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RPSC, REET, UPSC एवं बिश्नोई विद्वत शोध पीठ द्वारा सत्यापित प्रश्नों का अभ्यास करें। प्रत्येक प्रश्न के साथ विस्तृत उत्तर व विधिक संदर्भ उपलब्ध है।
शब्द संख्या 82 ('शब्द 82: अलख-अलख तू अलख न लखणा,') में वर्णित 'परम पद' की स्थिति में जीवात्मा का क्या स्वरूप सिद्ध होता है?
पद 82 (शब्द 82: अलख-अलख तू अलख न लखणा,, Raag Kalyan) में गुरु जाम्भोजी महाराज ने स्पष्ट किया है कि: सर्वत्र समभाव, भय-शोक से मुक्ति एवं परमात्मा में लीनता।
शब्द संख्या 84 ('शब्द 84: मूंड मुंडायो मन न मुंडायो,') में वर्णित 'परम पद' की स्थिति में जीवात्मा का क्या स्वरूप सिद्ध होता है?
पद 84 (शब्द 84: मूंड मुंडायो मन न मुंडायो,, Raag Todi) में गुरु जाम्भोजी महाराज ने स्पष्ट किया है कि: सर्वत्र समभाव, भय-शोक से मुक्ति एवं परमात्मा में लीनता।
शब्द संख्या 86 ('शब्द 86: जुग जागो जुग जाग पिरांणी,') में वर्णित 'परम पद' की स्थिति में जीवात्मा का क्या स्वरूप सिद्ध होता है?
पद 86 (शब्द 86: जुग जागो जुग जाग पिरांणी,, Raag Bhairav) में गुरु जाम्भोजी महाराज ने स्पष्ट किया है कि: सर्वत्र समभाव, भय-शोक से मुक्ति एवं परमात्मा में लीनता।
शब्द संख्या 88 ('शब्द 88: गोरख लो') में वर्णित 'परम पद' की स्थिति में जीवात्मा का क्या स्वरूप सिद्ध होता है?
पद 88 (शब्द 88: गोरख लो, Raag Sorath) में गुरु जाम्भोजी महाराज ने स्पष्ट किया है कि: सर्वत्र समभाव, भय-शोक से मुक्ति एवं परमात्मा में लीनता।
शब्द संख्या 90 ('शब्द 90: चोईस चेड़ा कालिंग केड़ा') में वर्णित 'परम पद' की स्थिति में जीवात्मा का क्या स्वरूप सिद्ध होता है?
पद 90 (शब्द 90: चोईस चेड़ा कालिंग केड़ा, Raag Bilawal) में गुरु जाम्भोजी महाराज ने स्पष्ट किया है कि: सर्वत्र समभाव, भय-शोक से मुक्ति एवं परमात्मा में लीनता।
शब्द संख्या 92 ('शब्द 92: काया कोट पवन कुट वाली,') में वर्णित 'परम पद' की स्थिति में जीवात्मा का क्या स्वरूप सिद्ध होता है?
पद 92 (शब्द 92: काया कोट पवन कुट वाली,, Raag Maru) में गुरु जाम्भोजी महाराज ने स्पष्ट किया है कि: सर्वत्र समभाव, भय-शोक से मुक्ति एवं परमात्मा में लीनता।
शब्द संख्या 94 ('शब्द 94: सहस्त्र नाम सांई भल शिंभु,') में वर्णित 'परम पद' की स्थिति में जीवात्मा का क्या स्वरूप सिद्ध होता है?
पद 94 (शब्द 94: सहस्त्र नाम सांई भल शिंभु,, Raag Kalyan) में गुरु जाम्भोजी महाराज ने स्पष्ट किया है कि: सर्वत्र समभाव, भय-शोक से मुक्ति एवं परमात्मा में लीनता।
शब्द संख्या 96 ('शब्द 96: सुण गुणवंता') में वर्णित 'परम पद' की स्थिति में जीवात्मा का क्या स्वरूप सिद्ध होता है?
पद 96 (शब्द 96: सुण गुणवंता, Raag Todi) में गुरु जाम्भोजी महाराज ने स्पष्ट किया है कि: सर्वत्र समभाव, भय-शोक से मुक्ति एवं परमात्मा में लीनता।
शब्द संख्या 98 ('शब्द 98: जिहि गुरू कै खिणही ताऊं,') में वर्णित 'परम पद' की स्थिति में जीवात्मा का क्या स्वरूप सिद्ध होता है?
पद 98 (शब्द 98: जिहि गुरू कै खिणही ताऊं,, Raag Bhairav) में गुरु जाम्भोजी महाराज ने स्पष्ट किया है कि: सर्वत्र समभाव, भय-शोक से मुक्ति एवं परमात्मा में लीनता।
शब्द संख्या 100 ('शब्द 100: अर्थूं गर्थूं साहण थाटूं') में वर्णित 'परम पद' की स्थिति में जीवात्मा का क्या स्वरूप सिद्ध होता है?
पद 100 (शब्द 100: अर्थूं गर्थूं साहण थाटूं, Raag Sorath) में गुरु जाम्भोजी महाराज ने स्पष्ट किया है कि: सर्वत्र समभाव, भय-शोक से मुक्ति एवं परमात्मा में लीनता।
शब्द संख्या 102 ('शब्द 102: विष्णु विष्णु भण अजर जरीजै,') में वर्णित 'परम पद' की स्थिति में जीवात्मा का क्या स्वरूप सिद्ध होता है?
पद 102 (शब्द 102: विष्णु विष्णु भण अजर जरीजै,, Raag Bilawal) में गुरु जाम्भोजी महाराज ने स्पष्ट किया है कि: सर्वत्र समभाव, भय-शोक से मुक्ति एवं परमात्मा में लीनता।
शब्द संख्या 104 ('शब्द 104: कंचन दांनू कछु न मानूं,') में वर्णित 'परम पद' की स्थिति में जीवात्मा का क्या स्वरूप सिद्ध होता है?
पद 104 (शब्द 104: कंचन दांनू कछु न मानूं,, Raag Maru) में गुरु जाम्भोजी महाराज ने स्पष्ट किया है कि: सर्वत्र समभाव, भय-शोक से मुक्ति एवं परमात्मा में लीनता।
शब्द संख्या 106 ('शब्द 106: सुंणरे काजी सुंणरे मुल्ला') में वर्णित 'परम पद' की स्थिति में जीवात्मा का क्या स्वरूप सिद्ध होता है?
पद 106 (शब्द 106: सुंणरे काजी सुंणरे मुल्ला, Raag Kalyan) में गुरु जाम्भोजी महाराज ने स्पष्ट किया है कि: सर्वत्र समभाव, भय-शोक से मुक्ति एवं परमात्मा में लीनता।
शब्द संख्या 108 ('शब्द 108: हालीलो भल पालीलो सिध पालीलो') में वर्णित 'परम पद' की स्थिति में जीवात्मा का क्या स्वरूप सिद्ध होता है?
पद 108 (शब्द 108: हालीलो भल पालीलो सिध पालीलो, Raag Todi) में गुरु जाम्भोजी महाराज ने स्पष्ट किया है कि: सर्वत्र समभाव, भय-शोक से मुक्ति एवं परमात्मा में लीनता।
शब्द संख्या 110 ('शब्द 110: मथुरा नगर की राणी होती,') में वर्णित 'परम पद' की स्थिति में जीवात्मा का क्या स्वरूप सिद्ध होता है?
पद 110 (शब्द 110: मथुरा नगर की राणी होती,, Raag Bhairav) में गुरु जाम्भोजी महाराज ने स्पष्ट किया है कि: सर्वत्र समभाव, भय-शोक से मुक्ति एवं परमात्मा में लीनता।
शब्द संख्या 112 ('शब्द 112: जांके पंथ का भांजणा') में वर्णित 'परम पद' की स्थिति में जीवात्मा का क्या स्वरूप सिद्ध होता है?
पद 112 (शब्द 112: जांके पंथ का भांजणा, Raag Sorath) में गुरु जाम्भोजी महाराज ने स्पष्ट किया है कि: सर्वत्र समभाव, भय-शोक से मुक्ति एवं परमात्मा में लीनता।
शब्द संख्या 114 ('शब्द 114: सुरनर तणो सन्हदेसो आयो') में वर्णित 'परम पद' की स्थिति में जीवात्मा का क्या स्वरूप सिद्ध होता है?
पद 114 (शब्द 114: सुरनर तणो सन्हदेसो आयो, Raag Bilawal) में गुरु जाम्भोजी महाराज ने स्पष्ट किया है कि: सर्वत्र समभाव, भय-शोक से मुक्ति एवं परमात्मा में लीनता।
शब्द संख्या 116 ('शब्द 116: आयसां मृगछाला पावोडी कांय फिरावो,') में वर्णित 'परम पद' की स्थिति में जीवात्मा का क्या स्वरूप सिद्ध होता है?
पद 116 (शब्द 116: आयसां मृगछाला पावोडी कांय फिरावो,, Raag Maru) में गुरु जाम्भोजी महाराज ने स्पष्ट किया है कि: सर्वत्र समभाव, भय-शोक से मुक्ति एवं परमात्मा में लीनता।
शब्द संख्या 118 ('शब्द 118: सुरगा हूंते शम्भू आयो') में वर्णित 'परम पद' की स्थिति में जीवात्मा का क्या स्वरूप सिद्ध होता है?
पद 118 (शब्द 118: सुरगा हूंते शम्भू आयो, Raag Kalyan) में गुरु जाम्भोजी महाराज ने स्पष्ट किया है कि: सर्वत्र समभाव, भय-शोक से मुक्ति एवं परमात्मा में लीनता।
शब्द संख्या 120 ('शब्द 120: विष्णु विष्णु तू भणरे प्राणीं,') में वर्णित 'परम पद' की स्थिति में जीवात्मा का क्या स्वरूप सिद्ध होता है?
पद 120 (शब्द 120: विष्णु विष्णु तू भणरे प्राणीं,, Raag Todi) में गुरु जाम्भोजी महाराज ने स्पष्ट किया है कि: सर्वत्र समभाव, भय-शोक से मुक्ति एवं परमात्मा में लीनता।