सार्वभौमिक प्रश्न बैंक व विगत वर्ष प्रश्न
RPSC, REET, UPSC एवं बिश्नोई विद्वत शोध पीठ द्वारा सत्यापित प्रश्नों का अभ्यास करें। प्रत्येक प्रश्न के साथ विस्तृत उत्तर व विधिक संदर्भ उपलब्ध है।
श्री गुरु जाम्भोजी महाराज द्वारा उद्घोषित शब्द संख्या 61 ('शब्द 61: कैतैं कारण किरिया चू यो,') का प्रमुख आध्यात्मिक उपदेश अथवा केंद्रीय भाव क्या है?
शब्द संख्या 61 का मुख्य दार्शनिक संदेश: शबद संख्या 61 में गुरु जम्भेश्वर जी जोगियों, सिद्धों और बाह्य भेष धारियों को सच्चा योग समझाते हैं। वे सिखाते हैं कि कान छिदवाना, भभूत मलना या वन-कंदराओं में भटकना योग नहीं है, अपितु मन के विकारों को वश में करना और जीव दया पालना ही सच्चा योग है।
श्री गुरु जाम्भोजी महाराज द्वारा उद्घोषित शब्द संख्या 62 ('शब्द 62: नामै कारण किरिया चू यो,') का प्रमुख आध्यात्मिक उपदेश अथवा केंद्रीय भाव क्या है?
शब्द संख्या 62 का मुख्य दार्शनिक संदेश: शबद संख्या 62 में गुरु जम्भेश्वर जी जोगियों, सिद्धों और बाह्य भेष धारियों को सच्चा योग समझाते हैं। वे सिखाते हैं कि कान छिदवाना, भभूत मलना या वन-कंदराओं में भटकना योग नहीं है, अपितु मन के विकारों को वश में करना और जीव दया पालना ही सच्चा योग है।
श्री गुरु जाम्भोजी महाराज द्वारा उद्घोषित शब्द संख्या 63 ('शब्द 63: आतर पातर राही रूक्मण') का प्रमुख आध्यात्मिक उपदेश अथवा केंद्रीय भाव क्या है?
शब्द संख्या 63 का मुख्य दार्शनिक संदेश: शबद संख्या 63 में गुरु जम्भेश्वर जी सृष्टि के मूल तत्वों—जल, वायु, पृथ्वी, वनस्पति और मूक पशु-पक्षियों के संरक्षण का पावन संदेश देते हैं। प्रकृति परमात्मा का ही स्वरूप है, अतः उसकी रक्षा करना प्रत्येक मनुष्य का सर्वोपरि धर्म है।
श्री गुरु जाम्भोजी महाराज द्वारा उद्घोषित शब्द संख्या 64 ('शब्द 64: मैं कर भूला मांड पिराणी,') का प्रमुख आध्यात्मिक उपदेश अथवा केंद्रीय भाव क्या है?
शब्द संख्या 64 का मुख्य दार्शनिक संदेश: शबद संख्या 64 में गुरु जम्भेश्वर जी सृष्टि के मूल तत्वों—जल, वायु, पृथ्वी, वनस्पति और मूक पशु-पक्षियों के संरक्षण का पावन संदेश देते हैं। प्रकृति परमात्मा का ही स्वरूप है, अतः उसकी रक्षा करना प्रत्येक मनुष्य का सर्वोपरि धर्म है।
श्री गुरु जाम्भोजी महाराज द्वारा उद्घोषित शब्द संख्या 65 ('शब्द 65: तउवा जाग जु गोरख जाज्ज्या,') का प्रमुख आध्यात्मिक उपदेश अथवा केंद्रीय भाव क्या है?
शब्द संख्या 65 का मुख्य दार्शनिक संदेश: शबद संख्या 65 में गुरु जम्भेश्वर जी जोगियों, सिद्धों और बाह्य भेष धारियों को सच्चा योग समझाते हैं। वे सिखाते हैं कि कान छिदवाना, भभूत मलना या वन-कंदराओं में भटकना योग नहीं है, अपितु मन के विकारों को वश में करना और जीव दया पालना ही सच्चा योग है।
श्री गुरु जाम्भोजी महाराज द्वारा उद्घोषित शब्द संख्या 66 ('शब्द 66: ऊमाज गुमाज पंज गंज यारी') का प्रमुख आध्यात्मिक उपदेश अथवा केंद्रीय भाव क्या है?
शब्द संख्या 66 का मुख्य दार्शनिक संदेश: शबद संख्या 66 में गुरु जम्भेश्वर जी मानव जीवन की नश्वरता और सत्कर्मों की महत्ता का बोध कराते हैं। वे प्राणी को सचेत करते हैं कि व्यर्थ के अहंकार को त्यागकर सत्य, शील, संतोष और परमार्थ के मार्ग पर चलें।
श्री गुरु जाम्भोजी महाराज द्वारा उद्घोषित शब्द संख्या 67 ('शब्द 67 (शुक्ल हंस): श्री गढ़ आल मोत पुर') का प्रमुख आध्यात्मिक उपदेश अथवा केंद्रीय भाव क्या है?
शब्द संख्या 67 का मुख्य दार्शनिक संदेश: शबद संख्या 67 में गुरु जम्भेश्वर जी जोगियों, सिद्धों और बाह्य भेष धारियों को सच्चा योग समझाते हैं। वे सिखाते हैं कि कान छिदवाना, भभूत मलना या वन-कंदराओं में भटकना योग नहीं है, अपितु मन के विकारों को वश में करना और जीव दया पालना ही सच्चा योग है।
श्री गुरु जाम्भोजी महाराज द्वारा उद्घोषित शब्द संख्या 68 ('शब्द 68: वै कंवराई अनन्त बधाई') का प्रमुख आध्यात्मिक उपदेश अथवा केंद्रीय भाव क्या है?
शब्द संख्या 68 का मुख्य दार्शनिक संदेश: शबद संख्या 68 में गुरु जम्भेश्वर जी सृष्टि के मूल तत्वों—जल, वायु, पृथ्वी, वनस्पति और मूक पशु-पक्षियों के संरक्षण का पावन संदेश देते हैं। प्रकृति परमात्मा का ही स्वरूप है, अतः उसकी रक्षा करना प्रत्येक मनुष्य का सर्वोपरि धर्म है।
श्री गुरु जाम्भोजी महाराज द्वारा उद्घोषित शब्द संख्या 69 ('शब्द 69: जबरारे तैं जग डांडीलो') का प्रमुख आध्यात्मिक उपदेश अथवा केंद्रीय भाव क्या है?
शब्द संख्या 69 का मुख्य दार्शनिक संदेश: शबद संख्या 69 में गुरु जम्भेश्वर जी धार्मिक पाखंड, बाह्य कर्मकांड और मूक प्राणियों पर होने वाली क्रूरता का कड़ा विरोध करते हैं। वे स्पष्ट उपदेश देते हैं कि परमात्मा के दरबार में दया, सत्य, पवित्र आचरण और ईमानदारी ही सच्ची बंदगी है।
श्री गुरु जाम्भोजी महाराज द्वारा उद्घोषित शब्द संख्या 70 ('शब्द 70: हक हलालूं') का प्रमुख आध्यात्मिक उपदेश अथवा केंद्रीय भाव क्या है?
शब्द संख्या 70 का मुख्य दार्शनिक संदेश: शबद संख्या 70 में गुरु जम्भेश्वर जी धार्मिक पाखंड, बाह्य कर्मकांड और मूक प्राणियों पर होने वाली क्रूरता का कड़ा विरोध करते हैं। वे स्पष्ट उपदेश देते हैं कि परमात्मा के दरबार में दया, सत्य, पवित्र आचरण और ईमानदारी ही सच्ची बंदगी है।
श्री गुरु जाम्भोजी महाराज द्वारा उद्घोषित शब्द संख्या 71 ('शब्द 71: धवणा धूजै पाहण पूजै बे फरमाई खुदाई') का प्रमुख आध्यात्मिक उपदेश अथवा केंद्रीय भाव क्या है?
शब्द संख्या 71 का मुख्य दार्शनिक संदेश: शबद संख्या 71 में गुरु जम्भेश्वर जी जोगियों, सिद्धों और बाह्य भेष धारियों को सच्चा योग समझाते हैं। वे सिखाते हैं कि कान छिदवाना, भभूत मलना या वन-कंदराओं में भटकना योग नहीं है, अपितु मन के विकारों को वश में करना और जीव दया पालना ही सच्चा योग है।
श्री गुरु जाम्भोजी महाराज द्वारा उद्घोषित शब्द संख्या 72 ('शब्द 72: वेद कुराण कुमाया जालूं') का प्रमुख आध्यात्मिक उपदेश अथवा केंद्रीय भाव क्या है?
शब्द संख्या 72 का मुख्य दार्शनिक संदेश: शबद संख्या 72 में गुरु जम्भेश्वर जी धार्मिक पाखंड, बाह्य कर्मकांड और मूक प्राणियों पर होने वाली क्रूरता का कड़ा विरोध करते हैं। वे स्पष्ट उपदेश देते हैं कि परमात्मा के दरबार में दया, सत्य, पवित्र आचरण और ईमानदारी ही सच्ची बंदगी है।
श्री गुरु जाम्भोजी महाराज द्वारा उद्घोषित शब्द संख्या 73 ('शब्द 73: हरी कंकेहड़ी मंडप मैड़ी जहां') का प्रमुख आध्यात्मिक उपदेश अथवा केंद्रीय भाव क्या है?
शब्द संख्या 73 का मुख्य दार्शनिक संदेश: शबद संख्या 73 में गुरु जम्भेश्वर जी मानव जीवन की नश्वरता और सत्कर्मों की महत्ता का बोध कराते हैं। वे प्राणी को सचेत करते हैं कि व्यर्थ के अहंकार को त्यागकर सत्य, शील, संतोष और परमार्थ के मार्ग पर चलें।
श्री गुरु जाम्भोजी महाराज द्वारा उद्घोषित शब्द संख्या 74 ('शब्द 74: कड़वा मीठा भोजन भख ले,') का प्रमुख आध्यात्मिक उपदेश अथवा केंद्रीय भाव क्या है?
शब्द संख्या 74 का मुख्य दार्शनिक संदेश: शबद संख्या 74 में गुरु जम्भेश्वर जी मानव जीवन की नश्वरता और सत्कर्मों की महत्ता का बोध कराते हैं। वे प्राणी को सचेत करते हैं कि व्यर्थ के अहंकार को त्यागकर सत्य, शील, संतोष और परमार्थ के मार्ग पर चलें।
श्री गुरु जाम्भोजी महाराज द्वारा उद्घोषित शब्द संख्या 75 ('शब्द 75: जोगी रे तू जुगत पिछांणी,') का प्रमुख आध्यात्मिक उपदेश अथवा केंद्रीय भाव क्या है?
शब्द संख्या 75 का मुख्य दार्शनिक संदेश: शबद संख्या 75 में गुरु जम्भेश्वर जी धार्मिक पाखंड, बाह्य कर्मकांड और मूक प्राणियों पर होने वाली क्रूरता का कड़ा विरोध करते हैं। वे स्पष्ट उपदेश देते हैं कि परमात्मा के दरबार में दया, सत्य, पवित्र आचरण और ईमानदारी ही सच्ची बंदगी है।
श्री गुरु जाम्भोजी महाराज द्वारा उद्घोषित शब्द संख्या 76 ('शब्द 76: तन मन धोइये संजम हुइये,') का प्रमुख आध्यात्मिक उपदेश अथवा केंद्रीय भाव क्या है?
शब्द संख्या 76 का मुख्य दार्शनिक संदेश: शबद संख्या 76 में गुरु जम्भेश्वर जी मानव जीवन की नश्वरता और सत्कर्मों की महत्ता का बोध कराते हैं। वे प्राणी को सचेत करते हैं कि व्यर्थ के अहंकार को त्यागकर सत्य, शील, संतोष और परमार्थ के मार्ग पर चलें।
श्री गुरु जाम्भोजी महाराज द्वारा उद्घोषित शब्द संख्या 77 ('शब्द 77: भूला लो भल भूला लो,') का प्रमुख आध्यात्मिक उपदेश अथवा केंद्रीय भाव क्या है?
शब्द संख्या 77 का मुख्य दार्शनिक संदेश: शबद संख्या 77 में गुरु जम्भेश्वर जी अविनाशी परमात्मा विष्णु के अनन्य सुमिरन का संदेश देते हैं। वे मानव को सचेत करते हैं कि सांसारिक भ्रम और मोह-माया नश्वर हैं; केवल प्रभु का नाम और सदाचार ही भवसागर पार कराने वाले हैं।
श्री गुरु जाम्भोजी महाराज द्वारा उद्घोषित शब्द संख्या 78 ('शब्द 78: नवै पोल नवै दरवाजा') का प्रमुख आध्यात्मिक उपदेश अथवा केंद्रीय भाव क्या है?
शब्द संख्या 78 का मुख्य दार्शनिक संदेश: शबद संख्या 78 में गुरु जम्भेश्वर जी धार्मिक पाखंड, बाह्य कर्मकांड और मूक प्राणियों पर होने वाली क्रूरता का कड़ा विरोध करते हैं। वे स्पष्ट उपदेश देते हैं कि परमात्मा के दरबार में दया, सत्य, पवित्र आचरण और ईमानदारी ही सच्ची बंदगी है।
श्री गुरु जाम्भोजी महाराज द्वारा उद्घोषित शब्द संख्या 79 ('शब्द 79: बारा पोल नवै दरसाजी') का प्रमुख आध्यात्मिक उपदेश अथवा केंद्रीय भाव क्या है?
शब्द संख्या 79 का मुख्य दार्शनिक संदेश: शबद संख्या 79 में गुरु जम्भेश्वर जी सद्गुरु की अनन्य महिमा और मार्गदर्शन की अनिवार्यता प्रकट करते हैं। गुरु-मुख से प्रकट होने वाला ज्ञान ही अज्ञान के अंधकार को मिटाकर मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।
श्री गुरु जाम्भोजी महाराज द्वारा उद्घोषित शब्द संख्या 80 ('शब्द 80: जे म्हां सूता रैण बिहावै,') का प्रमुख आध्यात्मिक उपदेश अथवा केंद्रीय भाव क्या है?
शब्द संख्या 80 का मुख्य दार्शनिक संदेश: शबद संख्या 80 में गुरु जम्भेश्वर जी सृष्टि के मूल तत्वों—जल, वायु, पृथ्वी, वनस्पति और मूक पशु-पक्षियों के संरक्षण का पावन संदेश देते हैं। प्रकृति परमात्मा का ही स्वरूप है, अतः उसकी रक्षा करना प्रत्येक मनुष्य का सर्वोपरि धर्म है।