खेजड़ी (Prosopis cineraria): थार का कल्पवृक्ष एवं नियम #19
खेजड़ी थार मरुस्थल की जीवन-रेखा है। इसकी जड़ें 30 मीटर तक गहरी जाकर भूजल संतुलन बनाती हैं और मिट्टी के कटाव को रोकती हैं। पत्तियां (लूम) अकाल में पशुओं का चारा और सांगरी पौष्टिक भोजन बनती है। गुरु जम्भेश्वर जी ने नियम #19 में "रूख लीलो न घावे" का स्पष्ट आदेश देकर इसे धार्मिक आचार संहिता का अनिवार्य अंग बनाया।
गुरु जम्भेश्वर जी का नियम #19: "रूख लीलो न घावे"। केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान (CAZRI) के अध्ययनों के अनुसार एक परिपक्व खेजड़ी वृक्ष प्रतिवर्ष कई क्विंटल चारा (लूम) एवं सांगरी प्रदान करता है, जो अकाल के समय पशुधन एवं मानव का जीवन रक्षक बनता है।