामाजिक संकीर्णता का पोषण करना
💡 विस्तृत व्याख्या:

शब्द संख्या 21 का मुख्य दार्शनिक संदेश: यह शब्द उस व्यापक और गहरे सत्य की ओर संकेत करता है जिसकी सीमा को मापना कठिन है। संसार में अनेक प्रकार की ध्वनियाँ और घटनाएँ हैं, लेकिन गुरु का शब्द अत्यंत सूक्ष्म और गहन है। साधक को संसार के विवादों और क्षणभंगुर बातों में उलझने के बजाय गुरु-वाणी को ध्यानपूर्वक सुनना और उसके गहरे अर्थ को समझना चाहिए।

कठिनाई: medium
Q-SHABD-022-B • दार्शनिक भावार्थ व उपदेश 🏛️ श्री शब्द वाणी (Shabd Vani)

श्री गुरु जाम्भोजी महाराज द्वारा उद्घोषित शब्द संख्या 22 ('शब्द 22: लो लो रे राजिंदर रायों') का प्रमुख आध्यात्मिक उपदेश अथवा केंद्रीय भाव क्या है?

A जैसा कर्म और जैसा बीज, वैसा ही उसका परिणाम।
B सांसारिक धन-संपत्ति एवं सांसारिक यश का संचय करना
C जातिगत भेदभाव एवं सामाजिक संकीर्णता का पोषण करना
D जीवों के प्रति कठोरता एवं प्राकृतिक नियमों की उपेक्षा करना
💡 विस्तृत व्याख्या:

शब्द संख्या 22 का मुख्य दार्शनिक संदेश: यहाँ खेती और पेड़-पौधों के उदाहरण द्वारा कर्म और उसके परिणाम का संबंध समझाया गया है। जिस प्रकार अलग-अलग बीज, जड़, शाखा, पत्ते और फल अपनी प्रकृति के अनुसार परिणाम देते हैं, उसी प्रकार मनुष्य के कर्म भी परिणाम उत्पन्न करते हैं। यदि कर्म ही गलत हैं तो केवल बाहरी परिस्थितियों को दोष देना उचित नहीं है। ज्ञान के अभाव में मनुष्य अपने कर्मों के परिणाम को समझ नहीं पाता।

कठिनाई: medium
Q-SHABD-023-B • दार्शनिक भावार्थ व उपदेश 🏛️ श्री शब्द वाणी (Shabd Vani)

श्री गुरु जाम्भोजी महाराज द्वारा उद्घोषित शब्द संख्या 23 ('शब्द 23: साहिल्या हुआ मरण भय भागा') का प्रमुख आध्यात्मिक उपदेश अथवा केंद्रीय भाव क्या है?

A केवल बाह्य धार्मिक आडंबरों एवं कर्मकांडों का विस्तार करना
B सांसारिक धन-संपत्ति एवं सांसारिक यश का संचय करना
C सतगुरु सही मार्ग दिखाकर भ्रम दूर करता है; मानव जीवन को धर्म, ज्ञान, शील और संयम में लगाना चाहिए।
D जीवों के प्रति कठोरता एवं प्राकृतिक नियमों की उपेक्षा करना
💡 विस्तृत व्याख्या:

शब्द संख्या 23 का मुख्य दार्शनिक संदेश: सच्चे गुरु की प्राप्ति मनुष्य को सही मार्ग दिखाती है और मृत्यु के भय तथा भ्रम को दूर करती है। मानव शरीर अत्यंत मूल्यवान है; इसका उपयोग सत्य, धर्म और आत्मज्ञान की प्राप्ति के लिए होना चाहिए। गुरु की वाणी को सत्य रूप में स्वीकार करके धर्माचरण, शील, संयम और ज्ञान का जीवन अपनाना चाहिए। यही मानव जीवन की वास्तविक सार्थकता है।

कठिनाई: medium
Q-SHABD-024-B • दार्शनिक भावार्थ व उपदेश 🏛️ श्री शब्द वाणी (Shabd Vani)

श्री गुरु जाम्भोजी महाराज द्वारा उद्घोषित शब्द संख्या 24 ('शब्द 24: आसण बैसण कूड़ कपटण') का प्रमुख आध्यात्मिक उपदेश अथवा केंद्रीय भाव क्या है?

A जातिगत भेदभाव एवं सामाजिक संकीर्णता का पोषण करना
B बाहरी साधना से अधिक आवश्यक आंतरिक सत्य और निष्कपटता है।
C सांसारिक धन-संपत्ति एवं सांसारिक यश का संचय करना
D शरीर को व्यर्थ कष्ट देना और आत्म-कल्याण की उपेक्षा करना
💡 विस्तृत व्याख्या:

शब्द संख्या 24 का मुख्य दार्शनिक संदेश: मनुष्य अनेक प्रकार के आसन, बैठने की विधि और बाहरी साधना कर सकता है, लेकिन यदि उसके भीतर कपट और असत्य है तो केवल बाहरी साधना पर्याप्त नहीं। जो वास्तविक मार्ग को पहचानता है, वह नश्वर शरीर से परे आत्मिक सत्य की ओर बढ़ता है।

कठिनाई: medium
Q-SHABD-025-B • दार्शनिक भावार्थ व उपदेश 🏛️ श्री शब्द वाणी (Shabd Vani)

श्री गुरु जाम्भोजी महाराज द्वारा उद्घोषित शब्द संख्या 25 ('शब्द 25: राज न भूलीलो, राजेंद्र') का प्रमुख आध्यात्मिक उपदेश अथवा केंद्रीय भाव क्या है?

A संसार की संपत्ति और सत्ता क्षणभंगुर हैं; सत्य की खोज ही स्थायी आध्यात्मिक दिशा है।
B जातिगत भेदभाव एवं सामाजिक संकीर्णता का पोषण करना
C बिना गुरु मार्गदर्शन के केवल किताबी ज्ञान पर निर्भर रहना
D शरीर को व्यर्थ कष्ट देना और आत्म-कल्याण की उपेक्षा करना
💡 विस्तृत व्याख्या:

शब्द संख्या 25 का मुख्य दार्शनिक संदेश: संसार की सत्ता, संपत्ति और भौतिक उपलब्धियाँ स्थायी नहीं हैं। हवा के झोंके और धुएँ की तरह संसार की स्थिति बदलती रहती है। मनुष्य यदि परम सत्य को भूलकर संसार में ही उलझा रहता है तो मृत्यु के समय सब कुछ पीछे छूट जाता है। इसलिए जीवन रहते हुए सत्य की खोज करनी चाहिए।

कठिनाई: medium
Q-SHABD-026-B • दार्शनिक भावार्थ व उपदेश 🏛️ श्री शब्द वाणी (Shabd Vani)

श्री गुरु जाम्भोजी महाराज द्वारा उद्घोषित शब्द संख्या 26 ('शब्द 26: घण तण जीम्या, को गुण नाहीं') का प्रमुख आध्यात्मिक उपदेश अथवा केंद्रीय भाव क्या है?

A कुल, प्रतिष्ठा और बाहरी पहचान नहीं—कर्म, चेतना और आचरण मनुष्य को श्रेष्ठ बनाते हैं।
B जीवों के प्रति कठोरता एवं प्राकृतिक नियमों की उपेक्षा करना
C शरीर को व्यर्थ कष्ट देना और आत्म-कल्याण की उपेक्षा करना
D सांसारिक धन-संपत्ति एवं सांसारिक यश का संचय करना
💡 विस्तृत व्याख्या:

शब्द संख्या 26 का मुख्य दार्शनिक संदेश: केवल अच्छे कुल में जन्म लेना या बाहरी प्रतिष्ठा प्राप्त करना मनुष्य को श्रेष्ठ नहीं बनाता। वास्तविक श्रेष्ठता उसके कर्म, आचरण और चेतना से निर्धारित होती है। कलियुग जैसे कठिन समय में मनुष्य को जागरूक रहना चाहिए। सतगुरु का मार्ग भ्रम को दूर करके सही पथ दिखाता है।

कठिनाई: medium
Q-SHABD-027-B • दार्शनिक भावार्थ व उपदेश 🏛️ श्री शब्द वाणी (Shabd Vani)

श्री गुरु जाम्भोजी महाराज द्वारा उद्घोषित शब्द संख्या 27 ('शब्द 27: पढ़ कागल वेदूं, शास्त्र शब्दूं') का प्रमुख आध्यात्मिक उपदेश अथवा केंद्रीय भाव क्या है?

A पुस्तक पढ़ना ज्ञान की शुरुआत है; वास्तविक ज्ञान आत्म-अनुभूति से पूर्ण होता है।
B शरीर को व्यर्थ कष्ट देना और आत्म-कल्याण की उपेक्षा करना
C बिना गुरु मार्गदर्शन के केवल किताबी ज्ञान पर निर्भर रहना
D सांसारिक धन-संपत्ति एवं सांसारिक यश का संचय करना
💡 विस्तृत व्याख्या:

शब्द संख्या 27 का मुख्य दार्शनिक संदेश: केवल वेद, शास्त्र और पुस्तकों को पढ़ते रहना पर्याप्त नहीं है यदि उनके ज्ञान का वास्तविक अनुभव नहीं हुआ। शरीर और जीवन के भीतर स्थित चेतना के मूल को पहचानना आवश्यक है। यह शब्द बाहरी ज्ञान और आंतरिक अनुभूति के अंतर पर विचार करता है। ज्ञान तभी सार्थक है जब वह जीवन के वास्तविक रहस्य को समझने में सहायता करे।

कठिनाई: medium
Q-SHABD-028-B • दार्शनिक भावार्थ व उपदेश 🏛️ श्री शब्द वाणी (Shabd Vani)

श्री गुरु जाम्भोजी महाराज द्वारा उद्घोषित शब्द संख्या 28 ('शब्द 28: मछली मच्छ फिरै जल भीतर') का प्रमुख आध्यात्मिक उपदेश अथवा केंद्रीय भाव क्या है?

A परम तत्व असीम है; उसे केवल बाहरी रूप या सीमाओं से नहीं समझा जा सकता।
B जातिगत भेदभाव एवं सामाजिक संकीर्णता का पोषण करना
C जीवों के प्रति कठोरता एवं प्राकृतिक नियमों की उपेक्षा करना
D केवल बाह्य धार्मिक आडंबरों एवं कर्मकांडों का विस्तार करना
💡 विस्तृत व्याख्या:

शब्द संख्या 28 का मुख्य दार्शनिक संदेश: मछली जिस प्रकार जल में रहती है लेकिन जल की व्यापकता का पूरा अनुभव शब्दों में नहीं कर सकती, उसी प्रकार परम तत्व हमारे अस्तित्व में उपस्थित होकर भी सामान्य बुद्धि से पूरी तरह सीमित नहीं किया जा सकता। परम सत्य का कोई निश्चित रूप, रेखा या सीमा नहीं है। अलग-अलग साधक अपनी साधना के अनुसार उसके अनुभव तक पहुँचते हैं।

कठिनाई: medium
Q-SHABD-029-B • दार्शनिक भावार्थ व उपदेश 🏛️ श्री शब्द वाणी (Shabd Vani)

श्री गुरु जाम्भोजी महाराज द्वारा उद्घोषित शब्द संख्या 29 ('शब्द 29: इलोल सागर (गुरु कै शब्द असंख्य प्रबोधी)') का प्रमुख आध्यात्मिक उपदेश अथवा केंद्रीय भाव क्या है?

A सांसारिक धन-संपत्ति एवं सांसारिक यश का संचय करना
B गुरु-वाणी की गहराई अनंत है; वास्तविक योग बाहरी प्रतीकों से अधिक आंतरिक साधना और सहज अवस्था में है।
C जीवों के प्रति कठोरता एवं प्राकृतिक नियमों की उपेक्षा करना
D केवल बाह्य धार्मिक आडंबरों एवं कर्मकांडों का विस्तार करना
💡 विस्तृत व्याख्या:

शब्द संख्या 29 का मुख्य दार्शनिक संदेश: यह विस्तृत शब्द गुरु-वाणी की विशालता और साधना के गहरे मार्ग को रूपकों तथा विभिन्न कथात्मक संकेतों के माध्यम से प्रस्तुत करता है। गुरु का शब्द अनंत है और उसकी गहराई को पूरी तरह पार करना कठिन है। इसमें साधक की आंतरिक यात्रा, संसार के मोह से ऊपर उठना, योग के बाहरी प्रतीकों के बजाय भीतर की साधना, मन की मुद्रा और सहज योग जैसे भाव दिखाई देते हैं।

कठिनाई: medium
Q-SHABD-030-B • दार्शनिक भावार्थ व उपदेश 🏛️ श्री शब्द वाणी (Shabd Vani)

श्री गुरु जाम्भोजी महाराज द्वारा उद्घोषित शब्द संख्या 30 ('शब्द 30: कूं ची वाला शब्द (आयो हुंकारो जीवड़ो बुलायो)') का प्रमुख आध्यात्मिक उपदेश अथवा केंद्रीय भाव क्या है?

A जातिगत भेदभाव एवं सामाजिक संकीर्णता का पोषण करना
B अपने कर्मों को शुद्ध करो और दूसरों के साथ वही व्यवहार करो जो अपने लिए उचित समझते हो।
C जीवों के प्रति कठोरता एवं प्राकृतिक नियमों की उपेक्षा करना
D सांसारिक धन-संपत्ति एवं सांसारिक यश का संचय करना
💡 विस्तृत व्याख्या:

शब्द संख्या 30 का मुख्य दार्शनिक संदेश: मनुष्य को अपने जीवन और कर्मों का विचार करना चाहिए। जीवन में किए गए अच्छे और बुरे कर्म साथ चलते हैं। केवल बाहरी पूजा या मंत्र-जप पर्याप्त नहीं; व्यक्ति को अपने कर्म, खेती, श्रम, व्यवहार और दूसरों के प्रति अपने आचरण को भी शुद्ध करना चाहिए। अपने लिए जो उचित नहीं है, वह दूसरों के लिए भी नहीं करना चाहिए। यही आत्म-जांच और नैतिक जीवन का आधार है।

कठिनाई: medium
Q-SHABD-031-B • दार्शनिक भावार्थ व उपदेश 🏛️ श्री शब्द वाणी (Shabd Vani)

श्री गुरु जाम्भोजी महाराज द्वारा उद्घोषित शब्द संख्या 31 ('शब्द 31: भल मूल सींचो रे प्राणी') का प्रमुख आध्यात्मिक उपदेश अथवा केंद्रीय भाव क्या है?

A मूल को सींचो—समय रहते सत्य, सद्बुद्धि और धर्म को जीवन में स्थापित करो।
B जातिगत भेदभाव एवं सामाजिक संकीर्णता का पोषण करना
C बिना गुरु मार्गदर्शन के केवल किताबी ज्ञान पर निर्भर रहना
D केवल बाह्य धार्मिक आडंबरों एवं कर्मकांडों का विस्तार करना
💡 विस्तृत व्याख्या:

शब्द संख्या 31 का मुख्य दार्शनिक संदेश: जैसे वृक्ष को स्वस्थ रखने के लिए उसकी जड़ों को सींचना आवश्यक है, वैसे ही मनुष्य को अपने जीवन के मूल—सत्य, सद्बुद्धि और धर्म—को मजबूत करना चाहिए। जीवन निरंतर बीत रहा है। जन्म, मृत्यु, दिन-रात और समय का चक्र चलता रहता है। संसार का मोह मनुष्य को अपने जाल में बाँधता है, लेकिन मृत्यु के समय शरीर और जीव का संबंध समाप्त हो जाता है। इसलिए जीवन रहते हुए मूल सत्य को पहचानना और सही मार्ग अपनाना आवश्यक है।

कठिनाई: medium
Q-SHABD-032-B • दार्शनिक भावार्थ व उपदेश 🏛️ श्री शब्द वाणी (Shabd Vani)

श्री गुरु जाम्भोजी महाराज द्वारा उद्घोषित शब्द संख्या 32 ('शब्द 32: कोड़ गऊ जे तीरथ दानौं') का प्रमुख आध्यात्मिक उपदेश अथवा केंद्रीय भाव क्या है?

A बिना गुरु मार्गदर्शन के केवल किताबी ज्ञान पर निर्भर रहना
B दान और धार्मिक कर्म तभी सार्थक हैं जब उनके साथ अहंकार-रहित चरित्र और सच्चा आचरण हो।
C शरीर को व्यर्थ कष्ट देना और आत्म-कल्याण की उपेक्षा करना
D जातिगत भेदभाव एवं सामाजिक संकीर्णता का पोषण करना
💡 विस्तृत व्याख्या:

शब्द संख्या 32 का मुख्य दार्शनिक संदेश: मनुष्य बहुत बड़े-बड़े दान कर सकता है—गाय, घोड़े, सोना, वस्त्र, हाथी आदि। धार्मिक और सामाजिक रूप से बड़े कर्म भी किए जा सकते हैं। लेकिन यदि उनमें अहंकार, विवाद और आत्म-प्रदर्शन जुड़ा हुआ है, तो केवल बाहरी कर्म मनुष्य को वास्तविक आध्यात्मिक पार नहीं पहुँचा सकते। सच्चे चरित्र और सही आचरण के बिना साधना अधूरी है।

कठिनाई: medium
Q-SHABD-033-B • दार्शनिक भावार्थ व उपदेश 🏛️ श्री शब्द वाणी (Shabd Vani)

श्री गुरु जाम्भोजी महाराज द्वारा उद्घोषित शब्द संख्या 33 ('शब्द 33: कवण न हुआ कवण न होयसी') का प्रमुख आध्यात्मिक उपदेश अथवा केंद्रीय भाव क्या है?

A शरीर को व्यर्थ कष्ट देना और आत्म-कल्याण की उपेक्षा करना
B जातिगत भेदभाव एवं सामाजिक संकीर्णता का पोषण करना
C संसार और उसके संबंध परिवर्तनशील हैं; कर्ता और मूल सत्य की पहचान ही वास्तविक जागृति है।
D सांसारिक धन-संपत्ति एवं सांसारिक यश का संचय करना
💡 विस्तृत व्याख्या:

शब्द संख्या 33 का मुख्य दार्शनिक संदेश: संसार में जो कुछ दिखाई देता है वह परिवर्तनशील है। कितने ही लोग आए और चले गए। आज जो संबंध हमारे अपने लगते हैं—माता, पिता, भाई, परिवार—वे भी स्थायी नहीं हैं। मनुष्य संसार की इस अस्थिरता में उलझकर अपने वास्तविक कर्ता को भूल जाता है। इसलिए जीवन की नश्वरता को समझकर परम सत्य को पहचानना चाहिए।

कठिनाई: medium
Q-SHABD-034-B • दार्शनिक भावार्थ व उपदेश 🏛️ श्री शब्द वाणी (Shabd Vani)

श्री गुरु जाम्भोजी महाराज द्वारा उद्घोषित शब्द संख्या 34 ('शब्द 34: फुंरंग फुंहारे कृष्णी माया') का प्रमुख आध्यात्मिक उपदेश अथवा केंद्रीय भाव क्या है?

A सांसारिक धन-संपत्ति एवं सांसारिक यश का संचय करना
B केवल बाह्य धार्मिक आडंबरों एवं कर्मकांडों का विस्तार करना
C संसार परिवर्तनशील है; जीवन रहते परम तत्व की खोज करनी चाहिए।
D जीवों के प्रति कठोरता एवं प्राकृतिक नियमों की उपेक्षा करना
💡 विस्तृत व्याख्या:

शब्द संख्या 34 का मुख्य दार्शनिक संदेश: यह संसार परिवर्तनशील है और जीवन की आवश्यकताएँ भी निरंतर बदलती रहती हैं। भोजन, खेत, जीवन और शरीर—सब प्रकृति के चक्र का हिस्सा हैं। मनुष्य को अपने जीवन का उद्देश्य पहचानना चाहिए। परम तत्व की खोज करने वाला साधक संसार की क्षणभंगुरता को समझता है और जीवन के अंतिम पड़ाव से पहले सत्य को प्राप्त करने का प्रयास करता है।

कठिनाई: medium
Q-SHABD-035-B • दार्शनिक भावार्थ व उपदेश 🏛️ श्री शब्द वाणी (Shabd Vani)

श्री गुरु जाम्भोजी महाराज द्वारा उद्घोषित शब्द संख्या 35 ('शब्द 35: बल बल भणत व्यासूं') का प्रमुख आध्यात्मिक उपदेश अथवा केंद्रीय भाव क्या है?

A जातिगत भेदभाव एवं सामाजिक संकीर्णता का पोषण करना
B गुरु की पहचान और जीवन के मूल का पोषण साधना की वास्तविक नींव है।
C केवल बाह्य धार्मिक आडंबरों एवं कर्मकांडों का विस्तार करना
D सांसारिक धन-संपत्ति एवं सांसारिक यश का संचय करना
💡 विस्तृत व्याख्या:

शब्द संख्या 35 का मुख्य दार्शनिक संदेश: जब मनुष्य गुरु को नहीं पहचानता और जीवन के मूल को नहीं सींचता, तब उसकी साधना बाहरी और सतही रह जाती है। वह अनेक प्रकार के प्रयास करता है, लेकिन भीतर से निराश और अस्थिर बना रहता है। गुरु और मूल सत्य की पहचान ही साधना को गहराई प्रदान करती है।

कठिनाई: medium
Q-SHABD-036-B • दार्शनिक भावार्थ व उपदेश 🏛️ श्री शब्द वाणी (Shabd Vani)

श्री गुरु जाम्भोजी महाराज द्वारा उद्घोषित शब्द संख्या 36 ('शब्द 36: काजी कथै कुराणूं') का प्रमुख आध्यात्मिक उपदेश अथवा केंद्रीय भाव क्या है?

A धार्मिक ग्रंथ का पाठ ही पर्याप्त नहीं; उसके सत्य संदेश को पहचानकर आचरण में उतारना आवश्यक है।
B सांसारिक धन-संपत्ति एवं सांसारिक यश का संचय करना
C जीवों के प्रति कठोरता एवं प्राकृतिक नियमों की उपेक्षा करना
D केवल बाह्य धार्मिक आडंबरों एवं कर्मकांडों का विस्तार करना
💡 विस्तृत व्याख्या:

शब्द संख्या 36 का मुख्य दार्शनिक संदेश: केवल धार्मिक ग्रंथ का पाठ करना पर्याप्त नहीं है यदि उसके वास्तविक आदेश और नैतिक अर्थ को पहचाना नहीं गया। धर्म का बाहरी ज्ञान तभी सार्थक है जब वह मनुष्य के आचरण और जीवन को बदलता है।

कठिनाई: medium
Q-SHABD-037-B • दार्शनिक भावार्थ व उपदेश 🏛️ श्री शब्द वाणी (Shabd Vani)

श्री गुरु जाम्भोजी महाराज द्वारा उद्घोषित शब्द संख्या 37 ('शब्द 37: लोहा लंग लुहारूं') का प्रमुख आध्यात्मिक उपदेश अथवा केंद्रीय भाव क्या है?

A केवल बाह्य धार्मिक आडंबरों एवं कर्मकांडों का विस्तार करना
B बिना गुरु मार्गदर्शन के केवल किताबी ज्ञान पर निर्भर रहना
C सांसारिक धन-संपत्ति एवं सांसारिक यश का संचय करना
D सही गुरु जीवन को सही दिशा और स्वरूप देने वाला मार्गदर्शक है।
💡 विस्तृत व्याख्या:

शब्द संख्या 37 का मुख्य दार्शनिक संदेश: लोहे को लोहार, धातु को कुशल कारीगर और मिट्टी को कुम्हार उचित रूप देता है। उसी प्रकार मनुष्य के जीवन को सही दिशा देने के लिए गुरु का मार्गदर्शन आवश्यक है। यदि गुरु को नहीं पहचाना गया और जीवन के मूल को नहीं सींचा गया, तो बाहरी प्रयास अधूरे रह जाते हैं।

कठिनाई: medium
Q-SHABD-038-B • दार्शनिक भावार्थ व उपदेश 🏛️ श्री शब्द वाणी (Shabd Vani)

श्री गुरु जाम्भोजी महाराज द्वारा उद्घोषित शब्द संख्या 38 ('शब्द 38: रेरे पिंड स पिंडूं') का प्रमुख आध्यात्मिक उपदेश अथवा केंद्रीय भाव क्या है?

A सही पंथ की पहचान के लिए गुरु और मूल सत्य की पहचान आवश्यक है।
B शरीर को व्यर्थ कष्ट देना और आत्म-कल्याण की उपेक्षा करना
C बिना गुरु मार्गदर्शन के केवल किताबी ज्ञान पर निर्भर रहना
D जातिगत भेदभाव एवं सामाजिक संकीर्णता का पोषण करना
💡 विस्तृत व्याख्या:

शब्द संख्या 38 का मुख्य दार्शनिक संदेश: शरीर नश्वर है और जीवन निरंतर परिवर्तन तथा विघटन की ओर बढ़ता है। यदि मनुष्य सही पंथ और कुपंथ के अंतर को नहीं पहचानता, तो वह जीवन के वास्तविक उद्देश्य से दूर हो सकता है। सच्चे गुरु की पहचान और मूल सत्य की खोज सही मार्ग को पहचानने में सहायता करती है।

कठिनाई: medium
Q-SHABD-039-B • दार्शनिक भावार्थ व उपदेश 🏛️ श्री शब्द वाणी (Shabd Vani)

श्री गुरु जाम्भोजी महाराज द्वारा उद्घोषित शब्द संख्या 39 ('शब्द 39: उत्तम संग सुसंगूं') का प्रमुख आध्यात्मिक उपदेश अथवा केंद्रीय भाव क्या है?

A केवल बाह्य धार्मिक आडंबरों एवं कर्मकांडों का विस्तार करना
B जीवों के प्रति कठोरता एवं प्राकृतिक नियमों की उपेक्षा करना
C उत्तम संगति → उत्तम विचार → उत्तम आचरण → सहज सही मार्ग।
D बिना गुरु मार्गदर्शन के केवल किताबी ज्ञान पर निर्भर रहना
💡 विस्तृत व्याख्या:

शब्द संख्या 39 का मुख्य दार्शनिक संदेश: अच्छी संगति मनुष्य के जीवन पर गहरा प्रभाव डालती है। उत्तम संगति से विचार, व्यवहार और जीवन-पद्धति भी उत्तम होती है। सत्संग मनुष्य को सहज और सही मार्ग की ओर ले जाता है तथा आध्यात्मिक मुक्ति के द्वार को खोलने वाला सहायक बनता है।

कठिनाई: medium
Q-SHABD-040-B • दार्शनिक भावार्थ व उपदेश 🏛️ श्री शब्द वाणी (Shabd Vani)

श्री गुरु जाम्भोजी महाराज द्वारा उद्घोषित शब्द संख्या 40 ('शब्द 40: सस पाताले तिहूं त्रिलोके') का प्रमुख आध्यात्मिक उपदेश अथवा केंद्रीय भाव क्या है?

A जीवों के प्रति कठोरता एवं प्राकृतिक नियमों की उपेक्षा करना
B केवल बाह्य धार्मिक आडंबरों एवं कर्मकांडों का विस्तार करना
C बिना गुरु मार्गदर्शन के केवल किताबी ज्ञान पर निर्भर रहना
D परम सत्य सर्वत्र है; सतगुरु भ्रम दूर कर सत्य के मार्ग की पहचान कराता है।
💡 विस्तृत व्याख्या:

शब्द संख्या 40 का मुख्य दार्शनिक संदेश: परम तत्व की उपस्थिति को केवल किसी एक स्थान या दिशा तक सीमित नहीं किया जा सकता। वह बाहर और भीतर, समस्त अस्तित्व में निरंतर विद्यमान है। सतगुरु मिलने पर साधक को सत्य का मार्ग मिलता है और उसके भ्रम दूर होते हैं। तब वह बाहरी भटकाव के बजाय उस सत्य को पहचानने लगता है जो सर्वत्र विद्यमान है।

कठिनाई: medium