सार्वभौमिक प्रश्न बैंक व विगत वर्ष प्रश्न
RPSC, REET, UPSC एवं बिश्नोई विद्वत शोध पीठ द्वारा सत्यापित प्रश्नों का अभ्यास करें। प्रत्येक प्रश्न के साथ विस्तृत उत्तर व विधिक संदर्भ उपलब्ध है।
श्री गुरु जाम्भोजी महाराज द्वारा उद्घोषित शब्द संख्या 41 ('शब्द 41: सुण राजेंद्र, सुण जोगेंद्र') का प्रमुख आध्यात्मिक उपदेश अथवा केंद्रीय भाव क्या है?
शब्द संख्या 41 का मुख्य दार्शनिक संदेश: हे साधक! अनेक प्रकार के सिद्धों और साधकों की कथाओं को सुनो। यह शरीर नश्वर है और संसार में जो कुछ उत्पन्न होता है वह परिवर्तनशील है। मनुष्य यदि इस नश्वरता को पहचान नहीं पाता, तो वह बाहरी उपलब्धियों और शरीर को ही स्थायी समझने की भूल करता है।
श्री गुरु जाम्भोजी महाराज द्वारा उद्घोषित शब्द संख्या 42 ('शब्द 42: आयसा काहे काजे खेह भकरूड़े') का प्रमुख आध्यात्मिक उपदेश अथवा केंद्रीय भाव क्या है?
शब्द संख्या 42 का मुख्य दार्शनिक संदेश: केवल बाहरी रूप, तपस्या, वेश या धार्मिक पहचान आध्यात्मिक सत्य की प्राप्ति की गारंटी नहीं है। योगी, जंगम, नाथ, दिगंबर, संन्यासी, ब्राह्मण, ब्रह्मचारी, पंडित, काजी या मुल्ला—इनमें से कोई भी बाहरी पहचान अपने आप में पर्याप्त नहीं। गुरु के सही मार्गदर्शन के बिना मनुष्य धार्मिक कर्मों और बाहरी साधनाओं में उलझा रह सकता है।
श्री गुरु जाम्भोजी महाराज द्वारा उद्घोषित शब्द संख्या 43 ('शब्द 43: ज्यूं राज गयो राजिंदर झूरे') का प्रमुख आध्यात्मिक उपदेश अथवा केंद्रीय भाव क्या है?
शब्द संख्या 43 का मुख्य दार्शनिक संदेश: योग केवल बाहरी वेशभूषा या शरीर पर किए गए चिह्नों से प्राप्त नहीं होता। कान छिदवाना, विशेष वेश धारण करना, जटाएँ रखना या अन्य बाहरी प्रतीक अपनाना अपने आप में योग नहीं हैं। वास्तविक योग वह है जो मनुष्य के भीतर स्थायी रूप से विकसित हो—जो युगों तक साधक के चरित्र और चेतना में दिखाई दे।
श्री गुरु जाम्भोजी महाराज द्वारा उद्घोषित शब्द संख्या 44 ('शब्द 44: खरतर झोली खरतर कंथा') का प्रमुख आध्यात्मिक उपदेश अथवा केंद्रीय भाव क्या है?
शब्द संख्या 44 का मुख्य दार्शनिक संदेश: केवल झोली, कंथा, जटा, दंड या अन्य योग-संबंधी बाहरी प्रतीकों को धारण करने से योग सिद्ध नहीं होता। यदि मनुष्य माया और मोह में ही उलझा है तथा जीवों के प्रति दया नहीं रखता, तो बाहरी साधना का वास्तविक उद्देश्य पूरा नहीं होता।
श्री गुरु जाम्भोजी महाराज द्वारा उद्घोषित शब्द संख्या 45 ('शब्द 45: दोय मन दोय दिल सिंधी न कंथा') का प्रमुख आध्यात्मिक उपदेश अथवा केंद्रीय भाव क्या है?
शब्द संख्या 45 का मुख्य दार्शनिक संदेश: दोहरे मन और दोहरे हृदय वाला व्यक्ति स्थिर आध्यात्मिक मार्ग पर नहीं चल सकता। मन में द्वंद्व, कपट और अस्थिरता हो तो गुरु-मार्ग में भी दृढ़ता नहीं रहती। आंतरिक एकाग्रता, सत्यनिष्ठा और स्पष्ट मन आध्यात्मिक जीवन के लिए आवश्यक हैं।
श्री गुरु जाम्भोजी महाराज द्वारा उद्घोषित शब्द संख्या 46 ('शब्द 46: जिहिं जोगी के मनही मुद्रा') का प्रमुख आध्यात्मिक उपदेश अथवा केंद्रीय भाव क्या है?
शब्द संख्या 46 का मुख्य दार्शनिक संदेश: सच्चे योगी के लिए योग बाहरी मुद्रा या वस्त्र नहीं, बल्कि उसकी आंतरिक अवस्था है। गुरु की सेवा और सही साधना मनुष्य को संसाररूपी भवसागर से पार जाने की दिशा देती है। सत्य का आचरण ऐसा होना चाहिए जिसमें पाप को छिपाने का प्रयास न हो, पुण्य का अहंकार न हो और जीव के जीवन-निर्वाह को नष्ट न किया जाए।
श्री गुरु जाम्भोजी महाराज द्वारा उद्घोषित शब्द संख्या 47 ('शब्द 47: काया कंथा मन जो गूंठो') का प्रमुख आध्यात्मिक उपदेश अथवा केंद्रीय भाव क्या है?
शब्द संख्या 47 का मुख्य दार्शनिक संदेश: साधक को अपने शरीर और मन दोनों पर संयम रखना चाहिए। मन को मृग की तरह चंचल मानकर उसे साधना के द्वारा नियंत्रित करने की बात कही गई है। साधना का लक्ष्य केवल बाहरी योगी बनना नहीं, बल्कि भीतर से संयमित, जागरूक और साधित होना है।
श्री गुरु जाम्भोजी महाराज द्वारा उद्घोषित शब्द संख्या 48 ('शब्द 48: लक्ष्मण लक्ष्मण न कर आयसां') का प्रमुख आध्यात्मिक उपदेश अथवा केंद्रीय भाव क्या है?
शब्द संख्या 48 का मुख्य दार्शनिक संदेश: यह शब्द लक्ष्मण के नाम और उनके चरित्र से जुड़े रूपक के माध्यम से बाहरी पहचान और वास्तविक गुण के बीच अंतर की ओर संकेत करता है। किसी महान नाम या पहचान को धारण कर लेना पर्याप्त नहीं; उसके अनुरूप गुण, आचरण और साधना भी आवश्यक हैं।
श्री गुरु जाम्भोजी महाराज द्वारा उद्घोषित शब्द संख्या 49 ('शब्द 49: अवधू अजरा जार ले, अमरा राख ले') का प्रमुख आध्यात्मिक उपदेश अथवा केंद्रीय भाव क्या है?
शब्द संख्या 49 का मुख्य दार्शनिक संदेश: साधक को नश्वरता से ऊपर उठकर उस आध्यात्मिक सत्य को धारण करने का प्रयास करना चाहिए जो भीतर स्थायी है। गुरु के दर्शन और मार्गदर्शन से साधक को उस आंतरिक आध्यात्मिक अनुभव की दिशा मिलती है।
श्री गुरु जाम्भोजी महाराज द्वारा उद्घोषित शब्द संख्या 50 ('शब्द 50: तइया सांसू तइया मासूं') का प्रमुख आध्यात्मिक उपदेश अथवा केंद्रीय भाव क्या है?
शब्द संख्या 50 का मुख्य दार्शनिक संदेश: मनुष्य चाहे हिंदू हो, मुसलमान हो, योगी हो या किसी अन्य धार्मिक पहचान से जुड़ा हो—केवल तीर्थ-स्नान, हज, पिंडदान, सिर मुंडाना, कान छिदवाना या अन्य बाहरी धार्मिक कर्म ही अंतिम सत्य की प्राप्ति नहीं कराते। परम सत्य प्रत्येक हृदय में विद्यमान है। इसलिए बाहरी धार्मिक पहचान से आगे बढ़कर उस सत्य को अपने भीतर पहचानना आवश्यक है। गुरु इस आंतरिक सत्य की पहचान कराने वाला मार्गदर्शक है।
श्री गुरु जाम्भोजी महाराज द्वारा उद्घोषित शब्द संख्या 51 ('शब्द 51: सस पाताले भुयं अंतर अंतर राखिलौ') का प्रमुख आध्यात्मिक उपदेश अथवा केंद्रीय भाव क्या है?
शब्द संख्या 51 का मुख्य दार्शनिक संदेश: परम तत्व की व्यापकता और शरीर के भीतर स्थित सूक्ष्म तत्वों की ओर संकेत मिलता है। संसार में माया है, लेकिन उसी के भीतर दया भी विद्यमान है। दया से करुणा और जीवन का वास्तविक प्रतिबिंब विकसित होता है। मनुष्य को बाहरी संसार के साथ-साथ अपने भीतर के तत्व को भी पहचानना चाहिए।
श्री गुरु जाम्भोजी महाराज द्वारा उद्घोषित शब्द संख्या 52 ('शब्द 52: मोह मंडप थाप थाप ले') का प्रमुख आध्यात्मिक उपदेश अथवा केंद्रीय भाव क्या है?
शब्द संख्या 52 का मुख्य दार्शनिक संदेश: मोह का संसार मनुष्य के चारों ओर एक मंडप की तरह खड़ा हो जाता है। साधक को इस मोह से ऊपर उठकर ज्ञान को अपने हाथ में शस्त्र की तरह धारण करना चाहिए। जब ज्ञान दृढ़ होता है, तब अज्ञान और मोह उसके वास्तविक शत्रु के रूप में पहचाने जाते हैं।
श्री गुरु जाम्भोजी महाराज द्वारा उद्घोषित शब्द संख्या 53 ('शब्द 53: गुरु हीरा बिणजै लेहम लेहूं') का प्रमुख आध्यात्मिक उपदेश अथवा केंद्रीय भाव क्या है?
शब्द संख्या 53 का मुख्य दार्शनिक संदेश: गुरु को हीरे के समान मूल्यवान बताया गया है। गुरु के मार्गदर्शन को दोष देने के बजाय उसके द्वारा बताए हुए मार्ग को समझना चाहिए। संसार, प्रकृति, शरीर और भौतिक सुख सभी परिवर्तनशील हैं। माया और सांसारिक राज-पाट को छोड़कर गुरु से मिलने वाला योग और ज्ञान अधिक महत्वपूर्ण है।
श्री गुरु जाम्भोजी महाराज द्वारा उद्घोषित शब्द संख्या 54 ('शब्द 54: अरुण विघाणीं रे रवि भाणै') का प्रमुख आध्यात्मिक उपदेश अथवा केंद्रीय भाव क्या है?
शब्द संख्या 54 का मुख्य दार्शनिक संदेश: सूर्य, प्रकाश और विष्णु के प्रतीकों के माध्यम से ज्ञान और चेतना की ओर संकेत किया गया है। मनुष्य को केवल बाहरी घटनाओं में उलझने के बजाय अपने भीतर के प्रकाश और सत्य को देखना चाहिए। आंतरिक दृष्टि से सत्य को पहचानना ही वास्तविक जागरण है।
श्री गुरु जाम्भोजी महाराज द्वारा उद्घोषित शब्द संख्या 55 ('शब्द 55: घटिये कै खोज फिरंता') का प्रमुख आध्यात्मिक उपदेश अथवा केंद्रीय भाव क्या है?
शब्द संख्या 55 का मुख्य दार्शनिक संदेश: मनुष्य जिस वस्तु की खोज करता है, उसी के अनुसार उसका प्रयास और परिणाम होता है। कहीं हाथी की खोज है, कहीं पशु की, कहीं छिपे हुए स्थान की और कहीं सोने की। यह शब्द संकेत देता है कि खोज की दिशा ही प्राप्ति को निर्धारित करती है। साधक यदि सत्य की खोज करे तो उसकी यात्रा भी उसी दिशा में आगे बढ़ेगी।
श्री गुरु जाम्भोजी महाराज द्वारा उद्घोषित शब्द संख्या 56 ('शब्द 56: कुपाथ कूं दान जु दीयो') का प्रमुख आध्यात्मिक उपदेश अथवा केंद्रीय भाव क्या है?
शब्द संख्या 56 का मुख्य दार्शनिक संदेश: दान का महत्व केवल दान देने में नहीं बल्कि उचित पात्र और उचित उद्देश्य में है। गलत स्थान पर दिया गया दान अंधकार में खो सकता है, जबकि उचित स्थान पर दिया गया दान बीज की तरह फलता है। मनुष्य को अपने मन और शरीर को कसौटी पर कसना चाहिए तथा जीवन में विष्णु-नाम और सद्गुणों का बीज बोना चाहिए।
श्री गुरु जाम्भोजी महाराज द्वारा उद्घोषित शब्द संख्या 57 ('शब्द 57: अति बल दानो सब ज्ञानी') का प्रमुख आध्यात्मिक उपदेश अथवा केंद्रीय भाव क्या है?
शब्द संख्या 57 का मुख्य दार्शनिक संदेश: बहुत बड़ा दान, तीर्थ और धार्मिक आचार करने के बाद भी मनुष्य अंतिम सत्य तक नहीं पहुँच सकता यदि उसके भीतर वास्तविक ज्ञान और सही आचरण नहीं है। दुर्योधन और अन्य उदाहरणों के माध्यम से संकेत है कि बाहरी सामर्थ्य, धार्मिक कर्म या प्रतिष्ठा अपने आप में मुक्ति का साधन नहीं।
श्री गुरु जाम्भोजी महाराज द्वारा उद्घोषित शब्द संख्या 58 ('शब्द 58: तउवा माण दुर्योधन माण्या') का प्रमुख आध्यात्मिक उपदेश अथवा केंद्रीय भाव क्या है?
शब्द संख्या 58 का मुख्य दार्शनिक संदेश: दुर्योधन, दान, युद्ध, रामायण के पात्रों और शिव के धनुष जैसे उदाहरणों द्वारा मानवीय शक्ति और अहंकार की सीमाएँ बताई गई हैं। मनुष्य कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, केवल शक्ति के आधार पर अंतिम सत्य प्राप्त नहीं किया जा सकता। अहंकार और बाहरी सामर्थ्य से ऊपर उठना आवश्यक है।
श्री गुरु जाम्भोजी महाराज द्वारा उद्घोषित शब्द संख्या 59 ('शब्द 59: पढ़ कागल वेदूं, शास्त्र शब्दूं (काल चक्र)') का प्रमुख आध्यात्मिक उपदेश अथवा केंद्रीय भाव क्या है?
शब्द संख्या 59 का मुख्य दार्शनिक संदेश: केवल धार्मिक पुस्तकें और शास्त्र पढ़ते रहने से जीवन का कार्य सिद्ध नहीं होता यदि काल और समय की गति को न समझा जाए। दिन-रात निरंतर आयु घट रही है। पाखंड और सांसारिक प्रपंचों को छोड़कर सच्चे सतगुरु के शब्द को समझना और प्रभु स्मरण करना ही मुक्ति दिलाता है।
श्री गुरु जाम्भोजी महाराज द्वारा उद्घोषित शब्द संख्या 60 ('शब्द 60: हस्ती चढ़ंता गेंवर गुड़ंता') का प्रमुख आध्यात्मिक उपदेश अथवा केंद्रीय भाव क्या है?
शब्द संख्या 60 का मुख्य दार्शनिक संदेश: हाथी पर चढ़ना, राज-दरबार का सुख और भौतिक ऐश्वर्य भोगना अंततः यहीं छूट जाता है। मृत्यु के समय कोई पुत्र, धन अथवा परिवार साथ नहीं देता। केवल परमात्मा का पावन नाम ही संसार के समस्त दुखों और भवरोगों को मिटाने वाला सच्चा सहारा है।