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विश्नोई एटलस
विश्नोई एटलस धरोहर की खोज • विरासत का संरक्षण
✦ शब्दवाणी संग्रह 🏛️ C9.2.1 Authority Corpus Shabad #18 • राग: Raag Sorath

शब्द 18 — शब्द 18: जांकुंछ जांकुंछ, जां कछु न जाणी

श्री गुरु जम्भेश्वर भगवान मुखारविंद से उच्चरित पावन वाणी • 120 अमृत शबद

ॐ

✦ मूल शब्दवाणी (अपरिवर्तनीय मूल पाठ • Sacred & Untouched)

ओ३म्—जांकुंछ जांकुंछ, जां कछु न जाणी। नांकुंछ नांकुंछ, तां कछु जाणी। नांकुंछ नांकुंछ अकथ कहाणी, नांकुंछ नांकुंछ अमृत बाणी। ज्ञानी सो तो ज्ञानी रोवत, पढ़िया रोवत गाहे। केवल करतब मोरी मोरा रोवत, जोय जोय पगं दिखाही। उरध खेंपी मन उन्मन रोवत, मुरखां रोवत धाहीं। मरणत माथ संसारत खेती, कै कै अवतारी रोवत राही। जड़िया बूंठी जे जग जीवै, तो बेदां क्यूं मर जाही। खोज पीरांगी ऐसा बिनाणी, नुगरा खोजत नाहीं। जां कछु होता, ना कछु होयसी, बल कछु होयसी ताहीं।

हिन्दी भावार्थ

भावार्थ — समझने हेतु व्याख्या
यह शब्द उस सत्य की ओर संकेत करता है जिसे साधारण शब्दों में पूरी तरह व्यक्त नहीं किया जा सकता। मनुष्य जितना जानता है, उससे कहीं अधिक अज्ञात उसके सामने है। अज्ञान, मृत्यु, संसार की परिवर्तनशीलता और जीवन की अस्थिरता के बीच साधक को सत्य की खोज करते रहना चाहिए। जो आज दिखाई देता है वह बदलने वाला है; इसलिए मूल और स्थायी सत्य की पहचान आवश्यक है।

English Translation

Interpretive Rendering & Meaning
This Shabd points toward a reality that cannot be fully expressed through ordinary words. What human beings know is limited compared with what remains unknown. Amid ignorance, mortality, change and the impermanence of worldly existence, the seeker should continue searching for truth. What appears today is subject to change; therefore, recognizing the fundamental and enduring reality is essential.
✦ मुख्य संदेश (Key Message Takeaway)

स्रोत व संपादकीय विवरण (Source & Editorial Information)

✓ C9.2.1 Provenance Verified
प्रामाणिक स्रोत (Source):
संस्करण / पृष्ठ (Edition/Page):
समीक्षक (Reviewed By):
प्रकाशन स्थिति (Status):
महत्वपूर्ण सूचना व अस्वीकरण (Heritage Disclaimer)

मूल शब्दवाणी को यथासंभव मूल स्रोत के अनुसार संरक्षित किया गया है। हिन्दी भावार्थ और English Translation पाठकों की समझ के लिए प्रस्तुत व्याख्यात्मक सामग्री हैं और मूल शब्दवाणी का स्थान नहीं लेते।

The original Shabd Vani is preserved according to the referenced source as closely as possible. The Hindi meaning and English translation are provided as interpretive aids for readers and do not replace the original text.

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